दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में जीते पदाधिकारी
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU का चुनाव देखने में छात्रों का चुनाव है, लेकिन इसकी परतें खोलिए तो दिल्ली और NCR की सामाजिक संरचना, जाति, जमीन, स्थानीय नेटवर्क, पैसा, महंगी गाड़ियां, राजनीतिक दल, संगठन और बाहुबल—सबकी छाया दिखाई देती है। इसीलिए एक सीधा-सा सवाल बहुत असुविधाजनक हो जाता है- देश के कोने-कोने से आए लाखों विद्यार्थियों वाले दिल्ली विश्वविद्यालय में 2010-11 से 2025-26 तक हर बार DUSU का अध्यक्ष जाट या गुर्जर ही क्यों हुआ? यह कोई धारणा नहीं, दर्ज तथ्य है।
2010-11 से 2025-26 के बीच हुए 13 DUSU चुनावों में हर निर्वाचित President जाट या गुर्जर समुदाय से था। इनमें ABVP ने नौ बार President पद जीता और उसके नौ विजेताओं में सात गुर्जर और दो जाट थे। NSUI के विजेता भी इसी जाट-गुर्जर दायरे से आए। 2026 में NSUI ने पहली बार इस लंबे pattern से स्पष्ट रूप से हटकर राजस्थान के आदिवासी छात्र विजय शंकर मीणा को President पद का उम्मीदवार बनाया। लेकिन अंततः जीत फिर जाट समुदाय के ABVP उम्मीदवार यश डबास की हुई। इस सवाल का आसान जवाब यह हो सकता है कि जाट और गुर्जर छात्र संख्या में ज्यादा होंगे। लेकिन कहानी इतनी सरल नहीं है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में देश के लगभग हर राज्य के विद्यार्थी आते हैं। SC, ST और OBC के लिए बड़े पैमाने पर आरक्षित सीटें हैं। 2025-26 के प्रवेश के आँकड़ों में केवल OBC, SC और ST श्रेणी को मिला दें तो UG-PG एडमिशन का करीब 46 प्रतिशत हिस्सा बनता है। फिर भी DUSU के सबसे प्रतिष्ठित पद पर डेढ़ दशक तक दो समुदायों का एकाधिकार जैसा पैटर्न क्यों दिखाई देता है? इसका पहला जवाब दिल्ली-NCR के भूगोल में छिपा है।
डूसू: जाति ही नहीं, स्थानीयता का गणित भी
दिल्ली के ग्रामीण और बाहरी इलाकों, खासकर उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली तथा उससे जुड़े NCR में जाट और गुर्जर समुदाय ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण जमीन के कब्जे वाले समुदायों में रहे हैं। हरियाणा की ओर यादव-अहीर प्रभाव वाली बेल्ट भी मौजूद है। DUSU में इसका अर्थ केवल जाति नहीं, बल्कि “localness” है। घर दिल्ली या NCR में है। रिश्तेदार आसपास हैं। गांव-बिरादरी का network है। पुराने छात्र नेता हैं। कॉलेजों तक पहुंचने के लिए वाहन हैं। किसी दिन सौ-दो सौ समर्थक चाहिए तो उन्हें जुटाने का सामाजिक ढांचा मौजूद है। बाहर से आया विद्यार्थी चाहे कितना लोकप्रिय हो, उसके पास ऐसा पहले से तैयार इंफ्रास्ट्रक्चर होना संभव नहीं है। यही वजह है कि DUSU की जातीय राजनीति को केवल “जाट वोट” या “गुर्जर वोट” कह देना अधूरा है। असली शब्द शायद सोशल कैपिटल है। यह सोशल कैपिटल चुनावी लॉजिस्टिक्स में बदलता है। दिल्ली विश्वविद्यालय कोई एक enclosed campus नहीं है। उसके कॉलेज पूरी दिल्ली में फैले हैं। थोड़े समय में दर्जनों कॉलेजों तक उम्मीदवार, प्रचारक, समर्थक और संदेश पहुंचाने होते हैं। ऐसे चुनाव में गाड़ी, आदमी और स्थानीय संबंध केवल दिखावा नहीं, वास्तविक चुनावी संसाधन बन जाते हैं।
2026 के चुनाव ने इस व्यवस्था का एक असाधारण दृश्य हमारे सामने रखा। दिल्ली हाईकोर्ट तक मामला पहुँचा। अदालत के सामने luxury-car cavalcades, बिना registration plates के वाहन, हथियार दिखाने और हिंसा की शिकायतें आईं। दिल्ली पुलिस ने बताया कि उसने 49 वाहन रोके, 5,400 से अधिक चालान किए और चार लोगों को गिरफ्तार किया। हाईकोर्ट ने पूछा कि दस-बीस गाड़ियों के cavalcades बिना नंबर प्लेट के North Campus तक पहुंच कैसे गए? अदालत ने कहा कि ऐसे काफिले “terror, fear, hegemony” का माहौल बनाते हैं। सभी 140 उम्मीदवारों को notices जारी हुए और अदालत ने collective electoral damages तक लगाने पर विचार किया।
विडंबना देखिए कि Lyngdoh Committee की व्यवस्था के अनुसार उम्मीदवार के चुनाव खर्च की सीमा केवल ₹5,000 है, जबकि जमीन पर Bentley, Defenders, Fortuners,Thars और Scorpios की कतारें दिखाई दीं।
