पिछले महीने ब्रिटेन की मशहूर पत्रिका ‘द इकानमिस्ट’ की संपादक जैनी मिल्टन बेडोज़ के एक इंटरव्यू पर काफी विवाद हुआ। वे अमेरिकी पोडकास्टर टकर कार्लसन से पूछ रही थीं कि क्या वे यह मानते हैं कि इजराइल को राजनीतिक रूप से अपना अस्तित्व कायम रखने का अधिकार है? क्या ऐसा मानने से वे यहूदीवादी नहीं हो जाएंगे? कार्लसन आरंभ में इस सवाल को टालते रहे और बाद में इसके पीछे के सोच पर ही सवाल उठाते रहे। आखिर में उन्होंने यह कह कर बात को खत्म किया कि वे किसी भी देश का सर्वनाश नहीं चाहते। लेकिन मुश्किल यही है कि युरोप, अमेरिका और भारत तक के मीडिया में गाज़ा पर हुए इजराइली हमले से लेकर ईरान पर अमेरिका के साथ किए गए हमले में भी इसी प्रकार के पूर्वाग्रह वाले सवाल पूछे जा रहे हैं।
तमाम पत्रकार यही पूछ रहे हैं और लिख रहे हैं कि अगर ईरान को नष्ट नहीं किया गया तो क्या इजराइल या अरब देश बच पाएंगे? यह आख्यान भी चलाया जा रहा है कि अगर ईरान शक्तिशाली बना रहा तो वह क्या सऊदी अरब स्थित मक्का मदीना पर कब्जा नहीं कर लेगा। लेकिन यह सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं कि क्या हजारों साल पुराने देश ईरान को इस धरती पर अपना राजनीतिक अस्तित्व कायम करने का हक है? उसी के साथ यह सवाल भी अहम है कि क्या फिलस्तीन को अपने अस्तित्व का अधिकार है? लेकिन जब साम्राज्यवाद सवाल पूछने के तरीकों को बदल देता है तो ऐसे ही विकृत सवाल पूछे जाते हैं कि क्या इजराइल को जीने का हक नहीं है? दरअसल इस सवाल के माध्यम से एक ओर फिलस्तीन के सवाल को ही लोगों की स्मृति से गायब कर दिया गया है और  अब ईरान के दीर्घकालिक इतिहास और सभ्यता के रूप में उसके अस्तित्व को भी मिटाने की कोशिशें चल रही हैं। कई पत्रकार तो यह आख्यान भी चला रहे हैं जल्दी ही हार्मुज जलडमरूमध्य का नाम ट्रंप स्ट्रेट होने वाला है।
महात्मा गांधी यहूदियों के साथ पूरी सहानुभूति जताते हुए फिलस्तीन पर उन्हें थोपे जाने को अनुचित मानते हैं। वे जुलाई 1946 में हरिजन में लिखते हैं, “ मैं अब तक यहूदी-अरब विवाद पर कुछ कहने से बचता रहा हूं। लेकिन मेरी नजर में उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से और अब आतंकवाद का नग्न रूप में सहारा लेकर फिलस्तीन पर अपने को थोप कर गलती की है। वे जिस प्रकार के विश्व नागरिक रहे हैं उस लिहाज से वे किसी भी देश के सम्माननीय अतिथि हो सकते थे। उनकी मितव्ययिता, प्रतिभा और उद्यमशीलता के कारण सभी जगहों पर उनका स्वागत होता। ईसाइयों के जगत पर यह एक कलंक है कि न्यू टेस्टामेंट(नई गवाही) के गलत पाठ के कारण उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा हुआ।” वे कहते हैं “ अगर कोई व्यक्ति गलत करता है तो पूरे यहूदी समुदाय को इसका दोष दिया जाता है।” 
