एक भारतीय आत्मा पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पंक्तियां हैं : जन गण मन अधिनायक तेरा उसे विश्व का दास न कर तू। ये पंक्तियां उन्होंने बीती शती में आजादी के कुछ साल बाद लिखी थीं। इसी कविता की पंक्ति है : सिर के ऊपर पेट चढ़ाकर अपना सत्यानाश न कर तू। माखन लाल चतुर्वेदी ओज और तेज के गायक-कवि थे। उन्होंने 'पुष्प की अभिलाषा' जैसी कविता भी लिखी है। उनके लिये वह फूल वरेण्य है, जो सुरबाला के केशों में गूँथे जाने की चाह नहीं रखता वह वनमाली से यह कहकर तोड़ने की याचना करता है कि उसे उस पथ पर फेंक दिया जाये, जिस पथ से मातृभूमि पर शीश चढ़ाने को मतवाले वीर गुजरते हैं।
यह स्वतंत्रता का गौरव-गान है। यह स्वतंत्रता का स्तवन है। यह मुक्ति का स्फूर्त-छंद है। यह आजादी की महिमा का बखान है। आजादी क्या है? आजादी से बड़ी कोई नेमत नहीं। उस पर सब कुछ निसार है। उस पर कलधौत के धाम निछावर हैं। आजादी है तो वन है। आजादी ऐसी दौलत है, जिसका न तो मोल लगाया जा सकता है और न ही जिसकी कीमत कूती जा सकती है। इन्हीं अर्थों में पंद्रह अगस्त भारत के सुदीर्घ और आरोह-अवरोह भरे इतिहास की सबसे उजली और मानीखेज तारीख है।
इस दिन वैश्विक परिदृश्य में भारत ऐसे विलक्षण राष्ट्र के रूप में उभरा था, जिसने कृशकाय किंतु तप:पूत महात्मा गांधी नामक विश्व इतिहास के विलक्षणतम महानायक के नेतृत्व में सत्याग्रह और बलिदानों से दासता से मुक्ति पाई थी। गांधी जागृत महामना थे, लेकिन उनकी महत्ता यह थी कि उन्होंने कोटि-कोटि जन को जागृत किया। उन्होंने कोटि-कोटि भारतीयों को सत्याग्रही योद्धाओं में बदल दिया। उनका आचरण कि विश्व मानवता विस्मित हो उठी। उनके लिये सत्य ही ईश्वर था। उनका अभीष्ट था जन की मुक्ति; सिर्फ राजनीतिक मुक्ति नहीं, समाज की अस्पृश्यता, हिंसा, लिंग-भेद, असमानता, अंधविश्वासों और कुरीतियों से मुक्ति। वे गैर-बराबरी के खिलाफ थे। वे सांप्रदायिकता के खिलाफ थे। वे राजतंत्र और दमनतंत्र के खिलाफ थे। जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्य उन्हें स्वीकार्य न था। उनका जीवन ही उनका संदेश था और उनकी हत्या विश्व मानवता के लिए स्तब्धकारी सबक कि अनिष्ठकारी, प्रतिगामी और शक्तियों को न तो गांधी पसंद हैं और न ही उनका मार्ग और न ही उनके सपने।
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जाहिर है कि गांधी उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थे और आज भी हैं। गांधी सत्य, शुचिता, लोक और लोकमंगल की व्यवस्था में प्रतिष्ठा के हिमायती थे। डॉ. आंबेडकर का संविधान गांधी के संघर्ष और सपनों के आलोक में लिखा गया। विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसी महान और स्निग्ध आलोक में 'जनगण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता' रचा। नेताजी सुभाष बोस की प्रेरणा से यह स्वरबद्ध हुआ।
इस तरह पंद्रह अगस्त जनगण की प्रतिष्ठ का लोकपर्व है। वह किसी जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग, वर्ण या संगठन विशेष का नहीं, अपितु एक अरब पैंतालिस करोड़ भारतीयों का महापर्व है। मगर सन 1947 और सन 2026 में सिर्फ वर्षों का नहीं, वातावरण का भी फासला है। यह फासला दहाई दर दहाई घट-बढ़ का शिकार रहा है। आज हम कहां खड़े हैं और किस दिशा में अग्रसर हैं? यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है, कि उत्तर के लिए हम किसी युधिष्ठिर को तलाशें। हम सबके भीतर युधिष्ठिर है, जिसे नंगी आंखों से सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा है।

