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तैरता सुशासन! स्ट्रेचर पर मरीज़ को ले जाते परिजन। फ़ोटो साभार: ट्विटर/नजर ए इमाम (अरमान)

बाढ़ का ‘सुशासन’: कहीं नीतीश को न ले डूबे ‘बदइंतज़ामी की बाढ़’!

क्या बिहार में बाढ़ के हालात ने आपको झकझोरा? पटना के अस्पतालों में पानी। तैरती मछलियाँ। पानी में डूबे बेड और ज़िंदगी से जूझते मरीज़। हज़ारों घरों और दुकानों में पानी भरा है। जन-जीवन अस्तव्यस्त है। ऐसी स्थिति कुछ घंटे से नहीं, बल्कि 4 दिन से लगातार है। कम से कम 29 लोगों की मौत हुई है। क्या ये सामान्य हालात हैं?

आम लोगों के लिए तो यह भयावह स्थिति है, लेकिन क्या बिहार सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी ऐसा ही लगता है? मुख्यमंत्री की सुनिये। वह कहते हैं कि ऐसे हालात के लिए ज़्यादा बारिश ज़िम्मेदार है। लीजिए। हो गया इलाज! आ गया सुशासन! जब सब बारिश ही तय करेगी, ज़िम्मेदारी बारिश की ही होगी तो सुशासन ही सुशासन होगा! मुख्यमंत्री तो कहते हैं कि तैयारियों में कमी नहीं हुई और तत्काल क़दम उठाने में कोई देरी नहीं हुई। फिर अस्पताल में अफरातफरी क्यों थी? क्यों परिजन सड़क पर मरीज़ों को स्ट्रेचर पर ले जाते दिखे? ऐसा लगा मानो सड़क पर स्ट्रेचर को नाव की तरह खेवाया जा रहा हो! हर तरफ़ आम लोगों के ख़ुद से ही ज़िंदगी बचाने की तसवीरें क्यों दिख रही थीं? क्या उप-मुख्यमंत्री को रेस्क्यू करने की कहानी ही बिहार में बाढ़ से निपटने की पूरी तैयारी को बयाँ करती है?

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कहा जाता है कि बाढ़ के लिए प्रकृति से ज़्यादा ज़िम्मेदार ख़ुद इंसान ही है। यदि नियोजित तरीक़े से विकास किया जाए तो बाढ़ के हालात पैदा ही न हों और यदि ऐसी नौबत आए भी तो आसानी से निपटा जा सकता है। मुख्यमंत्री ने यह दावा किया कि प्रशासन बिल्कुल मौक़े पर है। लेकिन रिपोर्टें हैं कि उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी तीन से बाढ़ के कारण अपने राजेंद्र नगर वाले घर में फँसे हुए थे। सोमवार को उनके रेस्क्यू करने की तसवीरें आईं। इनके मामले में सरकार भले ही दावा करे कि रेस्क्यू करने के लिए प्रशासन मुस्तैद रहा, लेकिन आम लोगों का क्या? अब उप-मुख्यमंत्री जैसी किस्मत वाला हर कोई तो है नहीं कि सरकार उन्हें बचाने आए! मीडिया में आई अधिकतर तसवीरों में भी ऐसा ही दिखा। लोग तो यह कहते दिखे कि सरकार मौक़े पर नहीं है। यदि सरकार मौक़े पर होती तो फिर मौतें शायद नहीं होतीं। आपदा प्रबंधन विभाग ने ही कहा है कि बिहार में बारिश की वजह से अब तक 29 लोगों की मौत हो चुकी है।

सूखे के बाद बाढ़ 

इस बाढ़ से पहले ज़बर्दस्त सूखे की स्थिति थी। लेकिन कुछ दिनों की बारिश ने राज्य में बाढ़ के हालात पैदा कर दिए। पटना समेत 15 ज़िलों में रेड अलर्ट घोषित है। प्रशासन ने दावा किया है कि क़रीब 10 हज़ार लोगों को रेस्क्यू किया गया है। सबसे ज़्यादा प्रभावित जगह अररिया, बाँका, मुंगेर, मुज़फ़्फ़रपुर और समस्तीपुर हैं। बिहार के जिन ज़िलों में बाढ़ की स्थिति है वह इसलिए है कि गंगा की सहायक नदियों के कैचमेंट एरिया में ज़बर्दस्त बारिश हुई है। यह कैचमेंट एरिया नेपाल और इससे जुड़ा क्षेत्र है। 

