बिहार के बांकीपुर समेत मात्र तीन विधान सभा उपचुनाव के नतीजों की जैसी धूम है उतनी चर्चा शायद ही कभी उपचुनावों को लेकर होती होगी। आम तौर पर इनके नतीजों को बड़ी राजनीति के हिसाब से महत्व का महीं माना जाता। और अगर जबलपुर से शरद यादव की जीत या इलाहाबाद से वी पी सिंह की जीत जैसे उदाहरण हैं तो धूम धमाके के साथ आए उपचुनाव नतीजों से सामान्य चुनाव नतीजों के बेअसर रहने के उदाहरण भी हैं। इस मोदी राज में ही बीजेपी ने कई बार अहम उप चुनाव के विपरीत गए नतीजे के बाद शानदार जीत हासिल की है। पर तीन उप चुनावों और खास तौर से बांकीपुर की चर्चा अगर ज़्यादा हो रही है तो उसका कुछ अन्य कारण भी है। जेन जी आंदोलन और उससे निकले मुद्दों का एक सामान्य प्रभाव इन नतीजों पर दिखता है-बाँकीपुर को छोड़ भी दें तो गुजरात के मांजलपुर में बीजेपी जीतकर भी हारी लगती है क्योंकि उसकी जीत का मार्जिन लगभग एक लाख से ज्यादा कम हो गया है। मध्य प्रदेश के दतिया में पिछले जीते कांग्रेसी उम्मीदवार को पटा लेने और अपने बागी नरोत्तम मिश्रा को किसी भी तरह मना लेने के बावजूद बीजेपी बुरी तरह हार गई।

बांकीपुर: बीजेपी का गढ़

लेकिन बांकीपुर की चर्चा सबसे ज्यादा होने का कारण नीट प्रकरण के प्रभाव से ज्यादा उसका बीजेपी का गढ़ होने से है, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा छोड़ी सीट होने से है, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुई पहले ही मुकाबले में हारने से है, बीजेपी द्वारा अपार संसाधन और लोगों को चुनाव अभियान में जोड़ने से है, नीतीश कुमार के चुनाव प्रचार से दूर रहने से है और सबसे बढ़कर जन सुराज नामक पार्टी के नेता प्रशांत किशोर द्वारा बूथ बूथ पर बीजेपी का मुकाबला करने लायक जन बल खड़ा करने से है। 
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प्रशांत किशोर की जीत

एक बार जब उनकी लीड बनने लगी तो वह निरंतर बढ़ती ही गई और जातियों के मुहल्ले या अमीर-गरीब मतदाता वाले इलाकों जैसे फर्क गायब रहे। प्रशांत किशोर का इस क्षेत्र से कोई खास रिश्ता नहीं है और चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद ही उन्होंने यहां काम शुरू किया। यहां से विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का उम्मीदवार रहे प्रतिष्ठित शिक्षक के सी सिन्हा को भी बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान अपनी तरफ मिला लिया था। बीजेपी ने अपना उम्मीदवार बदलने से लेकर चालीस स्टार प्रचारक और करीब एक हजार बाहरी कार्यकर्ता, जो अलग-अलग जातियों के मंत्री, सांसद विधायक से लेकर चुने हुए काबिल लोग थे, लगाए थे। सभी 420 सीटों पर मुस्तैद व्यवस्था की देखरेख के लिए अलग-अलग इंचार्ज बनाए थे।

जाहिर है सबको ध्वस्त करके प्रशांत किशोर ने यह जीत हासिल की। और एक तरह से वे पूरे विपक्ष के उम्मीदवार बन गए थे। राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता ने जो वोट पाए उसमें भी बीजेपी की तरफ़ जा सकने वाले बनिया वोटों का हिस्सा काफी बड़ा था। लेकिन नतीजे आने के पहले से लोग यह कहने लगे थे कि चुनाव जाति और संप्रदाय की भावना से ऊपर उठकर हो रहा है। अगड़ों का वोट तो बदल ही रहा है उस कायस्थ समाज के वोट में भी दरार आ गई जो पिछले काफी समय से आँख मूंदकर बीजेपी को वोट देता था। इसी आधार पर बीजेपी के कई नेता यह कहने लगे थे कि बांकीपुर से तो अगर कुत्ता-बिल्ली को टिकट दे देगी तो वह जीत जाएगी। पता नहीं इस बयान का आधार क्या है लेकिन प्रशांत किशोर ने इसे मुद्दा बनाया। 

