असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में बंगाली भाषी मुसलमानों, जिन्हें 'मियां' कहा जाता है, पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि 'मियां' अवैध बांग्लादेशी हैं और राज्य में उन्हें शांति से रहने नहीं दिया जाएगा।

सरमा ने कहा, "जब तक मैं असम में हूं, वे परेशानियां झेलेंगे।" उन्होंने आगे कहा, "वे यहां शांति से नहीं रह सकते। अगर हम उनके लिए मुश्किलें पैदा करेंगे, तभी वे यहां से जाएंगे।"

मुख्यमंत्री ने 'मियां' को "अवैध बांग्लादेशी" करार देते हुए कहा कि उन्हें असम में काम करने की अनुमति नहीं मिलेगी। उन्होंने एक पुरानी टिप्पणी का जिक्र करते हुए कहा कि रिक्शा किराए पर उनकी पिछली बात वास्तव में उनके फायदे के लिए थी। सरमा बोले, "कानून के अनुसार वे यहां काम नहीं कर सकते। किसी देश के नागरिक अपनी जमीन पर काम कर सकते हैं, लेकिन बांग्लादेश से आए लोग कैसे काम करेंगे?"

उन्होंने कहा, "अगर वे मेरी इस 'फायदेमंद' बात को स्वीकार नहीं करते, तो मुझे उनके खिलाफ ही काम करना होगा।" सरमा ने बार-बार दावा किया है कि अगली जनगणना में "बांग्लादेशी मुसलमान" असम की आबादी का 40 प्रतिशत तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने समुदाय पर जमीन पर अतिक्रमण और 'लव जिहाद' व 'फर्टिलाइजर जिहाद' जैसी गतिविधियों का आरोप भी लगाया है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब असम में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। पिछले हफ्ते ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरमा की टिप्पणियों की आलोचना की थी और इसे "मुस्लिम विरोधी, खतरनाक और विभाजनकारी" करार दिया था। बोर्ड ने चीफ जस्टिस और राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की थी।

'मियां' शब्द असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होता है, जिसे अक्सर अवैध प्रवासियों से जोड़ा जाता है। मुख्यमंत्री का यह रुख अवैध प्रवासन और राज्य में जनसांख्यिकीय बदलाव के मुद्दे से जुड़ा हुआ है। विपक्ष ने इन बयानों को नफरत फैलाने वाला बताते हुए कार्रवाई की मांग की है।


असम में नागरिकता का मुद्दा

असम में नागरिकता के मुद्दे दशकों से विवादास्पद रहे हैं, मुख्य रूप से बांग्लादेश से अवैध प्रवासन के कारण। असम समझौते (1985) के तहत 24 मार्च 1971 को नागरिकता की कटऑफ तारीख तय की गई है, जो पूरे भारत से अलग है। 2019 में अपडेटेड एनआरसी में लगभग 19 लाख लोग बाहर रह गए, जिससे कई लोग statelessness और डिटेंशन के खतरे में हैं। एनआरसी अभी भी अंतिम रूप से अधिसूचित नहीं हुआ है, और पुन: सत्यापन की मांग जारी है।


2025-2026 में यह मुद्दा बीजेपी जानबूझकर उभार रही है, क्योंकि 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। सीएए (2019) के तहत गैर-मुस्लिम प्रवासियों (हिंदू, सिख आदि) के खिलाफ विदेशी मामलों को वापस लिया जा रहा है, जबकि बंगाली मुसलमानों ('मियां' समुदाय) पर सख्ती बरती जा रही है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में कहा कि 'मिया' (अवैध बांग्लादेशी बताकर) उनके शासन में परेशानियां झेलेंगे और शांति से नहीं रह सकेंगे, ताकि वे राज्य छोड़ दें। हाल में 15 बांग्लादेशियों को डिपोर्ट किया गया और नए एसओपी से बिना ट्रिब्यूनल के निष्कासन संभव हो गया है।

यह मुद्दा असम की मूल पहचान की रक्षा और अल्पसंख्यकों पर भेदभाव के बीच टकराव पैदा कर रहा है। विपक्ष और कार्यकर्ता इसे नफरत फैलाने वाला और संवैधानिक उल्लंघन बताते हैं, जबकि भाजपा इसे अवैध प्रवासन रोकने का कदम मानती है। चुनावी माहौल में यह जनसांख्यिकीय बदलाव, मतदाता सूची और भूमि अतिक्रमण जैसे मुद्दों से जुड़कर राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा रहा है।