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अगर आइंस्टीन जैसा कोई यहूदी कोई महान आविष्कार करता है या कोई असाधारण संगीत तैयार करता है तो उसका श्रेय उस आविष्कर्ता को ही जाता है न कि पूरे समुदाय को।.... उनकी जो अवांछनीय दुर्दशा हुई है उसके लिए यहूदियों के प्रति मेरी सहानुभूति है। लेकिन कोई सोच सकता है कि प्रतिकूल स्थितियों के कारण उन्होंने शांति का पाठ सीखा होगा। ऐसे में वे अमेरिकी धन और ब्रिटिश सेना के सहारे क्यों एक बेगानी धरती पर अपने को थोप रहे हैं? फिलस्तीन पर जबरदस्ती कब्जा करने के काम को टिकाऊ बनाने के लिए वे आतंकवाद का सहारा क्यों ले रहे हैं? अगर वे अहिंसा के बेजोड़ हथियार का सहारा लेते जिसे कि उनके पैगंबरों ने सिखाया है और जीसस जो कि स्वयं यहूदी थे और जिन्होंने पाप से कराहती हुई दुनिया का दुख दूर करने के लिए कांटों का ताज खुशी खुशी पहन लिया, तो यह विकल्प श्रेष्ठ और गौरवशाली होता।”
गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को अपना आदर्श बताने वाले महान वैज्ञानिक और यहूदी अल्बर्ट आइंस्टीन की उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई। लेकिन वे अपने हृदय से गांधी के बेहद करीब थे। वे यहूदियों के समर्थक थे लेकिन जब 1952 में आइंस्टीन को इजराइल का राष्ट्रपति बनाए जाने का प्रस्ताव आया तो उन्होंने मना कर दिया। वास्तव में उनके सोच की दिशा न तो आतंकवाद की ओर थी और न ही युद्ध की ओर। वे शांति संबंधी तमाम वैश्विक प्रस्तावों के समर्थक थे और समर्थक थे संयुक्त राष्ट्र, विश्व सरकार और एटमी निरस्त्रीकरण और नागरिक अधिकारों के। 
18 अप्रैल 1955 को जब अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई तो उनकी मेज पर 14 मई को पड़ने वाले इजराइल दिवस के लिए एक संदेश पड़ा था। उस संदेश में लिखा था, “ मैं आप से न तो एक अमेरिकी नागरिक के रूप में बात कर रहा हूं और न ही एक यहूदी के तौर पर। मैं आप से एक ऐसे मानव के रूप में बात कर रहा हूं जो कि अधिक गंभीरता के साथ चीजों को वस्तुनिष्ठ रूप में देखना चाहता है। अपनी इस कमजोर क्षमता के बावजूद मैं जिस मकसद के लिए काम करना चाहता हूं वह है शांति और न्याय। भले कोई इससे नाराज हो या खुश।”
यह विडंबना है कि जिस यहूदी समुदाय और इजराइल के लिए आइंस्टीन भरपूर सहानुभूति रखते थे और हिब्रू भाषा को प्रोत्साहित करने के लिए जिन्होंने चंदा जमा किया वह इजराइल आज आइंस्टीन के शांतिवाद को ही आग लगा रहा है। वे जबरदस्त रूप से युद्ध विरोधी थे और उसके लिए कम से कम तीन दशक तक अभियान चलाया। वे लिखते हैं, “ युद्ध कोई खेल नहीं है। हमारी लड़ाई युद्ध के विरुद्ध ही होनी चाहिए। जन समुदाय शांति के समय ऐसा संगठन बनाकर युद्ध की संस्था से लड़ सकता है जो सैन्य सेवा से पूरी तरह इंकार कर दे।(4 जनवरी  1928 वूमेन इंटरनेशनल लीग फार पीस को संदेश)। वे आगे कहते हैं , “ अतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान तभी संभव है जब हर प्रकार की सेनाओं और हर प्रकार की सैन्य सेवाओं को समाप्त कर दिया जाए।(26 दिसंबर, 1928) ”
आइंस्टीन कहते हैं, “ मेरे लिए किसी मनुष्य को मारना हत्या है। वह तब भी हत्या है जब वह बड़े पैमाने पर राज्य की नीति के तहत किया जाए।” उनकी जो बात आज के अमेरिका-इजराइल के ईरान पर किए गए हमले के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है वो यह है कि, “किसी को भी अपने को यहूदी या ईसाई कहलवाने का हक नहीं है अगर वह किसी अधिकारी के कहने पर किसी की हत्या करे। या वह परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से अपने को इस अपराध के लिए प्रयुक्त होने की इजाजत दे।”
