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असम के धुबड़ी में विदेशी ट्रिब्यूनल से मुसलिम वकीलों को हटा हिन्दुओं को नियुक्त करने पर सवाल 

जिस तरह मुसलिम समुदाय के सात अधिवक्ताओं को हटा दिया गया है और हिंदू समुदाय के अधिवक्ताओं को नियुक्त किया गया है, उसे देखते हुए राज्य की बीजेपी सरकार पर ‘पूर्वाग्रह और भेदभाव’ के आरोप लग रहे हैं।

दिनकर कुमार

असम के धुबड़ी ज़िले में एक विदेशी ट्रिब्यूनल (एफ़टी) में सात मुसलिम असिस्टेंट गवर्नमेंट प्लीडर (एजीपी) को हटाकर हिंदू अधिवक्ताओं को नियुक्त करने के फ़ैसले की तीखी आलोचना हो रही है। 

मंशा क्या है?

असम में जो एनआरसी की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में सम्पन्न हुई, उसे भी बीजेपी ने सांप्रदायिक रंग दे दिया। एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर निकले लोगों में उसकी कल्पना के मुताबिक़ भारी तादाद में मुसलमानों के नाम नहीं आए तो उसने सूची की शुद्धता पर ही सवालिया निशान लगा दिया। और अब एफ़टी के वकीलों को धार्मिक आधार पर बदलकर उसने अपनी असली मंशा का संकेत दे दिया है। 

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विदेशी ट्रिब्यूनल अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जो उन व्यक्तियों के मामलों की समीक्षा कर रहे हैं, जिनकी नागरिकता असम सीमा पुलिस संगठन द्वारा संदेहास्पद रूप से चिह्नित की गई है या जिनके नाम अंतिम राष्ट्रीय रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) सूची से बाहर रखे गए हैं। जिस तरह मुसलिम समुदाय के सात अधिवक्ताओं को हटा दिया गया है और हिंदू समुदाय के अधिवक्ताओं को नियुक्त किया गया है, उसे देखते हुए राज्य की भाजपा सरकार पर 'पूर्वाग्रह और भेदभाव' के आरोप लग रहे हैं।
राज्य के संयुक्त सचिव द्वारा हस्ताक्षरित एक अधिसूचना में अधिवक्ता अमीनुल इसलाम, कमाल हुसैन अहमद, राबियाल हक मंडल, आफताब उद्दीन अहमद, साहबुल अहमद और मोतीउर रहमान परमानिक की सेवाओं को समाप्त करने की घोषणा की गई।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रितुपर्णा गुहा, गोकुल चंद्र कर्मकार, अधीर चंद्र रॉय, अनिंद्य पॉल, शंकर प्रसाद चक्रवर्ती, आनंद कुमार राय और संगीता कोएरी नामक हिन्दू अधिवक्ताओं को मुसलिम अधिवक्ताओं के स्थान पर धुबड़ी ज़िले में अलग-अलग एफ़टी में तैनात किया गया है।

भेदभाव का आरोप

असम में वर्तमान में 100 एफ़टी हैं, और इनमें कई मुसलिम अधिवक्ता एजीपी के रूप में कार्यरत हैं। प्रत्येक एफटी में एक-एक सरकारी वकील को तैनात किया गया है।
चार वर्षों से एफ़टी के साथ कार्यरत कमाल हुसैन अहमद ने कहा है, 

‘यह राजनीतिक भेदभाव है। यह धार्मिक आधार पर किया गया है। किसी भी तरह का स्पष्टीकरण दिए बिना डिप्टी कमिश्नर सेवा समाप्ति के लिए हमारे नामों की सिफारिश नहीं कर सकते।'


