गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक बड़े फ़ैसले में असम सरकार को निर्देश दिया है कि बांग्लादेश भेजी गई मुमताज बेगम को वापस भारत लाने की कोशिश की जाए ताकि उन्हें विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले को अदालत में चुनौती देने का पूरा क़ानूनी मौक़ा मिल सके। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार महिला के पति को अंतरिम मुआवजे के रूप में 2 लाख रुपये दे।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ़ कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के बाद उसे हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने से पहले यह तय करना जरूरी है कि उसे न्यायाधिकरण के फैसले की प्रति मिले और वह उसके खिलाफ अदालत में अपील कर सके। अदालत ने माना कि इस मामले में महिला के साथ नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।

मुमताज बेगम के साथ क्या हुआ?

मुमताज बेगम को वर्ष 2019 में नगांव जिले के विदेशी न्यायाधिकरण ने विदेशी नागरिक घोषित किया था। उन्होंने इस फ़ैसले को गुवाहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पहले उस आदेश को रद्द कर दिया और मामले की दोबारा सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण को भेज दिया। इसके बाद 30 मई 2026 को मुमताज बेगम अपने वकील के साथ दोबारा न्यायाधिकरण के सामने पेश हुईं। उनके पति का आरोप है कि सुनवाई के बाद पुलिस ने अदालत परिसर के पास से ही उन्हें हिरासत में ले लिया। पहले उन्हें जुरिया थाने, फिर नगांव, उसके बाद गोलपाड़ा के मटिया होल्डिंग सेंटर और बाद में श्रीभूमि ले जाया गया।
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परिवार का कहना है कि उन्हें न तो यह बताया गया कि न्यायाधिकरण ने क्या फैसला दिया है और न ही फैसले की प्रति दी गई। जब पति ने 2 जून को प्रमाणित प्रति मांगी तो वह 5 जून को मिली। तब तक मुमताज बेगम को दूसरे हिरासत केंद्र में भेजा जा चुका था। बाद में 13 जून को उन्हें सीमा सुरक्षा बल को सौंप दिया गया और 14 जून की सुबह बांग्लादेश भेज दिया गया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति सुस्मिता फुकन खौंड की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने से पहले उसे यह बताना जरूरी है कि न्यायाधिकरण ने क्या फैसला दिया है और उसे हाईकोर्ट में चुनौती देने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि मुमताज बेगम या उनके परिवार के किसी वयस्क सदस्य को गिरफ्तारी का कारण या न्यायाधिकरण के फैसले की जानकारी दी गई थी।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि महिला को एक हिरासत केंद्र से दूसरे केंद्र में लगातार भेजा जाता रहा, जबकि परिवार फैसले की प्रति लेने की कोशिश कर रहा था, इससे उनके लिए समय पर अदालत का दरवाजा खटखटाना लगभग असंभव हो गया।

न्यायाधिकरण की भूमिका पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी पूछा कि जब महिला के पति ने 2 जून को फ़ैसले की प्रमाणित प्रति मांगी थी तो उसे तुरंत क्यों नहीं दिया गया। अदालत ने कहा कि प्रति तैयार होने और देने में हुई देरी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

खंडपीठ ने टिप्पणी की कि उपलब्ध रिकॉर्ड से न्यायाधिकरण के व्यवहार में 'कानूनी दुर्भावना' के संकेत दिखाई देते हैं। अदालत ने कहा कि यदि समय पर आदेश की प्रति मिल जाती तो महिला अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती थीं।

सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश

हाईकोर्ट ने असम सरकार को निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 60 दिनों के भीतर मुमताज बेगम के पति को 2 लाख रुपये अंतरिम मुआवजा दिया जाए। अदालत ने यह भी साफ़ किया कि यह केवल अंतरिम राहत है। यदि परिवार चाहे तो आगे सिविल कोर्ट में अतिरिक्त मुआवजे की मांग भी कर सकता है।

अब से क्या करना होगा?

हाईकोर्ट ने पूरे असम के पुलिस अधिकारियों के लिए नई प्रक्रिया तय करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किए जाने पर उसे न्यायाधिकरण के फैसले की मुफ्त प्रति दी जाए। हिरासत में लेने से पहले उसे बताया जाए कि वह हाईकोर्ट में अपील कर सकता है। यदि उसे दूसरे जिले के हिरासत केंद्र में भेजा जाए तो उसके परिवार के किसी वयस्क सदस्य को इसकी जानकारी दी जाए।

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह बांग्लादेश में मुमताज बेगम का पता लगाने और उन्हें वापस भारत लाने के लिए ज़रूरी प्रयास करे, ताकि वे न्यायाधिकरण के फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने का अपना संवैधानिक अधिकार इस्तेमाल कर सकें। अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी।

एक और मामले में भी मिला ऐसा ही आदेश

इसी दिन गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जहानारा बेगम के मामले में भी असम सरकार को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। उन्हें भी विदेशी घोषित कर जून में बांग्लादेश भेज दिया गया था। अदालत ने कहा कि उनके परिवार को भी न्यायाधिकरण के आदेश की प्रति नहीं दी गई थी, जिससे वे समय पर कानूनी चुनौती नहीं दे सके।
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असम में विदेशी न्यायाधिकरण नागरिकता से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हैं। पिछले चार वर्षों में ऐसे न्यायाधिकरणों ने क़रीब 1.30 लाख लोगों को विदेशी घोषित किया है। इस प्रक्रिया को लेकर पहले भी कई बार अदालतों में सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि दस्तावेजों की कमी के कारण गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को सबसे ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह फ़ैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने पहली बार साफ़ किया है कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के बाद भी उसे अदालत में अपील करने का पूरा अवसर देना प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी है। साथ ही, निर्वासन की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों का पालन अनिवार्य है।