जेडी वेंस अपनी पत्नी के धर्म को लेकर दिए बयान से चर्चा में हैं।
ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नारा ‘MAGA' (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) अल्पसंख्यकों के लिए भारी पड़ रहा है। आप्रवासियों के ख़िलाफ़ ट्रंप के अभियान ने नफ़रत की ऐसी आँधी चलायी है जो मुस्लिमों, अश्वेतों से होते हुए अब हिंदुओं को भी घायल कर रही है। हाल के दिनों में अमेरिका में हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत से जुड़ी कई घटनाएँ हुई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित हो गया है। सवाल ये भी है कि जो अमेरिकी हिंदू इस भेदभाव की शिकायत कर रहे हैं, वे भारत में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार पर चुप्पी क्यों साधे रहते हैं। यही नहीं, कई बार तो भारत में मुस्लिमों और ईसाईयों को निशाना बनाने वाली राजनीति की सफलता पर ख़ुशी भी जताते हैं।
29 अक्टूबर 2025 को, मिसिसिपी यूनिवर्सिटी में Turning Point USA के कार्यक्रम में एक भारतीय मूल की छात्रा ने उपराष्ट्रपति JD Vance से जो सवाल पूछा, वह अमेरिका में अल्पसंख्यको में बढ़ते डर की बानगी है। उस छात्रा ने इमीग्रेशन और धार्मिक भेदभाव को लेकर उपराष्ट्रपति से जो पूछा, वह अब सोशल मीडिया में वायरल है।
उस हिंदू छात्रा ने पूछा – "आपकी पत्नी उषा हिंदू हैं, आपके घर में अंतर-धार्मिक माहौल है। फिर अमेरिका से प्यार साबित करने के लिए ईसाई क्यों बनना पड़े? और इमिग्रेशन पर – आपने हमें सपना दिखाया कि आओ, पढ़ो, योगदान दो, लेकिन अब कहते हैं 'बहुत हो गए इमिग्रेंट्स'? हमने कानूनी तरीके से यहां आकर मेहनत की, फिर हमें क्यों धोखा?"
जेडी वेंस का विवादित बयान
इस हिंदू छात्रा के सवाल का एक संदर्भ था। दरअसल, उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस ने पिछले दिनों कहा था कि वे चाहते हैं कि उनकी पत्नी भी उनकी तरह कैथोलिक ईसाई बन जाये। हालाँकि कोई दबाव नहीं है। वेंस 2019 में औपचारिक रूप से कैथोलिक बने थे। उनका बचपन तो इवेंजेलिकल क्रिश्चियन परिवेश में गुज़रा था जो सिर्फ़ बाइबिल और ईसा मसीह को मानता है, पोप या अन्य संतों को मान्यता नहीं देता। लेकिन युवावस्था में वेंस नास्तिक हो गये थे। बहरहाल, 2019 में वे औपचारिक रूप से कैथोलिक बन गये जो रिपब्ल्किन के रूप में उनकी राजनीतिक हैसियत को सुरक्षित भी करता है, लेकिन सवाल है कि अमेरिका के प्रति निष्ठावान माने जाने के लिए ईसाई होना क्यों ज़रूरी है। उपराष्ट्रपति के सामने बेहद साहसपूर्ण ढंग से इस छात्रा ने जो सवाल पूछे हैं वह यूँ ही नहीं हैं। दरअस्ल हाल के दिनों में हिंदुओं और उनके त्योहारों और प्रतीकों पर हमले बढ़े हैं।
उपराष्ट्रपति वेंस भी इसके शिकार बने हैं। उषा, एक हिंदू से शादी करने की वजह से वेंस को कई बार ट्रोल किया गया है। यह ट्रोलिंग मुख्य रूप से अमेरिकी कंजर्वेटिव (MAGA) समर्थकों और श्वेत राष्ट्रवादियों (white nationalists) और कट्टर कैथोलिक के रूप में अंतर-धार्मिक शादी को "अन-अमेरिकन" या "गलत" मानते हैं। जब अप्रैल में जे.डी वेंस ने गुड फ़्राइडे की शुभकामनाएँ दीं तो ट्रोल्स ने उन्हें ‘फेक क्रिश्चियन’ कहा। और जब हाल में उन्होंने उषा के चर्च जाने की बात कहते हुए उनके कैथोलिक बन जाने की आशा जताई तो कहा गया कि यह झूठ है। 'उषा हिंदू ही हैं और अमेरिकी हिंदू फ़र्स्ट लेडी को स्वीकार नहीं करेंगे।’ यानी वेंस राष्ट्रपति बनने के बारे में सोचना बंद कर दें।