कमाल हुसैन अहमद, सरकारी वकील

धुबड़ी के एफटी संख्या 9 में काम करने वाले साहबुल अहमद ने कहा,  ‘पिछले साल मेरी प्रदर्शन रिपोर्ट 'वेल एंड गुड’ थी। केवल मुझे ही नहीं, हम सभी को गृह और राजनीतिक विभाग से अच्छे प्रदर्शन की समीक्षा मिली। लेकिन इस बार उन्होंने किसी भी रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया और हमें हटा दिया।’ 
गुवाहाटी के मानवाधिकार मामलों के वकील अमन वदूद ने बताया कि निर्णय पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। वदूद ने कहा, ‘एफटी क़ानून के उल्लंघन और भारतीयों की नागरिकता के दमन के लिए बदनाम हैं।’ उन्होंने कहा,

‘सरकार का एक धर्म के अधिवक्ताओं को हटाकर दूसरे धर्म के अधिवक्ताओं को नियुक्त करने का फ़ैसला व्यवस्था पर लोगों के विश्वास को मजबूत नहीं करेगा। संवैधानिक लोकतंत्र में सरकार को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।’


अमन वदूद, मानवाधिकार मामलों के वकील, गुवाहाटी

फ़ैसले का स्वागत!

इस बीच सुप्रीम कोर्ट में एनआरसी मामले में याचिका दायर करने वाले संगठन असम पब्लिक वर्क्स के अध्यक्ष अभिजीत शर्मा ने फ़ैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा,

‘अगर राज्य ने एफ़टी के कामकाज में विसंगतियाँ पाई हैं, तो यह एक सही निर्णय है क्योंकि एफ़टी अदालतों की अवैध आव्रजन के मुद्दे में महत्वपूर्ण भूमिका है। कई बार एक निर्दोष को गैर-नागरिक घोषित किया गया है।’


अभिजीत शर्मा, अध्यक्ष, असम पब्लिक वर्क्स

शर्मा ने कहा, ‘हमें हमेशा संदेह था कि अवैध प्रवासियों के नाम अंतिम एनआरसी में शामिल किए गए हैं। एनआरसी के पूर्व समन्वयक प्रतीक हजेला ने अदालत से कहा था कि सभी जिलों में 10% पुन: सत्यापन की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उन्होंने पहले ही 27% का पुन: सत्यापन किया था। धुबड़ी जिले में 38% पुन: सत्यापन किया गया। इस जिले में 4,096 लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं हुए।’

एनआरसी से उथल-पुथल

ग़ौरतलब है कि पिछले 6 सालों से असम के लोगों के जीवन पर एनआरसी की प्रक्रिया हावी रही है। 3.29 करोड़ निवासियों ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने के लिए आवेदन किया था। राज्य सरकार के 55,000 कर्मचारी इस प्रक्रिया से जुड़े रहे और अनवरत काम करते रहे। 1600 करोड़ से अधिक रूपए एनआरसी की प्रक्रिया पर खर्च किए गए। एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान असम के लोगों ने कितना पैसा खर्च किया इसका अलग से कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। अगर इसका हिसाब किया जाए तो अप्रत्याशित आंकड़ा सामने आएगा।
इस प्रक्रिया की वजह से समाज के एक तबके को भीषण आर्थिक, मानसिक तकलीफों का सामना करना पड़ा। लेकिन एनआरसी केवल संख्या का नाम नहीं है। इसके साथ लोगों की आशा आकांक्षा जुड़ी रही है कि दशकों पुरानी समस्या का समाधान हो जाएगा। इस प्रक्रिया के साथ लोगों के मन में नागरिकता खोने का ऐसा भय भी जुड़ा हुआ था जिसकी वजह से कुछ लोगों ने अपनी जान तक दे दी।  

19 लाख लोगों की नागरिकता छीनी

एनआरसी के प्रकाशन के बाद जिन 19 लाख लोगों की नागरिकता छीन ली गई है, उनको विदेशी ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक अपनी नागरिकता साबित करने की कानूनी लड़ाई कई सालों तक लड़नी पड़ेगी।
हो सकता है कुछ लाख लोग इस तरह अपनी नागरिकता साबित करने में सफल भी हो जाएं, लेकिन अधिकतर लोगों को नागरिकता विहीन जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।  एनआरसी से बाहर रहने वाले लोगों की नागरिकता पर सुनवाई करने के लिए साल भर बाद भी किसी तरह की ठोस तैयारी नहीं की गई है।

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