कांग्रेस में बहुत सारे ऐसे नेता हैं जिन्हें राजनीतिक भाषा में “अनगाइडेड मिसाइल” कहा जा सकता है। वे कब, किस संदर्भ में और किस भावावेश में ऐसा कुछ कह दें जिससे अपनी ही पार्टी और नेतृत्व को नुकसान पहुँचे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल होता है।
संदीप दीक्षित का नाम अब उस सूची में जुड़ गया है। पता नहीं वे किस उत्साह में थे, किस तरह की राजनीतिक चतुराई दिखाना चाहते थे, किसे खुश करने की कोशिश कर रहे थे या फिर उनके मन में क्या चल रहा था कि उन्होंने वह बात सार्वजनिक रूप से कह दी जो आम तौर पर राजनीतिक मंचों से नहीं कही जाती।
राहुल गांधी ने उनकी टिप्पणी को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया। यह एक तरह से समझदारी भरा कदम था, क्योंकि हर विवाद को बड़ा बनाना आवश्यक नहीं होता। फिर भी, यदि वे उसी समय स्पष्ट शब्दों में उस टिप्पणी को ख़ारिज़ कर देते तो शायद अधिक प्रभावी संदेश जाता।
राजनीति में कई बार चुप्पी भी एक संदेश बन जाती है। यह कोई असाधारण चूक नहीं है; बड़े से बड़े नेता से भी ऐसे अवसरों पर निर्णयगत भूल हो जाती है। लेकिन अब भी इसकी भरपाई की जा सकती है। यदि कांग्रेस सार्वजनिक जीवन की मर्यादा और राजनीतिक संवाद की गरिमा पर स्पष्ट रुख़ अपनाती है तो वह इस प्रसंग को एक सकारात्मक दिशा में मोड़ सकती है।
लेकिन इस पूरे विवाद को केवल एक व्यक्ति की टिप्पणी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जो गहरे स्तर पर पितृसत्तात्मक है। पुरुष और महिला के संबंधों को लेकर उसमें अनेक पूर्वाग्रह, कल्पनाएँ और कुंठाएँ मौजूद हैं।
भारतीय समाज में सेक्स और लैंगिक संबंधों को लेकर जो दबी हुई मानसिकताएँ हैं, वे किसी से छिपी नहीं हैं। अंतर केवल इतना है कि अधिकांश समय वे बंद कमरों, निजी बातचीतों और संकेतों के स्तर पर रहती हैं। जैसे ही वही बातें सार्वजनिक मंच पर पहुँचती हैं, विवाद पैदा हो जाता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि टिप्पणी कौन कर रहा है। सार्वजनिक जीवन में लोगों की प्रतिक्रिया अक्सर कथन की गंभीरता से कम और वक्ता की राजनीतिक पहचान से अधिक निर्धारित होती है। यदि कोई साधारण नेता या विपक्ष का व्यक्ति कुछ कह दे तो उसकी आलोचना होती है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए अक्सर अलग मानदंड बना दिए जाते हैं।
पिछले वर्षों में हमने ऐसे अनेक उदाहरण देखे हैं जहाँ महिलाओं के बारे में, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बारे में या सामाजिक समूहों के बारे में अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं, लेकिन उन्हें या तो सामान्य बना दिया गया या फिर उनके महत्व को कम करके दिखाया गया।
यहाँ एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि राजनीति में सार्वजनिक संवाद की भाषा का यह पतन आखिर शुरू कब हुआ। यह सही है कि भारतीय राजनीति कभी पूरी तरह शालीन और सभ्य नहीं रही। नेहरू के समय में भी कटुता थी। जवाहरलाल नेहरू और उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित के बारे में तरह-तरह की अफ़वाहें और भद्दी बातें फैलाई जाती थीं। महात्मा गांधी के निजी जीवन को लेकर भी दशकों से असभ्य टिप्पणियाँ होती रही हैं। इंदिरा गांधी को भी राजनीतिक आलोचना से आगे बढ़कर व्यक्तिगत हमलों का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि फिदेल कास्त्रो जैसे नेता, जो इंदिरा गांधी के प्रति सम्मान व्यक्त करते थे, उन्हें भी सस्ती राजनीतिक व्याख्याओं का विषय बना दिया गया।