यही नहीं, नफ़रती ट्रोल्स हिंदुओं के त्योहारों को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। अमेरिका में हिंदू आबादी क़रीब तीस लाख है। दीपावली में व्हाइट हाउस में रोशनी होती है। कैलिफोर्निया में छुट्टी होती है।
ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दीया जलाया, तो MAGA ग्रुप्स ने ट्रोलिंग शुरू कर दी। इस नारे ने तमाम रूढ़िवादी और कट्टरवादी ईसाई संगठनों को नयी ताक़त दी है। इनकी नज़र में दीवाली में लक्ष्मी गणेश की पूजा दरअसल ‘फाल्स गॉड’ की पूजा है, यह अन-अमेरिकन है, एक डेमॉनिक या शैतानी रिवाज है।
ट्रंप प्रशासन में हिंदुओं को भी बख्शा नहीं गया
सोशल मीडिया में ट्रंप प्रशासन में शामिल कुछ अहम लोगों को भी गालियाँ दी गयी जो हिंदू हैं। हवाई मूल के हिंदू परिवार की तुलसी गबार्ड, डायरेक्टर आफ नेशन इंटेलीजेंस हैं जो सत्तर बिलियन डालर के अमेरिकी ख़ुफ़िया नेटवर्क को नियंत्रित करती हैं। वहीं काश पटेल फ़ेडरल ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन, (एफ़बीआई) के प्रमुख हैं। दीपावली पर जब इन्होंने शुभकामनाएँ दीं, तो मागा समर्थकों ने नफ़रत से भरे कमेंट की बारिश कर दी। यहाँ तक कहा गया कि ‘अमेरिका छोड़कर चले जाओ।’
यह सिलसिला बीते कुछ सालों में लगातार तेज़ हुआ है। यहाँ तक कि मंदिरों को भी निशाना बनाया गया है। 2019 में केंटकी के स्वामीनारायण मंदिर पर "जीसस इज द ऑनली गॉड" लिखा गया। काफ़ी पहले एक बार सीनेट में हिंदू प्रार्थना हुई, तो कट्टरवादी ईसाइयों ने काफ़ी विरोध किया। इसे "ग्रॉस आइडलेट्री" कहा यानी बड़े पैमाने पर मूर्तिपूजा। दरअसल कैथोलिक धर्म में ईसा मसीह, माँ मरियम और संतों के अलावा किसी की मूर्ति को सम्मान नहीं दिया जाता। वे हिंदुओं को 'पेगन' कहते हैं। पेगन उन धार्मिक परंपराओं को कहते हैं जो ईसाई, यहूदी या इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों (Abrahamic religions) से अलग हैं। "प्राचीन प्रकृति-पूजा करने वाले। उन्हें यज्ञ या होम में ‘नरक की आग’ दिखती है। ज़ाहिर है, यह संदर्भ और जानकारियों के न होने का नतीजा है। दूसरे धर्मों और मतों के बारे में न जानने का नतीजा।
अमेरिका में इस तरह का माहौल सिर्फ़ धार्मिक कारणों से नहीं है। इसका एक राजनीतिक संदर्भ भी है। ट्रंप ने इस आग को हवा दी है। खासौतर पर इमिग्रेशन डिबेट ने मुस्लिमों, हिंदुओं और अश्वेतों के ख़िलाफ़ नफ़रत को संगठित किया जिसने ट्रंप को काफ़ी ताक़त दी है। नफ़रत फैलाकर राजनीतिक ताक़त हासिल करना पूरी दुनिया का फिनोमिना बन गया है (भारत इसका बड़ा उदाहरण है)।
अमेरिका में हेटक्राइम
अमेरिका में हाल के दिनों में हेटक्राइम काफ़ी बढ़ा है।2020-2025 के बीच हिंदुओं के ख़िलाफ़ 100-120 (अनुमानित) हेट क्राइम के मामले दर्ज हुए। जिनमें 150 से ज़्यादा हिंदू पीड़ित हुए। 2015 से पीड़ितों की संख्या 3 गुना बढ़ी है। अन्य अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लगभग दो हज़ार हेट-क्राइम प्रति वर्ष का औसत है।
यह बताता है कि हिंदू पिछले कुछ सालों में निशाने पर आये हैं। पहले इस्लामोफोबिया फैला। मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त माहौल बनाया गया और अब हिंदू भी निशाने पर आ गये हैं। लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि जब मुसलमानों, यहूदियों और अश्वेतों पर हमले होते हैं तो अमेरिकी हिंदू क्या करते हैं? या जब भारत में अल्पसंख्यकों पर हमला होता है तो वे ताली क्यों बजाते हैं?
