रूसी लेखक लियो टॉल्स्टॉय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास वार एंड पीस में 1812 की ऐतिहासिक लड़ाई बैटल ऑफ बोरोडिनो का एक दिलचस्प चित्रण किया है। उस दृश्य में फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट पूरे आत्मविश्वास के साथ आदेश देते दिखाई देते हैं। उन्हें लगता है कि वे इतिहास की दिशा तय कर रहे हैं कि उनके आदेशों के अनुसार युद्ध का परिणाम तय होगा।
लेकिन टॉल्स्टॉय का तर्क बिल्कुल अलग है। उनके अनुसार युद्ध का परिणाम किसी एक व्यक्ति के आदेशों से नहीं तय होता। असल में हजारों-लाखों सैनिकों की गतिविधियाँ, मौसम, भूगोल, संयोग, भय, साहस और अनगिनत छोटी-छोटी परिस्थितियाँ मिलकर इतिहास को आकार देती हैं। बाद में नेता और इतिहासकार इन घटनाओं को एक कहानी के रूप में प्रस्तुत करते हैं और उसे ‘रणनीति’ का नाम दे देते हैं। दूसरे शब्दों में अक्सर जो ‘नियंत्रण’ दिखाई देता है, वह वास्तव में नियंत्रण का भ्रम होता है।
आज की वैश्विक राजनीति में भी कभी-कभी वही स्थिति दिखाई देती है। 28 फ़रवरी को ईरान के परमाणु ढाँचे पर हुए हमलों और उसके बाद की घटनाओं को इसी नज़रिए से देखा जा सकता है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की रणनीति यह थी कि एक तेज़ और निर्णायक सैन्य कार्रवाई से ईरान की नेतृत्व संरचना को तोड़ दिया जाए। उम्मीद यह थी कि यदि शीर्ष नेतृत्व हट जाता है तो एक अपेक्षाकृत नरम और समझौता-प्रिय नेतृत्व उभर सकता है और फिर क्षेत्रीय तनाव कम किया जा सकता है। लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं निकली।
हमलों के तुरंत बाद मध्य-पूर्व का पूरा रणनीतिक परिदृश्य बदलने लगा। फारस की खाड़ी के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz में तनाव बढ़ गया। यह वही जलमार्ग है जिससे होकर दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि इस मार्ग पर संकट पैदा होता है तो उसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
साथ ही खाड़ी के कई शहरों के ऊपर मिसाइलों के ख़तरे की ख़बरें आने लगीं। इस पूरे संकट ने यह संकेत दिया कि किसी भी सैन्य कार्रवाई का परिणाम पहले से तय नहीं होता। घटनाएँ अक्सर अपनी ही दिशा में बढ़ने लगती हैं।
ईरान की प्रतिक्रिया भी दिलचस्प रही। उसने सीधे-सीधे पूर्ण युद्ध की घोषणा नहीं की। इसके बजाय उसने सीमित लेकिन प्रभावी दबाव बनाने की नीति अपनाई। यह ऐसी रणनीति थी जिसमें विरोधी पक्ष की लागत बढ़ाई जाए, लेकिन ऐसी सीमा पार न की जाए जिससे तुरंत व्यापक युद्ध शुरू हो जाए।

इस तरह की रणनीति में संदेश साफ़ होता है- हम प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन हम पूरी तरह युद्ध नहीं चाहते। यह एक प्रकार का संतुलन बनाना है। लेकिन इस पूरी स्थिति में एक और शक्ति चुपचाप घटनाओं को देख और समझ रही थी- चीन।

बीजिंग ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया, न ही उसने कोई नाटकीय बयान दिया। फिर भी कई विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने इस संकट की दिशा को गहराई से समझा। चीन की विदेश नीति अक्सर धैर्य और दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित होती है। वह कई बार सीधे कदम उठाने के बजाय परिस्थितियों को विकसित होने देता है और फिर उस बदलते संतुलन का लाभ उठाता है।

ईरान की आंतरिक राजनीति

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू ईरान की आंतरिक राजनीति से जुड़ा हुआ है। अमेरिका और इसराइल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत की ख़बर के बाद सत्ता के उत्तराधिकार का सवाल तुरंत खड़ा हो गया। सामान्यतः ऐसी स्थिति में कोई भी व्यवस्था जल्दबाजी से बचना चाहती है, क्योंकि युद्ध के दौरान नया नेता घोषित करना उसे सीधे निशाने पर ला सकता है। लेकिन ईरान के धार्मिक नेतृत्व ने अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से फैसला लिया। उन्होंने मुजतबा खामेनेई को देश का तीसरा सर्वोच्च नेता घोषित कर दिया।
मुजतबा खामेनेई की उम्र लगभग 56 वर्ष है और उन्हें लंबे समय से सत्ता के आंतरिक ढाँचे में प्रभावशाली माना जाता रहा है। हालांकि वे सार्वजनिक रूप से उतने दिखाई नहीं देते थे, लेकिन कई वर्षों से वे अपने पिता के प्रशासनिक और राजनीतिक नेटवर्क का संचालन करते रहे।

