भारत की संवैधानिक प्रतिबद्धता ‘सबका साथ, सबका विकास’ को मोदी सरकार ने बार-बार दोहराया है। लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। हाल ही में संसद की स्थायी समिति (Standing Committee on Social Justice and Empowerment) ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के बजट उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। समिति की रिपोर्ट और आधिकारिक आँकड़ों से साफ़ पता चलता है कि 2022-23 के बाद से अल्पसंख्यक कल्याण के लिए आवंटित बजट में भारी कटौती हुई है और उसमें से भी ज़्यादातर फंड ख़र्च नहीं हो पाया। यह स्थिति अनुसूचित जाति कल्याण वाले मामले से भी बदतर है, जहाँ 23% फंड अनुपयोगित रह गया था। अल्पसंख्यक मंत्रालय में तो 2023-24 में सिर्फ़ 5.9% और 2024-25 में लगभग 22% ही ख़र्च हुआ। ये आँकड़े मोदी सरकार की अल्पसंख्यक-विरोधी नीति का जीता-जागता सबूत हैं।

पिछले 5 साल में घटा बजट और इस्तेमाल

पिछले पाँच वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि अल्पसंख्यक मंत्रालय का बजट और उसका उपयोग दोनों घटे हैं।
  • साल 2020-21 में मंत्रालय को 4005 करोड़ रुपये आवंटित थे, जिनमें से क़रीब 3998 करोड़ खर्च हो गए- उपयोग दर रही 99.8%।
  • 2021-22 में 4346 करोड़ आवंटित, 4325 करोड़ खर्च- 99.5% उपयोग।
  • लेकिन 2022-23 में अचानक बजट घटकर 2612 करोड़ रह गया और ख़र्च सिर्फ 837 करोड़—केवल 32% उपयोग। 1775 करोड़ रुपये सरेंडर यानि वापस वित्त मंत्रालय को लौटा दिए गए।
  • 2023-24 में बजट में आवंटन 3098 करोड़।
  • रिवाइज्ड एस्टीमेट घटकर 2609 करोड़ कर दिया गया। इसमें से भी ख़र्च सिर्फ 154 करोड़ ख़र्च किए गए सिर्फ़ 5.9 फ़ीसदी।
  • 2024-25 में बजट में 3183 करोड़ आवंटित हुए लेकिन रिवाइज्ड बजट में घटकर 1868 करोड़ दिए गए। खर्च 715 करोड़- 22% से भी कम।
  • 2025-26 में बजट में आवंटित 3350 करोड़ को रिवाइज्ड करके सिर्प 2160 करोड़ दिए गए। खर्च का ब्यौरा आना भी बाकी है।
  • 2026-27 में 3,400 करोड़ आवंटित, लेकिन उपयोग की स्थिति पहले से भी बदतर होने की आशंका है।
ये आंकड़े संसद की स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट से लिए गए हैं। समिति ने स्पष्ट कहा कि 2023-24 और 2024-25 में लगातार बजट कटौती और अनुपयोग का पैटर्न है। राज्य नोडल एजेंसियों (SNA) में फंड अटके रहने, पोर्टल बदलाव और स्कीम री-डिजाइन के बहाने दिए गए, लेकिन असल वजह सरकार की प्राथमिकता की कमी है। अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी) समुदायों की शिक्षा, कौशल और आर्थिक सशक्तिकरण पर सीधा असर पड़ा।
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बंद की गईं कई पुरानी स्कीमें

सरकार ने पुरानी स्कीमों को बंद करके “नई” स्कीमों का ढिंढोरा पीटा, लेकिन वो भी खोखली साबित हुईं। 2022-23 से प्रभावी रूप से बंद हुईं प्रमुख स्कीमें: Maulana Azad National Fellowship (MANF) PhD के लिए, Padho Pardesh (विदेश अध्ययन के लिए ब्याज सब्सिडी), Free Coaching and Allied Scheme, Nai Udaan (UPSC/SSC क्लियर करने वालों को सहायता), Scheme for Providing Education in Madrasas/Minorities (SPEMM)। सरकार का तर्क था कि ये अन्य मंत्रालयों की स्कीमों से ओवरलैप करती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अल्पसंख्यक छात्रों को टारगेटेड सपोर्ट ख़त्म हो गया। प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति स्कीम 2021-22 के बाद फ्रीज हैं—“अनियमितताओं” के बहाने तीन साल से बंद। हजारों छात्र प्रभावित हुए।

नई स्कीमों का ढिंढोरा

नई स्कीम के नाम पर प्रधानमंत्री विरासत का सम्वर्धन (PM VIKAS) 2023-24 में शुरू की गई। इसमें पुरानी पाँच स्कीमों- Seekho Aur Kamao (स्किल ट्रेनिंग), Nai Manzil, Nai Roshni (महिला नेतृत्व), USTTAD (पारंपरिक कला) और Hamari Dharohar- को मिला दिया गया। लेकिन 2024-25 में इसका खर्च शून्य के क़रीब रहा। केवल 30 करोड़ रिवाइज्ड में से कुछ ही। PM Jan Vikas Karyakram (PMJVK) अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जारी है, लेकिन उसकी भी उपयोग दर निराशाजनक है। NMDFC के सस्ते ऋण और वक्फ प्रबंधन स्कीमों में भी फंड अटके पड़े हैं।

