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रफ़ाल से ध्यान हटा पाएगा ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब कांग्रेस के साथ एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई में उतर आए हैं। कांग्रेस का नारा ‘चौकीदार चोर है’ की जगह ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा उछाल कर मोदी/बीजेपी ने भ्रष्टाचार के तमाम मुद्दों को दरकिनार करने की कोशिश की है।
यह बहुत आश्चर्यजनक है कि पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद बालाकोट हवाई हमले के जरिए बीजेपी और मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा तथा राष्ट्र गर्व को मुख्य मुद्दा बना रहे थे और अब वे अचानक ‘मैं भी चौकीदार’ जैसे आत्मरक्षात्मक मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं। क्या बीजेपी को एहसास हो गया है कि देश भक्ति का राग जितनी भी ज़ोर से अलापा जाए, भ्रष्टाचार के शोर को दबाया नहीं जा सकता।
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भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा रहा ताक़तवर

यहाँ 2014 के चुनावों की पूर्व पीठिका को ध्यान में रखना ज़रूरी है। कांग्रेस के ख़िलाफ़ 2011-12 से ही माहौल बनना शुरू हो गया था। इसमें मुख्य भूमिका थी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की। मोबाइल फ़ोन के लिए 2-जी स्पेक्ट्रम के घोटाले के उछलने के बाद देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जन उभार शुरू हो गया था।
मनमोहन सरकार के संचार मंत्री ए. राजा और कनिमोझी की गिरफ़्तारी के बाद से आम लोगों का मनमोहन सरकार से मोह भंग होना शुरू हो गया था। बीजेपी ने भी संसद से सड़क तक इस मुद्दे को उछाला था। यह अलग बात है कि मोदी सरकार बनने के बाद भी इस मामले में सबूत पेश नहीं किया गया और इस मामले को देख रही विशेष अदालत ने आरोपों को खारिज करके अभियुक्तों को बरी कर दिया।
भ्रष्टाचार 1989 के चुनावों में भी बड़ा मुद्दा बना था। राजीव गाँधी सरकार के मंत्री वीपी सिंह ने बोफ़ोर्स तोप और पनडुब्बियों की ख़रीद में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। 1984 में प्रचंड बहुमत के साथ चुनाव जीतने वाले राजीव गाँधी की सरकार हिल गयी।
1984 के चुनावों में कांग्रेस को 416 सीटें मिली थीं और बोफ़ोर्स घोटाले की गूँज में हुए 1989 के चुनावों में कांग्रेस 200 से भी कम सीटों पर सिमट गयी। स्थिति ऐसी बनी कि बीजेपी सहित ग़ैर कांग्रेस दलों के समर्थन से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए।
यह उदाहरण साबित करता है कि भ्रष्टाचार लंबे समय से आम जनता को उद्वेलित करता रहा है।

रफ़ाल पर सरकार घेरे में

पिछले पाँच सालों में मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे हैं। इनमें सबसे ज़्यादा गंभीर है वायुसेना के लिए रफ़ाल विमानों की ख़रीद का। यह सौदा मनमोहन सिंह की सरकार के समय शुरू हुआ था और मोदी सरकार ने इसको अंतिम रूप दिया। आरोप है कि मोदी सरकार ने उद्दयोगपति अनिल अंबानी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए सौदे में कई बदलाव किए।
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मनमोहन सरकार के समय जिस कीमत पर रफ़ाल की ख़रीद की बातचीत हो रही थी उससे काफ़ी ज़्यादा क़ीमत पर मोदी सरकार ने सौदा किया। नए सौदे के मुताबिक सिर्फ़ 36 विमान फ्रांस से आएँगे बाकी भारत में बनाए जाएँगे। जिसका ठेका मुख्य रूप से अनिल अंबानी के पास है। मोदी सरकार पर अनिल अंबानी को फ़ायदा पहुँचाने का आरोप लगाया गया है।

भगोड़े भी हैं सरकार के माथे की शिकन

दूसरा बड़ा आरोप है देश के सरकारी बैंकों से बेहिसाब कर्ज़ लेकर विदेश भाग जाने वाले उद्योगपतियों का। इनमें से विजय माल्या और नीरव मोदी लंदन में तथा हितेश पटेल अल्बानिया में गिरफ़्तार हो चुके हैं और उन्हें भारत लाकर मुकदमा चलाने की कोशिशें चल रही हैं। मेहुल चोकसी जैसे कई उद्योगपति अब भी फ़रार हैं।
वहीं, बीजेपी यह दावा कर रही है कि सरकार की कोशिशों से ही विजय माल्या और नीरव मोदी की गिरफ़्तारी संभव हो पाई है। क्या लोग इस बात से संतुष्ट हो पाएँगे? पिछला उदाहरण देखें तो ऐसा नहीं लगता है।
मनमोहन सरकार ने ए. राजा और कनिमोझी को सरकार से बाहर कर दिया। उनकी गिरफ़्तारी भी हुई फिर भी लोगों ने कांग्रेस को माफ़ नहीं किया और 2009 में 206 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2014 में महज़ 44 सीटों पर सिमट गई।

मोदी से थी उम्मीद

मोदी 2014 के चुनावों के महानायक बने। लोगों को उम्मीद थी कि वह भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए ठोस क़दम उठाएँगे। 2014 के चुनावों का एक बड़ा मुद्दा लोकपाल की नियुक्ति भी थी। बीजेपी सरकार लगातार इसे टालती रही और चुनावों की घोषणा होने के बाद अब जाकर लोकपाल की नियुक्ति हुई। वह भी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद।
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राहुल गाँधी ने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा उछाला तो उनका मक़सद मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने का था। मोदी ने ख़ुद को देश का चौकीदार बताया था और लोगों को उम्मीद थी कि वह भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सक्षम होंगे। इसके बाद मोदी ने ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा उछाल कर राहुल के आरोपों की धार कमज़ोर करने की कोशिश की है। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो मोदी के इस अभियान का मक़सद सिर्फ़ एक है। वह यह है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग ख़ुद को चौकीदार बताना शुरू करें कि जनता भ्रम में पड़ जाए। यह कोशिश सफल होगी इसकी कोई गारंटी नहीं है।
मोदी सरकार पर कई उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने का आरोप है। सजग मतदाताओं में यह चर्चा का विषय है। ‘मैं भी चौकीदार’ के नारे से भ्रष्टाचार के आरोपों की टीस कम हो जाएगी और चुनाव पर इसका असर कम होगा, यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर है कि मोदी विरोधी कितनी ताक़त के साथ इसे जनता के बीच ले जाते हैं।
शैलेश
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