बैंक की लाइन में खड़े आदमी से पूछिए—वह बताएगा कि राज्य उसके लिए क्या है। वहाँ ट्यूबलाइट की सफ़ेद रोशनी में, काउंटर के इस पार और उस पार, एक दूरी रोज़ाना नापी जाती है—वादों और हकीकत की दूरी। कागज़, हस्ताक्षर, मुहर, और वह धैर्य जो गरीब की मजबूरी है, विकल्प नहीं।

भारत अपनी तरक्की की कहानी बड़े अंकों में सुनाता है- करोड़ों खाते खुले, अरबों लेन-देन हुए, योजनाएँ सीधे खाते में पहुँचीं। यह सब सच है। पर एक और सच है, जो उतना ही बड़ा है- राज्य गरीब नागरिक पर अब भी शक करता है। उसे बार-बार साबित करना पड़ता है कि वह वही है जो कह रहा है।
नीतियाँ बनीं—खाते खुले, बिचौलिये कम हुए, पैसा सीधे पहुँचा। केवाईसी आया, ताकि धोखाधड़ी रुके। यह सब ज़रूरी था। इसमें नीयत भी थी, मेहनत भी।
पर असली कसौटी यह नहीं है कि व्यवस्था औसत आदमी के लिए कैसी है। असली कसौटी यह है कि सबसे कमजोर आदमी के लिए कैसी है।
वहाँ तस्वीर बदल जाती है।
  • एक किसान है—जिसकी उँगलियों के निशान मशीन नहीं पढ़तीं। उसे बार-बार जाना पड़ता है।
  • एक विधवा है—जिससे नए कागज़ मांगे जाते हैं, क्योंकि नियम बदल गया है।
  • एक मजदूर है—जो कुछ महीनों तक दूर रहा, और उसका खाता “निष्क्रिय” हो गया। अब उसे फिर से ज़िंदा करने के लिए वही पुरानी दौड़—फॉर्म, दस्तावेज, गवाही।
केवाईसी कागज़ पर ठीक लगता है। ज़मीन पर अक्सर बार-बार की परीक्षा बन जाता है। जिनके पास सलाहकार हैं, वे रास्ता निकाल लेते हैं। जिनके पास कुछ नहीं है, वे नियम के सामने अकेले खड़े होते हैं।
यहीं से समस्या शुरू होती है।
मुद्दा यह नहीं कि भारत पहचान मांगता है। मुद्दा यह है कि वह कितनी बार मांगता है, किस लहजे में मांगता है, और क्या उसमें आदमी की हालत के लिए जगह है। नियम सबके लिए एक जैसे हो सकते हैं। पर असर सब पर एक जैसा नहीं होता। गरीब के लिए हर दस्तावेज़ एक दिन की मजदूरी है, हर चक्कर एक थकान है, हर देरी एक अपमान है।
यही व्यवस्था, जो ईमानदारी के लिए बनी थी, अपमान का रूप ले लेती है।
नरेंद्र मोदी ने कहा था—गरीब को गरिमा मिलेगी, उसे किसी अफसर के आगे झुकना नहीं पड़ेगा। उनके लिए यह एक नारा था। लोगों के लिए वह एक वादा बन गया। संविधान की आत्मा भी यही कहती है—समानता, सम्मान, जीवन का अधिकार।
लेकिन ज़मीन पर यह वादा पूरा नहीं दिखता। क्यों?

क्योंकि हमने व्यवस्था बदली, उसका स्वभाव नहीं बदला। हमने तकनीक लाई, पर उसका इस्तेमाल आदमी को आसान बनाने के लिए कम, नियम को सख्त बनाने के लिए ज़्यादा हुआ। अफसर के सामने भी डर है—गलती न हो जाए, ऑडिट में न फँस जाए। इसलिए वह ज़्यादा कागज़ मांगता है, कम भरोसा करता है।

राज्य खुद को सुरक्षित रखता है। नागरिक को साबित करना पड़ता है। पर लोकतंत्र इस सोच पर नहीं चल सकता कि नागरिक संभावित खतरा है।