जंतर-मंतर पर जेन जी का आंदोलन चक्षुरून्मीलन का प्रसंग है। भविष्य में ऐसे प्रसंग बढ़ेंगे। हां यह यक्ष प्रश्न जरूर है कि असहमति, विरोध और आंदोलन के प्रति सत्ता का सलूक कैसा हो? यह भी यक्ष प्रश्न है कि व्यवस्था की सक्रियता का अभीष्ट जनगण है अथवा इनेगिने विशिष्टजन या संप्रदाय विशेष? बात नात्सी, फासी या सेक्यूलर शब्दावली की नहीं है, मुद्दा यह है कि हम कितने संवेदनशील उदात्त हैं और समावेशी या सामासिक समाज के निर्माण के लिए हमारी आस्था और आचरण की क्या दशा और दिशा है? मुद्दा यह भी है कि राजनीतिक व्यवस्था में शीर्ष का जनगण से सरोकार है या नहीं और यदि है तो कितना है और उसकी निष्ठा किस दर्शन या वाद के प्रति है?

इधर लगभग रोजाना जो खबरें मिल रही हैं, वे भयावह हैं। उनके लिये चिंताजनक शब्द सचमुच छोटा है। ऐसी खबरें अपने गर्भ में अत्यंत अनिष्टकारी और खतरनाक आशंकाओं को समेटे हुये हैं। ज्यादा पीछे न जायें। इसी अगस्त मास की खबर है। आठ अगस्त को उत्तराखंड में हल्द्वानी में एक सभा हुई। सभा को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अध्यक्ष और सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने संबोधित किया। सभा संपन्न हो गयी। कोई बड़ी बात नहीं। गंभीर और बड़ी बात वह है, जो इसके बाद घटित हुई। उसके बाद कथित सनातनी तत्वों ने वहां शुद्धिकरण के लिये हवन किया। यह एक शर्मनाक कृत्य था। उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार है, लेकिन सरकार की भृकुटि में बल नहीं पड़े।
खड़गे ने जब यह मामला संसद में उठाया तो न तो प्रधानमंत्री का बयान आया और न ही गृहमंत्री का। कार्रवाई होने की बात तो दूर, जेपी नड्डा ने यह कहकर कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली कि मामले की जांच होगी। यह घटना अपनी तरह की इकलौती या अपूर्व घटना नहीं है। मई, सन 2024 में सपा-नेता अखिलेश यादव के साथ भी कन्नौज के गौरीशंकर मंदिर में ऐसा ही हुआ था। तब भी मंदिर को गंगाजल से धोया गया था। अप्रैल, सन 25 में राजस्थालन में अलवर में टीकाराम जूली के साथ यही हुआ था। बीजेपी के ज्ञानदेव आहुजा सुर्खियों में उभरे थे। प्रकरण बहुतेरे हैं। इन प्रकरणों में क्या कार्रवाई हुई? कार्रवाई के नाम पर सिफर के पीछे कौन सी शक्तियां और मानसिकता काम कर रही है?
अध्योध्या में भव्य और विराट मंदिर बना। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को क्यों नहीं बुलाया गया? क्या स्त्री और आदिवासी होने से वह अपात्र हो गयीं? सोचने की बात है कि धर्म-ध्वजाधारी कैसे धर्म की दुहाई दे रहे हैं और वे धर्म के पोषक हैं अथवा अधर्म के? खड़गे परिपक्व और जुझारू नेता हैं, जो कहते हैं कि मुझमें लड़ने की शक्ति है और मैं लड़ता हूं। वह कोई रियायत नहीं मांगते। वह नौ बार एमएलए और पांच बार एमपी रहे हैं। अखिलेश की पृष्ठभूमि भी सबको ज्ञात है। जब अखिलेश और खड़गे के साथ ऐसा घृणित सलूक हो सकता है तो सोचकर ही कंपकपी आती है कि कथित सनातनियों के मन में कैसी आसुरी शक्तियां पनप चुकी हैं और इस घटनाक्रम की अंतिम परिणति क्या होगी? सोचने की बात है कि तब दलितों, वंचितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का क्या होगा? ये घटक ही तो हमारे जनगण की संरचना करते हैं।
एक और खबर। तारीख के मान से ताजा खबर। वर्ष 2013 में मुजफ्फर नगर दंगों से जुड़े मामले में विशेष एमपी, एमएलए अदालत ने 25 कार्यकर्ता आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की अभियोजन पक्ष की याचिका को स्वीकार कर लिया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का यह फैसला प्रश्न खड़े करता है। यह प्रश्न पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति में गेमचेंजर सिद्ध हुआ था। सोचने की बात है कि ताजा फैसले से किसे गिज़ा मिलेगी और किसे हवा?
गौरतलब है कि पिछली दहाई में देश में क्या हुआ है? लोकतंत्र की गाड़ी का स्टीयरिंग व्हील किन हाथों में है और उसे कितने कोण से मोड़ा गया है? संवैधानिक संस्थाओं और सार्वजनिक उपक्रमों की दशा और दिशा पर पोथियां लिखी जा सकती हैं। क्या हमें इन पर श्वेत-पत्र की जरूरत है? यह अकारण नहीं है कि नलसार, हैदराबाद विश्वविद्यालय के कानून के छात्र दीक्षांत समारोह में सुप्रीम कोर्ट के सीजे के हाथों डिग्रियां लेने का विरोध करते हैं। कानून के छात्रों के लिये सीजेआई के हाथों सनद लेना गर्व की बात होनी चाहिये थी, मगर वे ऐसा नहीं चाहते। क्यों? उत्तर में आज का 'सत्य' निहित है। क्षेपक यह कि बर कौंसिल आफ इंडिया विवाद में कूदकर कड़ा फर्मान जारी करती है, लेकिन छात्रों के सत्याग्रह की चेतावनी से उसके हाथ-पांव फूल जाते हैं और वह फर्मान वापस ले लेती है, मगर उसकी मानसिकता उदघाटित होने से बच नहीं पाती।

संप्रति, सबका सलीका और सलूक कसौटी पर है? जो बिरादरी नियामक शक्तियों के निशाने पर है, वो सबको दीख रही है, मगर अभी अनदीखती बिरादरियां और भी हैं। जनगण का बड़ा वर्ग खतरे में है। देश में कुछ राज्य देखते ही देखते 'पेट्री तश्तरी' बन गये हैं। भगवा-ब्रिगेड की प्रयोगशालाएं अनेक हैं। तो क्या जनगण का बड़ा वर्ग भविष्य में 'घेट्टो' में निर्वासित होने को बाध्य होगा?

यह प्रश्न सिर्फ पंद्रह अगस्त पर नहीं, यूं भी मौजूं है कि क्या हम वाकई लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं, जिसका वायदा संविधान ने हमसे किया था या फिर लोकतंत्र प्रहसन या स्वांग में बदल गया है? क्या संप्रति नियामक शक्तियां जनगण को छल रही हैं और प्रपंच में लिप्त है? जनगण और लोकतंत्र का सीधा रिश्ता है, क्या लोकतंत्र को छूछा और रिक्त किया जा रहा है और लोकतंत्र और मुक्त बाजार काबिज ताकतों के जरिये 'बावरा अहेरी' में बदल गये हैं?
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आज क्या हम बोगदे में हैं? क्या हमें रोशनी का सिरा दीख रहा है? स्वतंत्र्यचेता समाज ही स्वतंत्रता की रक्षा कर सकता है, खोट और खुरंट से ग्रस्त दासवृत्ति का समाज नहीं। सुश्री अरूंधति राय का 'कठघरे में लोकतंत्र' में प्रश्न कौंधता है : क्या लोकतंत्र के बाद जीवन है? और हाँ, तो उस जीवन का स्वरूप क्या होगा? कभी धूमिल ने पूछा था : क्या आजादी तीन थके हुये रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढो रहा है? इन प्रश्नों से इस महादेश के जनगण मन अधिनायक का भविष्य भी जुड़ा हुआ है।