Newslaundry ने 15 सितंबर को North Campus में ऐसी car rallies देखीं और यह भी दर्ज किया कि इनमें ABVP, NSUI और निर्दलीय दीपांशु शौकीन के समर्थकों के काफिले शामिल थे। इसलिए इसे केवल किसी एक संगठन की बीमारी बताना भी गलत होगा।
समस्या DUSU के पूरे electoral culture में दिखाई देती है। लेकिन वामपंथियों के छात्र संगठन अपवाद हैं। असली सवाल ₹5,000 नहीं है। सवाल यह है कि उम्मीदवार के आसपास मौजूद पूरा campaign ecosystem कितना खर्च करता है? गाड़ी किसी समर्थक की है, पेट्रोल कोई और भरवा रहा है, सौ लोग “अपने आप” आ गए, खाने-पीने की व्यवस्था किसी शुभचिंतक ने कर दी, कोई सिनेमा के टिकट स्पॉन्सर कर रहा है तो उम्मीदवार के आधिकारिक खर्च में क्या दर्ज होगा? यही वह जगह है जहां कानूनी spending limit और वास्तविक चुनावी ताकत के बीच बहुत बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।
अब वापस जाति पर आइए। एक समुदाय के उम्मीदवार लगातार जीतते हैं तो राजनीतिक संगठन भी परिणाम से सीखते हैं। उन्हें लगता है- यह समुदाय “winnable” है। अगले चुनाव में फिर उसी background के उम्मीदवार को टिकट मिलता है। जीत उसके community network को और मजबूत करती है। फिर अगला टिकट भी उसी दिशा में जाता है। इस तरह एक चक्र बन जाता है— स्थानीयता → बिरादरी का network → बेहतर logistics → visibility → party ticket → जीत → अगली बार उसी समुदाय को फिर winnable मानना।
2026 ने पहली बार इस चक्र में एक दिलचस्प दरार दिखाई। NSUI ने राजस्थान के आदिवासी छात्र विजय शंकर मीणा को President पद पर उतारा। ABVP ने दिल्ली के जाट उम्मीदवार यश डबास को। अंतिम परिणाम में डबास को 24,576 और मीणा को 22,523 वोट मिले। अंतर केवल 2,053 वोट रहा। इस संख्या को पिछले वर्ष से मिलाइए। 2025 में ABVP के Aryan Maan को 28,841 और NSUI की Joslyn Nandita Choudhary को 12,645 वोट मिले थे। अंतर 16,196 वोट था। यह Delhi University की official result sheet में दर्ज है। यानी केवल एक साल में President पद पर ABVP की बढ़त 16,196 से घटकर 2,053 रह गई—अंतर में करीब 87 प्रतिशत की कमी। NSUI उम्मीदवार के अपने वोट 12,645 से बढ़कर 22,523 हो गए। इसे NSUI की समग्र जीत नहीं कहा जा सकता। 2026 में वह central panel का एक भी पद नहीं जीत सकी और ABVP ने President, Secretary और Joint Secretary के तीन पद जीते। लेकिन President contest में NSUI का improvement बहुत बड़ा और निर्विवाद है और यह जाट गुर्जर एकाधिकार का विकल्प पेश कर रहा है। इसका राजनीतिक संदर्भ भी कम दिलचस्प नहीं है।
केंद्र सरकार से एमसीडी तक बीजेपी की
आज केंद्र में BJP की सरकार है। दिल्ली में भी BJP सरकार है। दिल्ली विधानसभा में BJP के 48 विधायक हैं, AAP के 22 और कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं। Leader of Opposition AAP की आतिशी हैं। MCD का राजनीतिक नेतृत्व भी फिलहाल BJP के पास है। LG को “BJP का पद” कहना संवैधानिक रूप से गलत होगा— लेकिन Lieutenant Governor केंद्र द्वारा नियुक्त संवैधानिक पद है और Delhi Police केंद्र के गृह मंत्रालय के प्रशासनिक ढांचे में आती है। यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इससे यह साबित नहीं होता कि BJP सरकार या सरकारी संस्थाओं ने ABVP को चुनावी संसाधन उपलब्ध कराए लेकिन व्यापक राजनीतिक-संगठनात्मक परिस्थिति जरूर देखी जानी चाहिए—ABVP जिस राजनीतिक परिवार से जुड़ा है, उसकी parent political ecosystem दिल्ली और केंद्र दोनों में सत्ता में है। इसके उलट कांग्रेस काफ़ी समय से दिल्ली विधानसभा में शून्य पर है। और फिर भी उसकी NSUI President पद पर केवल 2,053 वोट पीछे रह जाती है। इससे भी बड़ा paradox आम आदमी पार्टी है। AAP दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण पार्टी है। उसने लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बनाई। 2025 में सत्ता गंवाने के बावजूद उसके 22 विधायक हैं और वही मुख्य विपक्ष है। कांग्रेस के पास एक भी विधायक नहीं।
फिर DUSU में AAP लगभग अदृश्य क्यों रही?