RSS, VHP, BJP से जुड़े संगठन – जैसे हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS USA), विश्व हिंदू परिषद अमेरिका (VHPA), ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ BJP (OFBJP) – अमेरिका में सक्रिय हैं। ये भारत में सत्तापोषित सांप्रदायिकता का समर्थन जुटाते हैं। 2021 में इन संगठनों ने CAA-NRC जैसे मुद्दों पर मुस्लिम विरोधी कैंपेन चलाए।
न्यूजर्सी में 2022 में इंडियन बिजनेस एसोसिएशन (IBA) और ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ BJP (OFBJP) से जुड़े लोगों ने 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस परेड निकाली। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा भी इसमें शामिल थे। उस समय योगी आदित्यनाथ की बुलडोज़र कार्रवाइयाँ काफ़ी चर्चा में था। परेड में बुलडोज़र भी शामिल किया गया था। मानवाधिकार संगठनों ने बुलडोजर को मुस्लिम समुदाय के घरों पर तोड़फोड़ का प्रतीक माना है। ज़ाहिर है काफ़ी विवाद हुआ। Council on American-Islamic Relations और IAMC (Indian American Muslim Council) जैसे संगठनों ने इसे "इस्लामोफोबिक" और "हेट का प्रतीक" बताकर निंदा की। बाद में आयोजकों ने खेद जताया और इस परेड की इजाज़त देने वाले मेयर ने भी ग़लती मानी, लेकिन इसने बताया कि भारत में जो सांप्रदायिक द्वेष है उसका निर्यात अमेरिका में बसे हिंदुओं तक किया जा रहा है।
समस्या ये है कि भारत में अल्पसंख्यकों पर दमन करने वाले भूल जाते हैं कि अमेरिका में हिंदू भी अल्पसंख्यक हैं और अमेरिका में लगातार भारतीय अल्पसंख्यकों का दमन एक मुद्दा बना हुआ है।
USCIRF यानी United States Commission on International Religious Freedom या संयुक्त राज्य का अतंरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग 2020 से लगातार भारत को CPC (कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न) की लिस्ट में शामिल करने की सिफ़ारिश कर रहा है। आयोग की 2025 रिपोर्ट में कहा गया है कि “ भारत में BJP राज के 10 सालों में हिंदू वर्चस्ववाद बढ़ा। सांप्रदायिक हिंसा में लगातार इज़ाफ़ा हुआ है। सीपीसी की लिस्ट में ऐसे देश शामिल किये जाते हैं जहाँ मानवाधिकारों का हनन होता है। खासतौर पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, सत्ता संरक्षण में।
सीपीसी की लिस्ट लिस्ट में शामिल करने की सिफ़ारिश अगर सरकार मान ले तो फिर बहुत सारे प्रतिबंध लग सकते हैं। भारत-अमेरिका के बीच जिस तरह रिश्तों में गाँठ पड़ी है, उसे यह सीपीसी की लिस्ट और बड़ी कर सकती है।
ऐसे में यह ज़रूरी है कि अमेरिका में रह रहे हिंदू लोग अल्पसंख्यकों के अधिकारों और इसके महत्व को समझें। अगर वे अमेरिका के अन्य पीड़ित अल्पसंख्यकों के साथ हमदर्दी नहीं जताते और भारत में अल्पसंख्यों को निशाना बनाने का विरोध नहीं करते तो फिर जब अमेरिका में उन पर अत्याचार होगा तो कोई बोलने नहीं आयेगा। उन्हें अपने ही सिद्धांतों की क़ीमत चुकानी पड़ेगी।
जर्मन पादरी मार्टिन नीलोमर शुरुआत में वे एक नाज़ी समर्थक थे, लेकिन जब चर्चों पर नाज़ी नियंत्रण के कारण उन्हें कैद किया गया, तो उनके विचार बदल गए। बाद में उन्होंने नरसंहार के लिए जर्मनी की जिम्मेदारी स्वीकार करने की वकालत की। यह कविता अमेरिकी हिंदुओं को ज़रूर पढ़नी चाहिए।
पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए
और मैंने कुछ नहीं कहा
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
फिर वे समाजवादियों के लिए आए
और मैंने कुछ नहीं कहा
क्योंकि मैं समाजवादी नहीं था।
फिर वे ट्रेड यूनियनवादियों के लिए आए
और मैंने कुछ नहीं कहा
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनवादी नहीं था।
फिर वे यहूदियों के लिए आए
और मैंने कुछ नहीं कहा
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता।