IDBI बैंक में सरकार और LIC की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का फैसला देश के सबसे बड़े निजीकरणों में से एक है। 14 अक्टूबर 2026 को कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने कनाडा के Fairfax समूह की कंपनी 10955230 Canada Inc. को रणनीतिक खरीदार बनाने की मंजूरी दी। सौदे का आकार लगभग ₹52,878 करोड़ है, यानी ₹81 प्रति शेयर के हिसाब से। सरकारी घोषणा में यह भी दर्ज है कि आगे की नियामकीय अनुपालना बाकी है। इसलिए इसे अंतिम हस्तांतरण मान लेना जल्दबाजी होगी।
लेकिन असली बहस मंजूरी पर नहीं, बल्कि कीमत तय करने के तरीके पर है। और यही वह जगह है, जहाँ Businessworld की रिपोर्ट ने ऐसे दस्तावेजों का हवाला दिया है, जो सरकार की आधिकारिक कहानी से मेल नहीं खाते।
सबसे पहले उस संख्या पर गौर कीजिए, जिसने पूरे मामले को विवाद में डाल दिया है। शुरुआती दौर में सरकार ने न्यूनतम स्वीकार्य कीमत ₹94.42 प्रति शेयर तय की थी। बोलियाँ इससे नीचे रहीं और खारिज कर दी गईं। बाद के दौर में दो मूल्यांकनों का औसत ₹75.99 निकला और Fairfax की ₹81 प्रति शेयर की पेशकश स्वीकार कर ली गई। इन आंकड़ों की पुष्टि सरकार की अपनी घोषणा से होती है।
गणित सीधा है: स्वीकृत कीमत पहले के न्यूनतम मूल्य से ₹13.42 प्रति शेयर यानी करीब 14.2 प्रतिशत कम है। अकेले यह अंतर यह साबित नहीं करता कि सरकार को नुकसान हुआ। नुकसान साबित करने के लिए यह दिखाना होगा कि पुराना ₹94.42 का मूल्यांकन वाजिब था और उस कीमत पर कोई खरीदार मौजूद था।
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लेकिन इतना बड़ा उतार-चढ़ाव अपने आप में एक विस्तृत और सार्वजनिक स्पष्टीकरण मांगता है। सरकार ने अब तक यह नहीं बताया कि अगर ₹94.42 सही था, तो उसे छोड़ा क्यों गया और अगर गलत था, तो पहले उसे तय कैसे किया गया। यहीं पर Business world की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है।
पत्रकार पलक शाह की रिपोर्ट के मुताबिक, 13 अगस्त के एक आंतरिक DIPAM नोट में दर्ज घटनाक्रम बताता है कि 13 जुलाई को Fairfax की संशोधित बोली खोलने के बाद उसी दिन पुराने मूल्य को अलग रखकर नए मूल्यांकन के निर्देश दिए गए। रिपोर्ट कहती है कि नए मूल्यांकन में निजी बैंकों को तुलना से हटा दिया गया। रेलवे के कबाड़ की नीलामी में न्यूनतम कीमत से नीचे के प्रस्ताव स्वीकार करने की व्यवस्था का उदाहरण भी इस्तेमाल किया गया।
यहाँ केंद्रीय सवाल उठता है: नई कीमत निर्धारित करने की स्वतंत्र प्रक्रिया चल रही थी या सामने आ चुकी बोली को स्वीकार करने का आधार तैयार किया जा रहा था?

यह सवाल गंभीर है और इसका जवाब सरकार के इरादे पर टिप्पणी करके नहीं मिलेगा। जवाब संबंधित बैठकों के निर्णय, मूल्यांकन के निर्देश और एजेंसियों की रिपोर्ट सामने आने से ही मिलेगा।

वित्त मंत्रालय ने 29 अक्टूबर की रात सफाई देते हुए कहा कि पहला दौर समाप्त हो चुका था। उसके अनुसार, मूल्यांकन पद्धति की समीक्षा अप्रैल में हुई और एजेंसियों ने मई से संशोधित मूल्यांकन पर काम शुरू कर दिया था। मंत्रालय ने प्रक्रिया में आवश्यक बदलाव के लिए सचिवों के समूह को पहले से मिले अधिकारों का भी हवाला दिया। ह जवाब जाँच की दिशा तय करता है, लेकिन उसे खत्म नहीं करता।

  • अप्रैल में कौन-सी पद्धति अंतिम हुई थी? जुलाई में दिए गए निर्देश उससे किस तरह अलग थे? मूल्यांकन एजेंसियों ने कब प्रारंभिक निष्कर्ष बनाए और कब अंतिम रिपोर्ट दी?
  • यदि जुलाई के निर्देश केवल पहले लिए गए फैसले को लागू करते थे, तो दस्तावेज इसे स्पष्ट कर देंगे। यदि उन्होंने कीमत निकालने के आधार बदल दिए, तो सरकार को बताना होगा कि बोली खुलने के बाद ऐसा क्यों करना पड़ा।
  • "सचिवों के समूह को अधिकार था" कहना पर्याप्त नहीं है। अधिकार होना और उसका इस्तेमाल ठीक उसी दिन करना, जिस दिन खरीदार की बोली खुली- ये दो अलग बातें हैं।
  • अगर मूल्यांकन पद्धति अप्रैल में ही बदलनी थी, तो मई और जून में एजेंसियों ने काम क्यों नहीं शुरू किया? इसका जवाब दस्तावेजों में होना चाहिए, प्रेस नोट में नहीं।

बाजार भाव को हटाने का सवाल

बैंक का बाजार भाव ही उसकी सही कीमत हो, यह जरूरी नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बाजार भाव अक्सर उनके वास्तविक मूल्य से कम होता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि निजीकरण में बाजार भाव को ही आधार बनाना गलत होगा। लेकिन समस्या यह है कि सरकार ने बाजार भाव को न सिर्फ हटाया, बल्कि तुलना के लिए केवल सरकारी बैंकों को चुना। जिस बैंक को निजी नियंत्रण में बेचा जा रहा है, उसकी तुलना के लिए कौन-सी संस्थाएँ उपयुक्त थीं- इसका तर्क और आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए।

अगर निजी बैंकों को शामिल करने से कीमत बढ़ जाती, तो उन्हें हटाने का फैसला कीमत को कम करने वाला साबित होता है। यह फैसला किसने लिया, किस आधार पर लिया और क्या इसे बोली खुलने से पहले लिया गया था—ये तीन सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार को देना ही होगा।

कर विवादों की क्षतिपूर्ति: खरीदार को क्या-क्या रियायतें मिलीं?

दूसरा बड़ा मुद्दा कर विवादों का है। वित्त मंत्रालय ने विवादित कर मांगों के लिए क्षतिपूर्ति का प्रावधान स्वीकार किया है। उसका कहना है कि संभावित देनदारी ₹627 करोड़ है, जबकि बोली बढ़ने से सरकार और LIC के लिए सौदे का मूल्य ₹3,917 करोड़ बढ़ा। इसलिए यह कहना गलत होगा कि करदाता इतनी रकम दे चुका है। यह संभावित देनदारी है और हो सकता है कि इसका कुछ हिस्सा कभी भुगतान ही न करना पड़े।
मगर इससे अनुबंध की शर्तें जानने की जरूरत समाप्त नहीं होती। किन मामलों को सुरक्षा मिली है? भुगतान की सीमा और अवधि क्या है? किस परिस्थिति में सरकार खरीदार को क्षतिपूर्ति देगी और किसमें नहीं? अगर खरीदार द्वारा उठाया जाने वाला जोखिम घटता है, तो उसकी पेशकश बढ़ सकती है—यह सिद्धांत सही है। लेकिन सार्वजनिक हित का परीक्षण इस पूरे पैकेज का होना चाहिए, सिर्फ घोषित बिक्री मूल्य का नहीं। ₹81 प्रति शेयर की तारीफ करते समय यह भी बताना होगा कि उसके साथ खरीदार को क्या-क्या रियायतें दी गई हैं।

प्रेम वत्स कौन हैं और उनसे जुड़ी मेहरबानियों का सच क्या है?

अब उस हिस्से पर आते हैं, जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक शोर है—प्रेम वत्स कौन हैं और उनसे जुड़ी मेहरबानियों का सच क्या है?
Fairfax Financial Holdings कनाडा की सूचीबद्ध वित्तीय कंपनी है। इसके संस्थापक, चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी वी. प्रेम वत्स हैं। कंपनी के विशेष मतदान अधिकार वाले शेयरों की व्यवस्था उन्हें मजबूत प्रभावी नियंत्रण देती है, लेकिन इसे उनकी सौ प्रतिशत निजी कंपनी कहना गलत होगा। दूसरे शेयरधारकों का भी इसमें निवेश है।

बेंगलुरु एयरपोर्ट: क्या प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद मंजूरी मिली?

पुराने मामलों में सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बेंगलुरु एयरपोर्ट का घटनाक्रम है। Fairfax ने 2016 में निजी शेयरधारकों से हिस्सेदारी खरीदने के समझौते किए थे। सरकारी मंजूरियों में देरी हुई। मार्च 2017 की Business Standard रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षा मंजूरी में देरी के कारण वत्स ने जनवरी में प्रधानमंत्री से मुलाकात की। बाद में लगभग ₹2,522 करोड़ में 38 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिग्रहण पूरा हुआ।
लेकिन एक जरूरी दूसरा तथ्य भी है।
जनवरी की Economic Times रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय सुरक्षा मंजूरी की सिफारिश कई महीने पहले कर चुका था। नागरिक उड्डयन मंत्रालय की कुछ मंजूरियाँ और स्पष्टीकरण बाकी थे। इसलिए मुलाकात और मंजूरी के घटनाक्रम से व्यक्तिगत हस्तक्षेप के कारण नियम बदलने का निष्कर्ष नहीं निकलता। जाँच का सही विषय यह होगा कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई निर्देश गया, उसका स्वरूप क्या था और मंजूरी की प्रक्रिया में कोई अपवाद बनाया गया या नहीं।
एयरपोर्ट की संचालन रियायत 2068 तक है, जिससे दीर्घकालीन कमाई और निवेश मूल्य को लाभ होना स्वाभाविक है। हालांकि Fairfax के 2018 के आधिकारिक दस्तावेज में ही 2038 की मूल अवधि के साथ अतिरिक्त 30 वर्ष के विस्तार का अधिकार दर्ज था। इसलिए पूरे विस्तार को बाद में बनाई गई विशेष मेहरबानी कहना उचित नहीं होगा। असली परीक्षण विस्तार की शर्तों, सरकार के राजस्व हित और अनुबंध के पालन का होना चाहिए।