वे युद्ध रोकने के दावे और युद्ध की तैयारी करते जाने के पाखंड पर टिप्पणी करते हुए कहते थे कि आप युद्ध की तैयारी करते हुए युद्ध नहीं रोक सकते। युद्ध नामक संस्था को एकदम नकार देने के जोखिम से भी वे परिचित थे इसलिए उन्होंने इस बारे में भी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह सौदा बुरा नहीं है। आइंस्टीन कहते हैं, “ मैं मानता हूं कि जो देश अपनी रक्षा न करने का फैसला करता है उसके साथ भारी जोखिम खड़ा हो जाता है। लेकिन उसके जोखिम को पूरा समाज मानव की प्रगति का उपाय मानकर स्वीकार करता है। हालांकि यह जोखिम बड़ा है लेकिन वह आवश्यक रूप से अधिक घातक नहीं है। जो देश युद्ध में शामिल नहीं होते वे उतना नुकसान नहीं उठाते जितना जर्मनी ने वास्तव में किया।”

आइंस्टीन मानते थे कि मानव कल्याण किसी राष्ट्र के प्रति वफादारी से बड़ा है बल्कि वह किसी भी चीज बल्कि हर चीज से बड़ा है।

आइंस्टीन मानते थे कि उनका युद्ध विरोध तार्किकता से अधिक भावना पर आधारित है। जबकि गांधी के युद्ध विरोध को हम ठोस रणनीति और तार्किक आधार पर देख सकते हैं। गांधी का कहना है कि युद्ध रोकने के लिए सारे प्रयास तब तक व्यर्थ जाएंगे जब तक युद्ध के कारणों को समझा नहीं जाता और उनसे मौलिक रूप से निपटा नहीं जाता। आज पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध और उसके प्रभावों में हो रही तबाही और आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए बीसवीं सदी की यह दो महान विभूतियों के संदेशों पर विचार करना हमारी सभ्यता की आवश्यकता है। आज हम भले एआई और कम्युटर से हो रहे इस युद्ध की प्रौद्योगिकी के चमत्कार पर रीझे रहें लेकिन आइंस्टीन के उस कथन पर ध्यान देना जरूरी है जिसमें उन्होंने कहा है कि मुझे नहीं मालूम कि तीसरा युद्ध किस हथियार से लड़ा जाएगा लेकिन चौथा विश्व युद्ध डंडों और पत्थरों से लड़ा जाएगा। कहने का मतलब यह है कि तीसरा विश्व युद्ध हमारी सारी तरक्की को समाप्त कर देगा, जिसे हम प्रत्यक्ष देख भी रहे हैं।
आइंस्टीन ने अपने शांतिवाद की प्रेरणा को व्यक्त करते हुए कहा था, “ मेरा नजरिया किसी बौद्धिक सिद्धांत के आधार पर निर्मित नहीं हुआ है। बल्कि मेरा दृष्टिकोण हर तरह की क्रूरता और नफरत के प्रति गंभीर किस्म की नापसंदगी के नाते बना है। ..........हमें पहले समाजवाद के लिए काम करने के बजाय शांतिवाद के लिए काम करना चाहिए। क्योंकि सामाजिक और आर्थिक समस्याएं जटिल हो गई हैं। आप लोगों से यह आशा कर सकते हैं कि वे उसे हल करने में सहयोग की भावना से काम करेंगे।”
गांधी शांतिवाद यानी अहिंसा के दर्शन को नई ऊंचाई और व्यावहारिकता प्रदान करते हैं। वे कहते हैं, “एक सच्चा शांतिवादी सच्चा सत्याग्रही होता है उसे अपने इस विश्वास को प्रमाणित करना पड़ता है और इसका प्रमाण इस प्रकार होता है कि वह युद्ध चाहे वह रक्षात्मक हो या आक्रामक हो उससे किसी प्रकार के सहयोग से इंकार कर दे।”