भारत में ही ऐसे उदाहरण हैं जहाँ यह बदलता दिखता है। कुछ जगहों पर अधिकारी नियम को औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं, बोझ की तरह नहीं। वे गाँव में कैंप लगाते हैं, घर तक सेवा ले जाते हैं, छोटे कामों को सरल बनाते हैं। वहाँ नियम भी चलते हैं और आदमी भी नहीं टूटता।
तकनीक भी मदद कर सकती है—अगर सही दिशा में लगे। राज्य के पास जो जानकारी है, उसे बार-बार नागरिक से मांगने के बजाय, वह खुद मिलान करे। जहाँ ज़रूरत हो, वहीं पूछे। हर किसी को हर बार कतार में खड़ा न करे।
दुनिया के कुछ देश एक और रास्ता दिखाते हैं। वहाँ राज्य पहले भरोसा करता है, शक बाद में करता है। प्रक्रिया छोटी है, पर साफ़ है। नियम कम हैं, पर लागू होते हैं। नेता भी उसी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें आम लोग रहते हैं।
भारत वैसा नहीं बन सकता—न आकार में, न इतिहास में। पर एक बात सीख सकता है—राज्य का पहला भाव भरोसा होना चाहिए, शक नहीं। अगर नागरिक सच में केंद्र में है, तो कुछ बातें साफ करनी होंगी।
  • एक—एक बार का सत्यापन काफी होना चाहिए। हर साल वही कागज़ फिर से नहीं मांगे जाने चाहिए।
  • दो—छोटे खातों, छोटी रकम के लिए नियम सरल होने चाहिए। वहाँ खतरा कम है, पर सख्ती का दर्द ज़्यादा है।
  • तीन—राज्य आगे आए। अगर खाते में समस्या है, तो नागरिक को दौड़ने के बजाय, व्यवस्था उसे बताए, रास्ता दे, समय दे।
  • चार—हर काम की समय-सीमा तय हो। और वह लागू भी हो।
  • पाँच—शिकायत का आसान रास्ता हो। गरीब आदमी भी सवाल पूछ सके, जवाब पा सके।
  • छह—हम यह भी मापें कि नागरिक को कितना सम्मान मिला। सिर्फ कितने खाते खुले, यह काफी नहीं है।
ये सब करना मुश्किल नहीं है। बस नज़र बदलनी है। ईमानदारी सिर्फ धोखाधड़ी रोकना नहीं है। ईमानदारी यह भी है कि किसी को बिना वजह न रुलाया जाए।
एक गहरी बात यहाँ है। राज्य और नागरिक का रिश्ता क्या है? क्या नागरिक एक फाइल है? एक नंबर है? या वह इस पूरे ढाँचे का असली मालिक है? संविधान कहता है—नागरिक मालिक है। राज्य सेवक है। पर जब हर मोड़ पर नागरिक को ही साबित करना पड़े, तो यह रिश्ता उलट जाता है।
सभ्यता की असली परीक्षा यही है। कितनी ऊँची इमारतें हैं, कितनी तेज़ ट्रेनें हैं—यह बाद की बात है। पहले यह देखना होता है कि एक साधारण आदमी के साथ कैसा व्यवहार होता है। क्या वह बिना डरे बैंक जा सकता है? क्या उसे बार-बार साबित नहीं करना पड़ता कि वह वही है जो है? क्या उसका समय, उसका श्रम, उसका सम्मान बचा रहता है? अगर नहीं, तो हमें रुककर देखना होगा।
भारत ने बड़े काम किए हैं। अब उसे छोटे काम ठीक करने हैं। वही छोटे काम जो रोज़ लाखों लोगों की ज़िंदगी तय करते हैं। गरिमा का मतलब सिर्फ यह नहीं कि पैसा खाते में आ जाए। गरिमा का मतलब है—उस पैसे तक पहुँचने में आदमी को झुकना न पड़े। जिस दिन यह हो जाएगा, उस दिन हमें यह कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि हम एक सभ्य देश हैं।
वह दिखेगा—हर कतार में, हर काउंटर पर, हर उस चेहरे में जो बिना डर के कह सके: यह राज्य मेरा है, और मैं इसका मालिक हूँ।