फिर भी, इन उदाहरणों के बावजूद यह कहना कठिन है कि पहले के दौर में ऐसी भाषा राजनीतिक मुख्यधारा का सामान्य हिस्सा थी। पिछले एक दशक में स्थिति अलग दिखाई देती है। राजनीतिक संवाद में व्यक्तिगत कटाक्ष, अपमानजनक उपमाएँ, सोशल मीडिया आधारित ट्रोल संस्कृति और विरोधियों को मानवीय गरिमा से वंचित करने वाली भाषा अधिक सामान्य हुई है। इस बदलाव के केंद्र में नरेंद्र मोदी की राजनीति को देखना पड़ेगा। उनके समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने केवल आक्रामक राजनीतिक शैली अपनाई है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनके दौर में राजनीतिक भाषा का स्तर व्यापक रूप से बदला है।
सवाल ये है कि राजनीति में भाषाई महापतन का दौर किसने शुरू किया? क्या राहुल गाँधी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्या कभी उन्होंने ऐसी अशोभनीय टिप्पणी की है, नहीं की है? ये दौर तो मोदी युग से शुरू होता है। उन्होंने न केवल सेक्स संबंधी बल्कि कई और तरीक़ों से गरिमाहीन व्यवहार किया है और निरंतर किया है। उनकी देखादेखी, गंदी जु़बान वाले निशिकांत दुबे, गिरिराज सिंह, अनुराग ठाकुर जैसे लोगों की एक टीम खड़ी हो गई है। अमित मालवीय तो एक गैंग के सरगना हैं ही।
जेन ज़ी के आंदोलन में जो ग़ालियाँ सुनाई दीं, वे मोदी द्वारा खड़ी की गई राजनीतिक संस्कृति की प्रतिध्विनि थीं। वे उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहे थे। आपको भला लगा या बुरा, मगर वे शून्य से नहीं उपजी थीं। मर्यादाएं पहले बड़ों ने तोड़ीं, फिर बच्चों ने।
फिर ये भी नहीं भूलना चाहिए कि समय के हिसाब से भाषा भी बदलती रहती है। सोशल मीडिया ने भाषा बदल डाली है। युवाओं के आंदोलनों और डिजिटल राजनीतिक संस्कृति में जो शब्दावली उभरी है, उस पर समाजशास्त्रीय ढंग से ध्यान देना चाहिए। कई लोगों को वह अशिष्ट और अस्वीकार्य लग सकती है, लेकिन उसे केवल नैतिकता के प्रश्न के रूप में नहीं देखा जा सकता। वह दरअसल उसी राजनीतिक संस्कृति की प्रतिक्रिया है जिसे स्थापित नेतृत्व ने वर्षों तक बढ़ावा दिया। जब बड़े नेता मर्यादा तोड़ते हैं तो युवा पीढ़ी उसे और आगे ले जाती है। पहले बड़ों ने सीमाएँ तोड़ीं, फिर बच्चों ने।
अब देखिए कि सोशल मीडिया पर जाने कब से मेलोनी भाभी चल रहा है। ऐसे वीडियो हैं जिनमें दोनों की शादी और बच्चे भी हो गए हैं। और इनकी प्रेरणा भी मोदी ही हैं। वे जब मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट देते हुए छिछोरेपन के साथ खी खी करते हैं तो जेन ज़ी समझ जाती है कि मोदी की कुंठाएं क्या हैं। मेलोडी मतलब- मेलोनी+मोडी। अगर मोदी ऐसा न करते तो आज उनको लेकर इस तरह के मज़ाक भी न किए जाते।
आज भारतीय राजनीति में ऐसे नेताओं और प्रचारकों की पूरी एक पंक्ति दिखाई देती है जिनकी पहचान ही उग्र, उत्तेजक और विभाजनकारी भाषा बन गई है। निशिकांत दुबे, गिरिराज सिंह, अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं के वक्तव्य बार-बार विवाद का कारण बने हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय राजनीतिक प्रचार तंत्र ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ किया है। राजनीतिक बहस को तर्क, नीति और विचारधारा से हटाकर व्यंग्य, अपमान, चरित्रहनन और ट्रोलिंग की दिशा में धकेला गया है।
सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज़ किया है। वहाँ भाषा का स्वभाव ही अलग है। व्यंग्य, मीम, कटाक्ष, संकेत, निजी जीवन पर टिप्पणियाँ और राजनीतिक हस्तियों का लोकप्रिय संस्कृति के पात्रों में रूपांतरण—ये सब अब सामान्य हो चुके हैं। मेलोनी को लेकर चलने वाले मीम, वीडियो और मज़ाक इसी संस्कृति का हिस्सा हैं। उनमें से कई बेहद सतही, बचकाने या अशोभनीय हो सकते हैं, लेकिन वे इस बात का संकेत भी हैं कि राजनीति अब केवल संसद या चुनावी सभाओं में नहीं, बल्कि डिजिटल संस्कृति के मैदान में भी लड़ी जा रही है।
युवाओं की यह भाषा राजनीति को प्रभावित कर रही है। राहुल गांधी की शैली में भी इसका प्रभाव दिखाई देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया, बल्कि यह कि उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक वक्तृत्व की जगह अधिक नाटकीय, दृश्यात्मक और सोशल मीडिया-अनुकूल शैली अपनाई। वे स्पष्ट रूप से उस पीढ़ी से संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं जो टीवी बहसों से अधिक रील, मीम और छोटे वीडियो के माध्यम से राजनीति को समझती है।