इसका जवाब AAP के अपने फैसलों में भी मिलता है। उसकी छात्र इकाई CYSS ने 2015 में DUSU चुनाव लड़ा। यह वही साल था जब AAP दिल्ली विधानसभा में 70 में से 67 सीटें जीतकर आई थी। इसके बावजूद CYSS DUSU में चारों पद हार गई। फिर उसने 2016 और 2017 के चुनाव नहीं लड़े और “money and muscle power” को इसका कारण बताया। 2018 में AISA के साथ गठबंधन करके लौटी लेकिन central panel का कोई पद नहीं जीत सकी। बाद के वर्षों में भी उसकी मौजूदगी लगातार नहीं रही। 2023 और 2024 में उसने DUSU central election नहीं लड़ा। AAP ने बाद में अपने छात्र संगठन को नए नाम ASAP—Association of Students for Alternative Politics—के रूप में खड़ा किया। इस बार 2026 में उसने पूरा चार सदस्यीय panel भी नहीं उतारा। President पद पर उसके उम्मीदवार Ashmit Kumar को सिर्फ 1,388 वोट मिले। हालांकि Secretary पद पर उसके दृष्टिबाधित उम्मीदवार Pankaj Kumar ने 7,639 वोट लेकर अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया।
यह एक अद्भुत राजनीतिक विरोधाभास है। दिल्ली विधानसभा में 22 विधायकों वाली पार्टी DUSU President चुनाव में 1,388 वोट पर है, जबकि विधानसभा में शून्य विधायक वाली कांग्रेस की NSUI 22,523 वोट लेकर जीत से सिर्फ 2,053 दूर रह जाती है।
DUSU का राजनीतिक मिजाज अलग?
इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—दिल्ली की electoral politics और Delhi University की electoral politics दो अलग ecosystems हैं। DUSU में संगठन की continuity स्वयं बहुत बड़ी पूंजी है। ABVP और NSUI दशकों से चुनाव लड़ते हैं। आज का पराजित उम्मीदवार कल campaign manager बनता है। पुराने President और office-bearers नए उम्मीदवारों के पीछे खड़े होते हैं। कॉलेज units, alumni, स्थानीय नेता और वर्षों में तैयार personal networks अगली पीढ़ी को transfer होते रहते हैं। AAP बार-बार मैदान छोड़ती रही। परिणाम स्वाभाविक है—संगठन कमजोर है इसलिए चुनाव नहीं लड़ेंगे; चुनाव नहीं लड़ेंगे इसलिए संगठन और कमजोर होगा। यह एक दूसरा vicious circle है। 2026 में NSUI के भीतर भी गंभीर अंतर्विरोध दिखाई दिए। दीपांशु शौकीन NSUI से जुड़े हुए थे और उपाध्यक्ष पद का टिकट चाहते थे। टिकट न मिलने के बाद निर्दलीय VP लड़े और 30,615 वोट लेकर भारी अंतर से जीत गए। वे पश्चिमी दिल्ली के पीरागढ़ी के स्थानीय निवासी और जाट समुदाय से आते हैं। इसके बाद NSUI ticket distribution पर विवाद और गहरा हुआ। PTI की रिपोर्ट में कन्हैया कुमार के करीबी सूत्रों ने दावा किया कि NSUI ने दीपांशु को President पद का टिकट offer किया था, लेकिन वे VP ही लड़ना चाहते थे। उन्हीं सूत्रों ने आरोप लगाया कि जाट समुदाय के दीपांशु उसी समुदाय के ABVP President candidate यश डबास के खिलाफ नहीं लड़ना चाहते थे और दोनों के बीच किसी तरह की understanding थी। लेकिन यह विवाद स्वयं बताता है कि DUSU में caste arithmetic कितनी गंभीरता से लिया जाता है।इसी संदर्भ में हरियाणा के जाट नेता और कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा की भूमिका पर भी सवाल उठा। 2025 में उनका NSUI के लिए South Campus में roadshow और सक्रिय campaigning बाकायदा documented है। 2026 में उन्होंने NSUI panel का सार्वजनिक बयान जारी करके समर्थन जरूर किया, लेकिन पिछले साल जैसा campus roadshow करते दिखाई नहीं दिये। अब सरगोशियां चल रही हैं कि वे जाट उम्मीदवारों के विरोध में मैदान में दिखाई देने से बचते रहे। इस पूरे चुनाव को इसलिए केवल ABVP की जीत और NSUI की हार की headline में समेट देना बहुत कुछ छिपा देता है।
क्या DUSU पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है?
बड़ा सवाल यह है कि क्या DUSU सचमुच दिल्ली विश्वविद्यालय के विविध student body का प्रतिनिधित्व करता है? अगर विश्वविद्यालय पूरे भारत का है तो उसके सबसे प्रतिष्ठित निर्वाचित पद पर 2010 से लगातार जाट या गुर्जर ही क्यों पहुंचते रहे? SC, ST, दूसरे OBC समुदाय, पूर्वांचल, बंगाल, दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व और दूसरे क्षेत्रों से आने वाले हजारों विद्यार्थियों के लिए President की कुर्सी इतनी दूर क्यों दिखाई देती है? इसका जवाब किसी एक जाति को दोषी ठहराने में नहीं है। जाट या गुर्जर विद्यार्थी चुनाव लड़ते और जीतते हैं तो इसमें अपने आप कोई समस्या नहीं है। सवाल उस structure का है जो कुछ सामाजिक समूहों को दूसरों की तुलना में बेहतर starting position दे सकता है। दिल्ली-NCR की स्थानीयता, जमीन से बना पुराना social capital, गांव और बिरादरी के network, vehicles और manpower की उपलब्धता, कम turnout में संगठित voting blocs का बढ़ा हुआ महत्व, ABVP-NSUI की winnability आधारित ticket strategy और दशकों पुराना organisational infrastructure—ये सारे factors एक-दूसरे को मजबूत करते दिखाई देते हैं।
2026 की field reportings ने caste और regional mobilisation को चुनाव का स्पष्ट factor बताया भी है। लेकिन 2026 ने इसी व्यवस्था के भीतर एक दूसरी संभावना भी दिखाई है। आदिवासी background से आए विजय शंकर मीणा जाट उम्मीदवार यश डबास से केवल 2,053 वोट पीछे रहे। Independent दीपांशु शौकीन ने स्थापित संगठनों को हराकर VP पद पर 30 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए। AAP का कमजोर प्रदर्शन बताता है कि विधानसभा की ताकत अपने आप campus में transfer नहीं होती। और हाईकोर्ट की कार्रवाई बता रही है कि DUSU के money-muscle-logistics model की न्यायिक scrutiny अब पहले से कहीं गंभीर है। इसलिए शायद असली सवाल केवल “क्यों जाट या गुर्जर ही होते हैं DUSU के President?” नहीं है। उससे भी बड़ा सवाल है— क्या DUSU में हर विद्यार्थी समान starting line से चुनाव शुरू करता है? अगर उत्तर नहीं है, तो अगली बहस जातियों के बीच नहीं, उस व्यवस्था पर होनी चाहिए जो किसी के पास पहले दिन से गाड़ियां, स्थानीय network, बिरादरी, संगठन और logistics रखती है और किसी दूसरे विद्यार्थी के पास केवल उसका ID card, उसके मुद्दे और उसका वोट। दिल्ली विश्वविद्यालय चूँकि सचमुच पूरे भारत का विश्वविद्यालय है, तो उसके छात्र लोकतंत्र को भी उस पूरे भारत की विविधता और बराबरी को प्रतिबिंबित करने की चुनौती स्वीकार करनी होगी।