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बाबरी मसजिद मामले में शिया वक़्फ़ बोर्ड की याचिका खारिज

राम मंदिर-बाबरी मसजिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जगह को रामलला का बताया है। अदालत ने कहा है कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मसजिद बनाने के लिये वैकल्पिक ज़मीन दी जाए। चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (सीजेआई) रंजन गोगोई की अध्यक्षता में बनी संविधान पीठ ने शिया वक़्फ़ बोर्ड की याचिका खारिज कर दी है। इस संविधान पीठ में डी. वाई, चंद्रचूड़, जस्टिस नज़ीर, एस. ए. बोबडे, अशोक भूषण भी हैं। 

शिया वक़्फ़ बोर्ड बाबरी मसजिद-राम मंदिर विवाद के पक्षकारों में एक है। मुसलमानों की ओर से शिया वक़्फ़ बोर्ड और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस मामले में पक्षकार थे। शिया वक़्फ़ बोर्ड के वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने से पहले कहा था कि यदि उनके पक्ष में फ़ैसला आया तो वे लोग ज़मीन को राम मंदिर के निर्माण के लिए दे देंगे। उन्होंने कहा था कि राम इमाम-ए-हिंद थे और अयोध्या में उनका भव्य मंदिर बनना चाहिए। 

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शिया वक़्फ़ बोर्ड के वकील ने अदालत का फ़ैसला आने से पहले कहा था कि बाबरी मसजिद बनाने वाला मीर बाक़ी शिया था और किसी भी शिया की बनाई गई मसजिद को किसी सुन्नी को नहीं दिया जा सकता है, इसलिए इस पर हमारा अधिकार बनता है और इसे हमें दे दिया जाए। 

शिया वक़्फ़ बोर्ड की ओर से बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी ने कहा था कि साक्ष्यों के आधार पर बाबरी मसजिद शिया वक़्फ़ बोर्ड के अधीन है। शिया वक़्फ़ बोर्ड विवादित जगह पर मंदिर बनाए जाने का समर्थन करता रहा है।
शिया वक़्फ़ बोर्ड ने अपनी याचिका में कहा था कि 1946 में एक ट्रायल कोर्ट ने बाबरी मसजिद को सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति होने का फ़ैसला सुनाया था। लेकिन शिया वक़्फ़ बोर्ड ने इस बात का दावा किया था कि यह मसजिद मुग़ल शासक बाबर ने नहीं बनाई थी बल्कि उसके कमांडर मीर बाक़ी ने बनाई थी, जो शिया था। 2017 में शिया वक़्फ़ बोर्ड ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और 1946 के फ़ैसले को चुनौती दी थी। बोर्ड ने अपनी याचिका में कहा था कि शिया बोर्ड के पास 1946 तक विवादित जमीन का कब्जा था। 

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