मुजतबा की ताक़त

ईरान की सत्ता संरचना में “बैत” नामक एक विशाल प्रशासनिक व्यवस्था होती है, जो सर्वोच्च नेता के कार्यालय और प्रभाव का केंद्र होती है। बताया जाता है कि मुजतबा कई वर्षों तक इसी नेटवर्क के माध्यम से पर्दे के पीछे से प्रभाव डालते रहे। उनका संबंध रिवोल्यूशनरी गार्ड से भी गहरा माना जाता है। यह संगठन केवल एक सैन्य संस्था नहीं बल्कि ईरान की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढाँचे में अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाता है।

मुजतबा ख़ामेनेई

मुजतबा के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक Hossein Taeb रहे हैं, जो पहले रिवोल्यूशनरी गार्ड की खुफिया शाखा के प्रमुख थे। ईरान की आंतरिक राजनीति में सुधारवादी और कठोर रुख वाले गुटों के बीच लंबे समय से संघर्ष चलता रहा है और कई विश्लेषक मानते हैं कि मुजतबा तथा उनके सहयोगियों का झुकाव कठोर सुरक्षा-केंद्रित नीति की ओर रहा है। इस संदर्भ में 2009 के ईरानी चुनावों का विवाद भी अक्सर चर्चा में आता है, जब बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय सरकार ने इन प्रदर्शनों को सख्ती से दबाया था और राजनीतिक व्यवस्था पर नियंत्रण और भी मजबूत किया गया था।

विरोध-प्रदर्शनों पर मुजतबा का रवैया

हाल के वर्षों में ईरान में कई बार बड़े विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं और उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक सुधार और सामाजिक अधिकारों की मांग की है। ऐसे आंदोलनों के कारण मुजतबा खामेनेई का नाम पहले से ही कई लोगों के लिए एक प्रतीक बन चुका था—उस सत्ता व्यवस्था का प्रतीक जिसके खिलाफ वे प्रदर्शन करते रहे।
लेकिन इस राजनीतिक कहानी के पीछे एक मानवीय त्रासदी भी छिपी है। 28 फरवरी के हमले में केवल राजनीतिक नेतृत्व ही प्रभावित नहीं हुआ। बताया जाता है कि उसी हमले में मुजतबा के परिवार के कई सदस्य भी मारे गए—उनकी माँ, पत्नी, बहन, बहनोई और एक छोटा भतीजा।
ऐसी परिस्थितियों में किसी भी व्यक्ति के निर्णय केवल राजनीतिक या वैचारिक नहीं रहते। व्यक्तिगत नुकसान और भावनाएँ भी उनके दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकती हैं। यही कारण है कि कई विश्लेषक मानते हैं कि आगे की स्थिति का अनुमान लगाना और भी कठिन हो जाता है। यहीं पर टॉल्स्टॉय का विचार फिर से याद आता है—इतिहास किसी एक व्यक्ति या एक निर्णय से नहीं चलता। वह हजारों परिस्थितियों के मेल से बनता है।

आज मध्य-पूर्व में जो घटनाएँ घट रही हैं, वे भी इसी जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं। अमेरिका, ईरान, इसराइल, खाड़ी देश, रूस और चीन—सभी इस क्षेत्रीय संतुलन का हिस्सा हैं। हर देश अपनी रणनीति बना रहा है, लेकिन परिणाम केवल किसी एक की इच्छा से तय नहीं होगा।

संभव है कि आने वाले वर्षों में यह संकट एक नए शक्ति संतुलन को जन्म दे। यह भी संभव है कि कूटनीति के माध्यम से तनाव धीरे-धीरे कम हो जाए। और यह भी संभव है कि क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहे। लेकिन एक बात स्पष्ट है—वैश्विक राजनीति में “नियंत्रण” का विचार अक्सर वास्तविकता से कहीं अधिक सरल होता है।
कभी-कभी इतिहास का पहिया उन ताक़तों से घूमता है जिन्हें कोई भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। नेता आदेश दे सकते हैं, रणनीतियाँ बना सकते हैं, लेकिन अंततः घटनाएँ अपनी ही गति से आगे बढ़ती हैं। और शायद यही कारण है कि इतिहास को समझने के लिए केवल सत्ता के निर्णयों को देखना पर्याप्त नहीं होता। हमें उन अदृश्य प्रक्रियाओं को भी समझना पड़ता है जो धीरे-धीरे दुनिया की दिशा तय करती हैं।