इसलिए यह मान लेना कि पुरानी राजनीतिक भाषा अपने आप लौट आएगी, शायद एक भ्रम है। राजनीति का नया दौर आ चुका है। उसे पसंद किया जा सकता है या नापसंद, लेकिन नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत में लगभग पैंसठ करोड़ युवा हैं और उनकी संचार संस्कृति पिछली पीढ़ियों से अलग है। वे औपचारिकता की भाषा से कम और प्रत्यक्षता की भाषा से अधिक प्रभावित होते हैं।
फिर भी, इसका अर्थ यह नहीं कि मर्यादा अप्रासंगिक हो गई है। लोकतंत्र में असहमति और आक्रामकता की जगह हो सकती है, लेकिन अमर्यादा की नहीं। यदि राजनीति की भाषा को बेहतर बनाना है तो पहल वहीं से आनी चाहिए जहाँ सबसे अधिक शक्ति केंद्रित है।
भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के पास यह क्षमता है कि वे राजनीतिक संवाद का स्वर बदल सकते हैं। यदि वे सार्वजनिक रूप से संयमित भाषा के पक्ष में खड़े हों, अपनी पार्टी के नेताओं को भी उसी दिशा में प्रेरित करें, ट्रोल संस्कृति से दूरी बनाएँ और राजनीतिक विरोधियों के प्रति सम्मानजनक भाषा का उदाहरण प्रस्तुत करें, तो उसका प्रभाव पूरे राजनीतिक तंत्र पर पड़ेगा।
लेकिन समस्या यह है कि पिछले एक दशक का अनुभव ऐसी आशा को बहुत मजबूत आधार नहीं देता। मोदी की राजनीति का बड़ा हिस्सा भावनात्मक ध्रुवीकरण, तीखे विभाजन और आक्रामक राजनीतिक संप्रेषण पर आधारित रहा है। इसलिए उनसे भाषा परिवर्तन की पहल की उम्मीद करना आसान नहीं है। जब राजनीतिक लाभ किसी खास शैली से मिलने लगे तो उसे छोड़ना नेताओं के लिए कठिन हो जाता है।
हालाँकि, इस पूरी बहस में एक और गंभीर पहलू है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। महिलाओं के बारे में की जाने वाली भद्दी टिप्पणियाँ निस्संदेह आपत्तिजनक हैं, लेकिन उनसे भी अधिक खतरनाक वह भाषा है जो धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध सामान्यीकृत की जा रही है।
किसी महिला के बारे में अश्लील मज़ाक और किसी पूरे समुदाय के विरुद्ध नफ़रत फैलाने वाली भाषा, दोनों लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं, लेकिन दूसरे प्रकार की भाषा का सामाजिक प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और विनाशकारी हो सकता है।
जब किसी समुदाय के प्रति घृणा को सामान्य बना दिया जाता है, जब उसे राष्ट्र-विरोधी, संदिग्ध या कमतर नागरिक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब केवल शब्द नहीं बदलते, समाज का नैतिक ढाँचा बदलने लगता है।
ऐसे माहौल में यति नरसिंहानंद या टी. राजा जैसे लोग केवल लक्षण हैं, बीमारी नहीं। बीमारी कहीं अधिक गहरी है। वह उस राजनीतिक वातावरण में है जो ऐसी आवाज़ों को जगह देता है, उन्हें वैधता प्रदान करता है और कई बार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनसे लाभ उठाता है।
यही कारण है कि राजनीति की भाषा पर चर्चा केवल किसी एक टिप्पणी, किसी एक नेता या किसी एक विवाद तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
सवाल यह है कि हम किस तरह का सार्वजनिक जीवन चाहते हैं। ऐसा जीवन जिसमें विरोधी शत्रु बन जाए, महिलाएँ उपहास का विषय बन जाएँ और अल्पसंख्यक संदेह के पात्र; या ऐसा जीवन जिसमें तीखी राजनीतिक असहमति के बावजूद मानवीय गरिमा बनी रहे।
दुर्भाग्य से हम पहले रास्ते पर काफ़ी दूर तक आ चुके हैं। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह आत्म-सुधार की संभावना कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होने देता। प्रश्न यह है कि क्या हमारे राजनीतिक नेतृत्व में, सत्ता और विपक्ष दोनों में, उस संभावना को पहचानने और उसे अपनाने का साहस बचा है।