गांधी जब कहते हैं कि युद्ध तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक युद्ध के कारण समाप्त नहीं होंगे तब वे युद्ध के कारणों की व्याख्या भी करते हैं।

वे कहते हैं, “ धरती पर अमानवीय प्रजातियों द्वारा  कमजोर प्रजातियों का शोषण ही युद्ध का असली कारण है।” गांधी युद्ध विरोध की वास्तविक रणनीति निर्मित करते हैं। उनके दिमाग में इस काम का एक राजनीतिक और व्यावहारिक खाका भी है। वे शांतिवादियों के प्रयासों को संबोधित करते हुए कहते हैं, “ महज सैन्य सेवा देने के लिए इंकार करना ही काफी नहीं है। सैन्य सेवा तो उस बीमारी का लक्षण है जो कि बहुत गहरी है। जो सैनिक सेवा के रजिस्टर पर नहीं हैं वे भी युद्ध के अपराध में भागीदार होते हैं अगर वे राज्य का किसी और आधार पर समर्थन करते हैं। हर वह व्यक्ति युद्ध में हिस्सेदार है जो कर अदा करते हुए राज्य को समर्थन देता है। इसलिए जो भी सैन्य सेवा रोकना चाहते हैं उन्हें हर प्रकार का सहयोग रोक देना चाहिए। हालांकि ऐसा करने पर जेल जाने का खतरा बना रहता है।”
गांधी युद्ध विरोध करने का खतरनाक सुझाव भी देते रहते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब जर्मनी ने ब्रिटेन पर हमला किया तो गांधी ने सुझाव दिया कि आप लोग हथियार न उठाइए और शांतिपूर्ण प्रतिरोध कीजिए। तब ब्रिटेन के कुछ शांतिवादियों ने कहा कि गांधी का सुझाव अच्छा है लेकिन उस पर इस समय विचार नहीं किया जा सकता। इस पर गांधी की टिप्पणी थी कि मेरा सुझाव तत्काल के लिए है न कि भविष्य के लिए। उन्होंने 1925 में यंग इंडिया में ऐसा ही एक जोखिम भरा सुझाव दिया था। उनका कहना था, “ युरोप में निरस्त्रीकरण शुरू हो उससे पहले किसी देश को भारी खतरा उठाते हुए अपने को पूरी तरह से निरस्त्रीकरण करना होगा।”
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच दुनिया में हथियारों का जखीरा जिस तरह से जमा किया जा रहा था उसके बारे में गांधी लगातार चेतावनी दे रहे थे। अमेरिका ने जिस तरह से 1945 में जापान के नागाशाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराकर तबाही मचाई उससे उनकी चेतावनी सही निकली। विश्व युद्ध शुरू होने से पहले दिसंबर 1938 में उन्होंने कहा था, “ एक बात निश्चित है कि हथियारों के लिए पागल दौड़ जारी रही तो इस तरह का कत्लेआम होगा जैसा मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ। अगर कोई विजेता बचेगा तो उसकी विजय उसके लिए जिंदा मौत जैसी ही होगी।”
अपने सामने दो विश्व युद्ध देखने के बावजूद गांधी मनुष्य की अच्छाई से निराश नहीं हुए थे। उनका कहना था कि स्थायी शांति की संभावना में यकीन न करना मनुष्य के स्वभाव में दैवत्व की उपस्थिति पर अविश्वास करना है।
लेकिन यह मान लेना कि गांधी और आइंस्टीन अपने पूरे जीवन में सैन्य सेवाओं से उसी प्रकार दूर रहे जिस प्रकार की सलाह दे रहे थे या संकल्प जता रहे थे तो ऐसा सोचना गलत होगा। गांधी ने एक बार दक्षिण अफ्रीका में एंबुलेंस कोर की सेवाएं प्रदान की थीं। उन्होंने यह सेवाएं 1906 में उस समय दी थीं जब जुलू विद्रोह हुआ था। उस समय वे घायलों को स्ट्रेचर पर लेकर काफी तेजी से दूर तक जाते थे और कई घायलों का जीवन बचाया था। गांधी जब 1914 में दक्षिण अफ्रीका से अंतिम रूप से विदाई लेकर भारत लौट रहे थे तो वे लंदन होते हुए आए। जुलाई 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ चुका था तब उन्होंने वहां अंग्रेजों का मदद के लिए मेडिकल कोर में सेवाएं देने के लिए अपने को प्रस्तुत किया था।