इसका अल्पसंख्यकों पर असर यह हुआ कि शिक्षा दर में गिरावट आई, कौशल विकास में रुकावट पैदा हुई और उद्यमिता का अभाव हुआ। इससे मुस्लिम समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।

सच्चर कमेटी की आत्मा को ही मार दिया

सच्चर समिति (2006) के बाद बने मंत्रालय का उद्देश्य ही था कि मुस्लिमों का पिछड़ापन दूर हो, लेकिन मोदी काल में बजट 2021-22 के 4346 करोड़ से घटकर 2026-27 में 3400 करोड़ रह गया—वास्तविक ख़र्च तो और भी कम। सरकार का दावा है कि मुख्यधारा की योजनाओं (Skill India, PM Awas) में अल्पसंख्यक लाभ ले रहे हैं। लेकिन आँकड़े इस दावे को झुठलाते हैं। PMJVK और PM VIKAS के तहत प्रस्तावों की कमी, DBT पोर्टल की जटिलता और राज्य सरकारों के साथ समन्वय की कमी ने स्कीमों को लकवाग्रस्त कर दिया। सच्चाई है कि मोदी सरकार ने सच्चर कमेटी की आत्मा को ही मार दिया है।

'सबका विकास' के दावे पर सवाल

संसद की समिति ने बार-बार चेतावनी दी कि यह “सबका विकास” के दावे पर सवालिया निशान है। 2023-24 में 3098 करोड़ आवंटित थे, लेकिन खर्च सिर्फ 154 करोड़ (एक रिपोर्ट के अनुसार)। 2024-25 में 715 करोड़ खर्च। 2025-26 रिवाइज्ड में भारी कटौती। यह पैटर्न SC/ST कल्याण योजनाओं में भी देखा गया, जहाँ समिति ने 23% अनुपयोगित फंड पर सवाल उठाए। लेकिन अल्पसंख्यक मंत्रालय में स्थिति और भयावह है। CAG रिपोर्ट और राज्‍यसभा उत्तरों में भी यही तस्वीर उभरती है।
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मोदी सरकार की बहानेबाज़ी

मोदी सरकार का तर्क है कि बजट में कटौती “ओवरलैप” और “मुख्यधारा एकीकरण” के लिए है। लेकिन सच्चाई यह है कि अल्पसंख्यक-विशेष स्कीमों को खत्म करके सामान्य योजनाओं पर छोड़ दिया गया, जहां अल्पसंख्यक अक्सर हाशिए पर रह जाते हैं। PM VIKAS को “एक छत्र” स्कीम बनाकर पुरानी टारगेटेड योजनाओं को दफन कर दिया गया। परिणाम? लाखों अल्पसंख्यक छात्र बिना छात्रवृत्ति के, युवा बिना स्किल ट्रेनिंग के, महिलाएं बिना उद्यमिता सपोर्ट के। मुस्लिम युवाओं की बेरोजगारी दर ऊंची, शिक्षा छोड़ने की दर बढ़ी। ईसाई और सिख समुदायों में भी स्वास्थ्य-शिक्षा इंफ्रा की कमी।

राजनीतिक और सामाजिक अनदेखी

यह उपेक्षा सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक और राजनीतिक भी है। 2014 से पहले अल्पसंख्यक मंत्रालय का बजट बढ़ता जा रहा था। यूपीए काल में उपयोग दर 90-100% के आसपास थी। मोदी सरकार में 2022 के बाद अचानक 40-50% कट और 70-80% अनुपयोग। क्या यह संयोग है? या जानबूझकर अल्पसंख्यकों को विकास से वंचित रखने की रणनीति? स्थायी समिति ने मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन जवाब संतोषजनक नहीं। SNA में फंड अटकने, पोर्टल बदलाव (NSP 2.0) और “अनियमितताओं” के बहाने दिए गए, लेकिन जांच में देरी। छात्रवृत्ति स्कीम तीन साल से फ्रीज, कोई नया अप्रूवल नहीं।
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अल्पसंख्यक कल्याण पर यह हमला “सबका साथ” के नारे को झुठलाता है। सरकार दावा करती है कि मुख्य योजनाओं में अल्पसंख्यक शामिल हैं, लेकिन डेटा कहता है—PM Awas, Skill India में अल्पसंख्यक लाभार्थी अनुपात बहुत कम। PMJVK के तहत भी प्रोजेक्ट स्वीकृति धीमी। 2026-27 बजट में 3400 करोड़ का आवंटन “वृद्धि” दिखाने के लिए है, लेकिन रिवाइज्ड स्टेज पर कटौती का इतिहास देखते हुए यह भी कागजी होगा।
मोदी सरकार अल्पसंख्यक कल्याण के मुद्दे पर पूरी तरह कटघरे में है। बजट कटौती, स्कीम बंदी, फंड सरेंडर और उपयोग की कमी से साफ़ है कि “सबका विकास” सिर्फ चुनावी जुमला है। अल्पसंख्यक समुदायों की शिक्षा, रोजगार और सशक्तिकरण की उपेक्षा से देश की सामाजिक सद्भावना और आर्थिक प्रगति दोनों प्रभावित हो रही है। संसद की समिति ने जो सवाल उठाए, उन्हें गंभीरता से लिया जाए। अन्यथा, यह सरकार अल्पसंख्यकों के हितों की हत्या कर रही है। समय आ गया है कि सरकार जवाब दे—क्यों अल्पसंख्यक विकास के रथ से उतार दिए गए? क्या “सबका साथ” सिर्फ कागजों तक सीमित है?