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रोज़गार और रफ़ाल जैसे मुद्दे पर ही बीजेपी को घेर सकती है कांग्रेस

रोज़गार के घटते मौके और हर साल लाखों की तादाद में नए लोगों के रोज़गार की तलाश में आने की बात चुनाव के ठीक पहले एक बार फिर उठ रही है। भारतीय उद्योग परिसंघ यानी (कनफ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़) सीआईआई ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए शुक्रवार को कहा कि बीते चार साल में लघु व सूक्ष्म उद्योगों में सिर्फ़ 3 लाख नौकरियाँ बनीं है। इसी दिन सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) ने आँकड़ा जारी करते हुए कहा कि फ़रवरी के अंत में बेरोज़गारी बीते साल इसी समय की बेरोज़गारी की तुलना में 7.2 प्रतिशत ज़्यादा है। और इसी दिन पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने कहा कि उनकी पार्टी के तीन चुनावी नारे होंगे---रोज़गार, रोज़गार और रोज़गार।

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इससे यह साफ़ है कि कांग्रेस पार्टी ने बेरोज़गारी और ग़रीबी को बड़ा मुद्दा बनाने का फ़ैसला किया है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पहले ही बुनियादी न्यूनतम आमदनी और किसानों को उनकी ग़रीबी के हिसाब से पैसे देने की बात कही थी। एक तरह से कांग्रेस पार्टी हिन्दुत्व के मुद्दे को पीछे धकेल कर रोज़गार और ग़रीबी जैसे मुद्दों को सामने लाने की योजना पर काम कर रही थी। लेकिन उसके बाद ही पुलवामा आतंकवादी हमला और फिर उसके जवाब में बालाकोट हवाई हमला हो गया।

इन दो घटनाओं ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और देश में सबसे बड़ा मुद्दा राष्ट्रवाद बन गया। युद्धोन्माद बहुत ही तेजी से फैलाया गया और ऐसा लगने लगा मानो पाकिस्तान से युद्ध अब छिड़ा कि तब छिड़ा। आज भी स्थिति बहुत अलग नही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मौके को चुनावी सभा में तब्दील कर देते हैं और ‘भारत माता की जय’ के नारे ख़ुद लगाते हैं और मौजूद भीड़ से भी लगवाते हैं। कांग्रेस इस पर बीजेपी से पार नहीं पा सकती, उसे हरा नहीं सकती।

कुछ दिनों की चुप्पी के बाद अब कांग्रेस धीरे-धीरे हमलावर हो रही है। उसकी कोशिश है कि बहस के केंद्र में दूसरे मुद्दे लाए जाएँ। इसी रणनीति के तहत राहुल गाँधी ने गुरुवार को सुबह-सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस की और रफ़ाल का मुद्दा एक बार फिर उछाला।
उन्होंने बेहद आक्रामक रवैया अपनाते हुए खुले आम कहा कि भ्रष्टाचार में स्वयं प्रधानमंत्री शामिल हैं और उनके ख़िलाफ़ इतने सबूत हैं कि उन पर मुक़दमा चलाया जा सकता है।

ठीक उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में 14 जनवरी के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई हुई। इसमें सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा कि रफ़ाल से जुड़े काग़ज़ात चोरी हो गए। लेकिन जब सोशल मीडिया पर यह सवाल उठने लगा कि सरकार इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को भी सुरक्षित नहीं रख सकती तो देश की सुरक्षा का क्या हाल होगा, तो सरकार ने यू-टर्न लिया। वेणुगोपाल ने अगले ही दिन कहा कि रफ़ाल के काग़ज़ात चोरी नहीं हुए, किसी ने मूल से जेरॉक्स कर लिए।
रफ़ाल पर सरकार की घबराहट बिल्कुल साफ़ है। पहले वेणुगोपाल ने कहा कि गोपनीय दस्तावेज़ के आधार पर ख़बर छापना ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन है और संबंधित लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी। यानी यह ख़बर छापने वाले ‘द हिन्दू’ अख़बार के एन. राम पर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन जब एडिटर्स गिल्ड ने इस पर विरोध जताया तो वेणुगोपाल ने कहा कि जिस सरकारी कर्मचारी ने गोपनीय दस्तावेज़ लीक किए, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी।

यानी रफ़ाल और रोज़गार जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरा जा सकता है। इन्ही मुद्दों पर छद्म और उग्र राष्ट्रवाद की हवा भी निकाली जा सकती है। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी बहस बना पाएगी तो वह बीजेपी को चनौती दे सकती है। इन मुद्दों पर सत्तारूढ़ दलों को जवाब देना मुश्किल भी होगा। लेकिन सवाल यह है कि तमाम विपक्षी दल की आगे की रणनीति क्या है।     

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