असम की राजनीति में नया मोड़— पहली बार तीनों गोगोई एक साथ चुनावी मैदान में। क्या इससे BJP की रणनीति पर असर पड़ेगा? जानें पूरा सियासी समीकरण।
पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई लंबे समय तक असम में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं। वर्ष 2016 में बीजेपी की जीत और चार साल बाद गोगोई की मौत के बाद राज्य में कांग्रेस की बदहाली का दौर शुरू हो गया। लेकिन इस बार पहली बार गोगोई सरनेम वाले तीन नेता हाथ मिला कर भाजपा को चुनौती दे रहे हैं। इससे राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगा है कि क्या तीनों गोगोई के एक बैनर तले आने से इस चुनाव में भाजपा का खेल बदल सकता है?
इन तीनों में एक तो तरुण गोगोई के पुत्र गौरव गोगोई हैं ही, बाक़ी दो लोग हैं राइजोर दल के नेता अखिल गोगोई और असम जातीय परिषद के अध्यक्ष रहे लुरिनज्योति गोगोई। यह दोनों नेता कांग्रेस की अगुवाई में बने असम सम्मिलित मोर्चा नामक गठबंधन में शामिल हैं।
वैसे, वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी कांग्रेस ने इन दोनों नेताओं को साथ लेने की कोशिश की थी। लेकिन तब बात नहीं बन सकी थी। राइजोर दल और जातीय परिषद ने उस बार तीसरे मोर्चे के तौर पर मिल कर चुनाव लड़ा था।
गौरव गोगोई तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। वो लोकसभा में पार्टी के उपनेता भी रहे हैं। अब वो पहली बार विधानसभा चुनाव में मैदान में हैं।
कौन हैं अखिल गोगोई?
अखिल गोगोई का नाम सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के दौरान सुर्खियों में आया था। उन्होंने राज्य में कृषक मुक्ति संग्राम समिति का गठन किया था। अखिल ने वर्ष 2020 में राइजोर दल नामक राजनीतिक पार्टी का गठन किया था। बीते चुनाव में वो शिवसागर सीट से विधानसभा में चुने गए थे।ऊपरी असम में डिब्रूगढ़ के रहने वाले लुरिनज्योति गोगोई वर्ष 2019 में पारित नागरिकता अधिनियम के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हुए विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व कर सुर्खियों में आए थे।
एक साल बाद उन्होंने अखिल असम छात्र संघ (आसू) के महासचिव पद से इस्तीफा देकर असम जातीय परिषद का गठन किया था। उसके बाद वो चुनावी राजनीति में उतरे थे।
अब इन तीनों नेताओं के साथ आने का असर ऊपरी असम की कम से कम 45 सीटों पर पड़ने की संभावना है। उस इलाके में अहोम समुदाय की खासी पकड़ है। ये तीनों भी उसी समुदाय के हैं।
कांग्रेस का गठबंधन
इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन के तहत राइजोर दल 11 और जातीय परिषद 10 सीटों पर मैदान में है। बीते चुनाव के आंकड़ों से साफ है कि इन तीनों के हाथ मिलाने से ऊपरी असम में भाजपा का खेल बिगड़ सकता है। बीते चुनाव में एनडीए को 44.5 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष को 43.7 फीसदी। वोटों में महज 0.8 फीसदी अंतर के बावजूद सीटों में 25 का अंतर रहा था। उधर, असम जातीय परिषद ने उस चुनाव में 82 और राइजोर दल ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ कर क्रमशः 3.7 और 1.5 फीसदी वोट हासिल किए थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी राजनीति के गणित में हमेशा दो और दो चार नहीं होता। बावजूद इसके इन तीनों के साथ होने से कई सीटों के समीकरण बिगड़ सकते हैं।
पिछली बार कांग्रेस जिन सीटों पर हारी थी उनमें से 14 सीटों पर राइजोर दल और जातीय परिषद को मिले कुल वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे। अगर तब यह तीनों साथ होते तो इन सीटों के नतीजे कुछ और हो सकते थे।
कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने कहा है कि हमारा मकसद भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन रोकना है। राइजोर दल के नेताओं का कहना है कि पिछले चुनाव में वोटों के विभाजन के कारण ही भाजपा सत्ता में लौटी थी। अब तीनों दलों के साथ आने से भाजपा विरोधी वोटरों का झुकाव इसी ओर होगा।
विश्लेषकों का कहना है कि पहले के आंकड़ों से साफ है कि वोटों में एकाध फीसदी का हेरफेर भी चौंकाने वाले नतीजे दे सकता है। इन दोनों नेताओं के साथ आने से खासकर भाजपा विरोधी वोटरों में यह साफ संदेश तो गया ही है कि तमाम 126 सीटों पर यही गठबंधन भाजपा को चुनौती देने में सक्षम है।
अब लाख टके का सवाल यह है कि क्या यह तीनों गोगोई मिल कर तरुण गोगोई की खाली जगह को भरने में कामयाब रहेंगे? इसका जवाब तो अगले महीने चुनाव के नतीजों से ही मिलेगा। लेकिन इस गठबंधन ने भाजपा की मुश्किलें तो बढ़ा ही दी हैं।