हाल के वर्षों में दो बार सबसे ज़्यादा ख़तरनाक बाढ़ 1987 और 2004 में आई थी। 1987 में 1500 लोगों की और 2004 में 900 लोगों की जानें गईं थीं। इसके बावजूद हालात नहीं सुधारे गये। हर साल बाढ़ आती रही है और तबाही मचाती रही है।

बाढ़ की स्थिति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि हर साल बाढ़ आने का मुख्य कारण नेपाल से समन्वय की कमी और इस पर बातचीत नहीं होना रहा है। साल दर साल केंद्र और राज्य सरकार एक-दूसरे पर समन्वय नहीं होने के लिए आरोप लगाती रही हैं। लेकिन रोचक तथ्य यह है कि इस बार बिहार में जेडीयू के साथ बीजेपी की गठबंधन सरकार है और केंद्र में भी बीजेपी की ही सरकार है। यानी दोनों सरकारों में दो पार्टियों के साझेदार होने के बावजूद इस पर तरक़्क़ी नहीं हुई है। बाढ़ के हालात को रोकना तो छोड़िए इससे निपटने की तैयारी तक नहीं की गई लगती है।

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पटना: 80 फ़ीसदी घरों में पानी घुसा

पटना में स्थिति ज़्यादा ख़राब है। शहर में इतना जलभराव हो गया है कि शहर के निचले हिस्से में क़रीब 80 फ़ीसदी घरों के ग्राउंड फ़्लोर में पानी घुस चुका है। अधिकतर घरों में न तो पीने का पानी है और न ही बिजली। अस्पतालों, स्कूलों, कार्यालयों, मंत्रियों, नेताओं के घरों में भी पानी भरा है। उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के अलावा दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सतेंद्र नारायण सिंह और जीतन राम मांझी के घरों में भी पानी घुस गया है। बीजेपी के सांसद राजीव प्रताप रूडी के आवास में भी पानी जमा है। ऐसे में अब यदि पुनपुन नदी का जलस्तर बढ़ गया तो दिक़्क़त और बढ़ सकती है। 

पटना में अधिकारी और आम लोग कह रहे हैं कि शहर ने 1975 के बाद ऐसी भयावह स्थिति नहीं देखी है। तो किस कारण आई ऐसी स्थिति? व्यवस्था दुरुस्त नहीं करने के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

पटना में ऐसे हालात क्यों

पटना की स्थिति दो कारणों से ख़राब है। एक है, गंगा नदी का जलस्तर का बढ़ना और दूसरा, भारी बारिश व शहर का ख़राब ड्रेनेज सिस्टम। इस कारण आई है परेशानी-

  • शहर में बारिश के पानी को निकालने की व्यवस्था ठीक नहीं है। पूरे शहर में ड्रेनेज सिस्टम नहीं है और जहाँ है भी, वह ठीक नहीं है।
  • एक उपाय तो यह हो सकता है कि बारिश के पानी काे गंगा में डाला जाए लेकिन इस बारे में अभी तक कुछ भी नहीं हो पाया है।
  • शहर के निचले इलाक़ों में प्रत्येक एक किलोमीटर पर पानी निकालने के लिए मोटर पंप लगे होते तो शायद स्थिति इतनी ख़राब नहीं होती।
  • 1975 में शहर में भयावह स्थिति होने के बाद भी पिछली सरकारों ने इससे सबक नहीं लिया। 
  • सरकार की एडवांस प्लानिंग यानी पहले से तैयारी नहीं थी। यदि तैयारी होती तो हालात इतने बदतर नहीं होते।
  • नगर निगम की भी लापरवाही है। निचले इलाक़ों के नालों की सफ़ाई ठीक से नहीं हुई थी।
ये हालात हैं सुशासन बाबू कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्य में। राज्य को छोड़िए, राज्य की राजधानी पटना में ही हालात बद से बदतर हैं। पूरे शहर को भूल जाएँ तो भी उपमुख्यमंत्री, मंत्रियों और सरकार के आला अफ़सरों के आवास और उनके आवासीय क्षेत्र के ही हालात ठीक नहीं हैं। हालात ऐसे हैं कि उसकी ठीक-ठीक स्थिति के बारे में शायद मुख्यमंत्री ही बताने से हिचकिचाएँ। नीतीश कुमार 14 साल से सत्ता में हैं और इसका पता नहीं कि उनका ‘सुशासन’ पानी पर तैर रहा है या डूब रहा है। उनके सुशासन के बारे में तो तब पता चलेगा जब क़रीब एक साल बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होगा। कहीं आज की बदइंतज़ामी की बाढ़ कल के चुनाव में नीतीश को न ले डूबे!
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