प्रशांत किशोर ने मोदी सरकार, बीजेपी की कार्यशैली और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के चयन को भी अपने एजेंडे पर रखा और विधान सभा चुनाव के पहले वाली अपनी रणनीति भी एकदम बदल डाली। वे कुशल रणनीतिकार हैं तो यह काम स्वाभाविक था भी।

बांकीपुर में जाति का गणित फेल

और यह भी स्वाभाविक है कि उनके चुनावी प्रबंधन कौशल, सेकुलर और जाति से ऊपर वाली सोच और बिहार की राजनीति में नया विकल्प बनाने की संभावना को लेकर बहुत शोर रहे। बिहार में चुनाव ही नहीं, जीवन के सभी मामलों में जाति का गणित काफी प्रभावी रहता है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि बिहारी समाज हर निर्णायक मोड़ पर जाति को भूलकर मतदान करता है। ऐसा बीजेपी और एनडीए की एकतरफा जीतों के समय भी हुआ है। दूसरी ओर बीजेपी के एक नंबर पार्टी बनने के बावजूद वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अन्य राज्यों से काफी कम है। इन दोनों बातों में पीके का योगदान कुछ नहीं है-वे ज्यादा से ज्यादा एक परंपरा को आगे बढ़ाने वाला माने जा सकते हैं। 

लेकिन वे राजनीति में नीति सिद्धांतों की विदाई, साधन और प्रबंधन की बहुलता और आज देश दुनिया में प्रभावी आर्थिक नीतियों के पक्षधर भी हैं। उन्होंने किस-किस दल और किस किस विचार आले दलों को चुनाव में मदद की है (जिसमें जीत के साथ हार का रिकॉर्ड भी है) इसका ब्यौरा बहुत बड़ा है और कुल नतीजा यही दिखेगा कि उनको नीति सिद्धांत से कोई मतलब नहीं है-वे पैसे को देवता मानते हैं। बांकीपुर का चुनाव बीजेपी और पीके के साधनों और प्रबंधन कौशल का मुकाबला था जिसमें अभी पीके जीते हैं। अपन बीजेपी की नीतियों के घोर विरोधी हैं लेकिन उसे बिना नीति-सिद्धांत के काम करने वाला मानने की भूल नहीं कर सकते। हम राजद को भी गलत मान सकते हैं, तेजस्वी के कामकाज की आलोचना कर सकते हैं लेकिन राजद को बिना सिद्धांत वाली पार्टी नहीं मान सकते।

मंडल, कमंडल और भूमंडलीकरण

इसलिए पीके की जीत में भले किसी को राजनीति करवट लेती दिखे, जातिवाद और सांप्रदायिकता की विदाई दिखे, पुरानी राजनीति का विकल्प दिखे, बीजेपी और मोदी राज के अंत की शुरुआत दिखे तो उसे अपनी बात मानने देना चाहिए। लेकिन उसे यह याद दिलाना भी ज़रूरी है कि यह न नई राजनीति की शुरुआत है न अहंकार और अनैतिकता की विदाई का संकेत। असल में मंडल, कमंडल और भूमंडलीकरण, ये तीनों धाराएँ एक साथ हमारी राजनीति में प्रकट हुईं। और प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने यह चेतावनी सी दी थी कि इसमें मंडल में ही वह ऊर्जा पैदा करने की क्षमता है जो बाकी दो नकारात्मक ऊर्जा को किनारे लगा सके। 

मंडल का नेतृत्व इस काम में क्यों असफल रहा इस पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन थोड़े समय तक संघ और बीजेपी भी स्वदेशी का मुखौटा पहनकर भूमंडलीकरण के विरोध की हवा का लाभ लेने में लगे थे। अब वही इसका सबसे बड़ा वाहक बन गए हैं, मोदी ही नहीं सम्राट चौधरी अब उसे किस तरह बिहार में लागू कर रहे हैं यह कभी विस्तार से चर्चा होगी। लेकिन दुखद यह है कि इस राजनीति के विरोध में चाहे आप का उदय हो, टी विजय की जीत हो, बसपा कोशिश करे ता अब पीके उभरें, किसी के सिद्धांत और नीति को तलाशना मुश्किल है। और असल में ये सभी मंडल के बाद कमंडल के भी ठिकाना लग जाने और नई आर्थिक नीतियों के दिग्विजय और झंडा गाड़ने का प्रमाण है।