जहां तक आइंस्टीन की बात है तो वे प्रथम विश्व युद्ध के समय जर्मनी की आक्रामक नीतियों के विरोधी थे। उन्होंने उसी समय शांतिवादी समूह बनाने का समर्थन किया था। वे शांति के प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करवाने में सक्रिय हो गए थे। जर्मनी की पराजय के बाद वे राजनीति करने लगे और न्यू प्रोग्रेसिव पार्टी के समर्थक हो गए।
लेकिन उन पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि उन्होंने 1939 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन जी रूजवेल्ट को पत्र लिखकर बताया था कि जर्मनी परमाणु बम बना सकता है। उसी पत्र के परिणामस्वरूप अमेरिका ने परमाणु बम बनाया और उसका प्रयोग किया। लेकिन परमाणु बम बनाने की योजना यानी मैनहट्टन प्रोजेक्ट की न तो उन्हें जानकारी थी और न ही उन्हें इस बात की जानकारी थी कि परमाणु बम जापान पर गिराया जाने वाला है।
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जब 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया तो इसकी खबर सुनकर आइंस्टीन ने गहरा अफसोस जताया। आइंस्टीन ने अगस्त 1939 में राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखकर सचेत किया था कि फ्रांस और जर्मनी में जिस तरह के प्रयोग चल रहे हैं उससे यह संभावना बन गई है कि भारी ऊर्जा पैदा करने वाला परमाणु बम बनाया जा सकता है। उन्होंने राष्ट्रपति से यूरेनियम के अयस्कों उपलब्धता और गुणवत्ता के बारे में कुछ ठोस जानकारियां भी साझा की थीं। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि उन्होंने राष्ट्रपति को वह पत्र इसलिए लिखा था ताकि बम बनाकर जर्मनी के संभावित खतरे को रोका जा सके। लेकिन उनका इरादा उसके इस्तेमाल के लिए कतई नहीं था। उनका कहना था कि परमाणु ऊर्जा के प्रकट होने से नई समस्या नहीं पैदा हुई है बल्कि जो समस्या पहले से थी उसे तत्काल हल करने आवश्यकता पैदा की है।
जबकि गांधी का कहना था कि जिसने भी परमाणु बम का आविष्कार किया है उसने विज्ञान जगत में सबसे बड़ा अपराध किया है।
आज पश्चिम एशिया के युद्ध और उसके साथ जुड़े परमाणु युद्ध के खतरों को देखकर कहा जा सकता है कि इतने महान लोगों के वचनों, प्रयासों और आंदोलनों के बावजूद मानव सभ्यता युद्ध से दूर कहां हो पाई। इसलिए युद्ध रोकने का प्रयास तो निष्फल है। लेकिन गांधी ने हिंद स्वराज में लड़ाई के मुकाबले सत्याग्रह या दया के बल के महत्त्व को जताकर दुनिया के लिए अलग ही आशा जताई है। वे कहते हैं, “ दुनिया में इतने लोग आज भी जिंदा हैं यह बताता है कि दुनिया का आधार हथियार-बल नहीं है, परंतु सत्य, दया या आत्मबल पर है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया लड़ाई के हंगामों के बावजूद टिकी हुई है। इसलिए लड़ाई के बल के बजाय दूसरा ही बल उसका आधार है।”