CSB बैंक: Fairfax को मिली मंजूरी क्या विशेष रियायत थी?

CSB बैंक के मामले में Fairfax को Catholic Syrian Bank, अब CSB Bank, में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए लगभग ₹1,210 करोड़ निवेश की नियामकीय मंजूरी मिली। अक्टूबर 2018 में कंपनी ने सभी जरूरी मंजूरियाँ मिलने और शुरुआती निवेश पूरा होने की घोषणा की। यह समूह के लिए महत्वपूर्ण कारोबारी अवसर था।
साथ ही, बैंक को पूँजी की जरूरत थी और मंजूरी में सूचीबद्ध होने तथा समय के साथ हिस्सेदारी घटाने की शर्तें थीं। RBI की अनुमति को सीधे प्रधानमंत्री का आदेश बताना प्रमाण से आगे जाना होगा। बाद में दीर्घकालीन हिस्सेदारी 15 की जगह 26 प्रतिशत रखने की अनुमति भी मिली, लेकिन निजी बैंकों के प्रमोटरों के लिए यही व्यापक नीति परिवर्तन RBI ने 2021 में स्वीकार किया था। इसलिए इसे केवल Fairfax के लिए बनाई गई छूट नहीं कहा जा सकता। संतुलित परीक्षण में यह भी दर्ज होना चाहिए कि Fairfax के निवेश वाली IIFL Finance के नए गोल्ड लोन कारोबार पर RBI ने मार्च 2024 में रोक लगाई थी। सितंबर में सुधारात्मक कार्रवाई के बाद रोक हटी। यह उस दावे के विरुद्ध तथ्य है कि समूह के कारोबारों को हर समय नियामकीय संरक्षण मिला।
₹52,878 करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति बेचते समय प्रमाण चाहिए
इन सबका सार यह है कि उपलब्ध रिकॉर्ड प्रेम वत्स की राजनीतिक पहुँच और मोदी के प्रति पुराने समर्थन की पुष्टि करता है। उनके कारोबारों को महत्वपूर्ण मंजूरियाँ भी मिलीं। इनमें कुछ निर्णय व्यापक नीति या पुराने अनुबंधों के अंतर्गत थे। कुछ के घटनाक्रम की और जाँच जरूरी है।
लेकिन IDBI के मामले में सबसे गंभीर प्रश्न मूल्यांकन और निर्णयों के समय-क्रम का है। BW की रिपोर्ट सार्वजनिक हित की महत्वपूर्ण पड़ताल है। फिर भी, रिपोर्ट में उद्धृत मूल आंतरिक नोट का स्वतंत्र प्रमाणीकरण किए बिना उसके प्रत्येक आरोप को अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। दूसरे बोलीदाता को गृह मंत्रालय द्वारा खारिज किए जाने का प्रचलित दावा भी उपलब्ध BW रिपोर्ट से मेल नहीं खाता। उसमें समीक्षा के बाद दोनों को मंजूरी मिलने की बात है। इसलिए सरकार को संबंधित बैठकों के निर्णय, मूल्यांकन एजेंसियों को दिए गए निर्देश, मूल्यांकन रिपोर्टों के आवश्यक हिस्से और कर क्षतिपूर्ति की शर्तें सामने रखनी चाहिए।
प्रेम वत्स का मोदी का प्रशंसक होना किसी सौदे को अवैध नहीं बनाता। लेकिन इतनी बड़ी सार्वजनिक हिस्सेदारी बेचते समय सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दस्तावेजों से दिखाए—प्रक्रिया निष्पक्ष थी, जोखिमों का पूरा हिसाब हुआ और जनता को उचित मूल्य मिला। जब तक बोली खुलने के बाद मूल्यांकन नियम बदलने की तारीख, कारण और अधिकार सार्वजनिक नहीं होते, तब तक यह कहना कि "सब कुछ पारदर्शी था" एक दावा है, प्रमाण नहीं। और ₹52,878 करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति बेचते समय दावा काफी नहीं हैृ- प्रमाण चाहिए।