22 जुलाई को पटना में छात्रों और नौजवानों के प्रदर्शन में जिस तरह कोई बैरिकेड उठा कर ले जा रहा था और कोई वाटर कैनन की बारिश में नहा रहा था उससे यह क़तई नहीं लगा था कि बिहार पुलिस छात्रों में ‘उपद्रवी’ खोजेगी और उनके चेहरों की तस्वीर पूरे सोशल मीडिया पर वायरल कर देगी।

लेकिन अगले दिन यानी 23 जुलाई को राज्य के कई जिलों में पुलिस ने क्रैकडाउन शुरू किया और कम से कम एक जगह जहानाबाद में 30 राउंड तक फायरिंग हुई जिसकी चर्चा मेनस्ट्रीम मीडिया में दबा दी गई। कुछ जगहों से यह भी शिकायत मिली कि पुलिस ने उन आंदोलनकारियों को, जो उसकी नजर में उपद्रवी हैं, उनके घरों से रात में उठाया गया है।

‘उपद्रवियों की पहचान’ पर इनाम

इसके अलावा मुजफ्फरपुर पुलिस ने जैसे नक्सलियों और दुर्दांत अपराधियों के लिए इनाम घोषित किए जाते हैं वैसे ही उनकी नजर में ‘उपद्रवियों की पहचान’ के लिए 10000 रुपये का इनाम घोषित कर दिया। इससे पहले अकेले पटना पुलिस ने कल तक 55 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा पटना पुलिस ने 10 केस दर्ज किए हैं।
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बिहार पुलिस ने छात्रों के इस आंदोलन को किस तरह लिया है इसका एक अंदाजा उस हैशटैग #HainTaiyaarHum से होता है जो पुलिस चला रही है। पुलिस ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा, “राज्य के विभिन्न जिलों में विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिस बल की प्रतिनियुक्ति की गई है।” हालाँकि पुलिस ने यह दावा भी किया कि वह “पूरी सतर्कता एवं संवेदनशीलता के साथ शांति, सुरक्षा एवं जन-जीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए निरंतर मुस्तैद है”, लेकिन उसके खिलाफ सीपीआईएमएल की एमएलसी शशि यादव ने भी ज्यादतियों की शिकायत की। शशि यादव ने बिहार विधान परिषद में आरोप लगाया कि खुद आईजी जितेंद्र राणा ने उनकी बाहें मरोड़ी हैं।

मुजफ्फरपुर पुलिस ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा, “दिनांक 23.07.2026 की संध्या में जिलांतर्गत समाहरणालय परिसर एवं अन्य स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों / उपद्रवियों द्वारा सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने की घटनाएं सामने आई हैं।”

मुजफ्फरपुर पुलिस ने यह भी लिखा कि घटना के संबंध में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज, वीडियो एवं सोशल मीडिया पर उपलब्ध तस्वीरों के आधार पर “उपद्रवियों” की पहचान की कार्रवाई की जा रही है। इस क्रम में संदिग्ध व्यक्तियों की तस्वीर/फोटो भी सार्वजनिक की जा रही हैं।

दिलचस्प बात यह है कि मुजफ्फरपुर पुलिस की ओर से किसी तरह की प्राथमिकी दर्ज करने की खबर नहीं है। कुछ सूत्रों का कहना है कि जिला प्रशासन ऐसे लोगों को चिन्हित कर, जो उसकी नजर में उपद्रवी हैं, मजिस्ट्रेट केस में जुर्माना लगाने की तैयारी कर रहा है।

पहचान जानने के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी

बिहार में प्रदर्शनकारियों के लिए कितनी बड़ी मुसीबत खड़ी की गई है इसका अंदाजा पुलिस की इस बात से लगाया जा सकता है: “मुजफ्फरपुर पुलिस आमजन से अपील करती है कि यदि प्रकाशित तस्वीरों में किसी व्यक्ति की पहचान होती है, तो उसकी सूचना पुलिस द्वारा जारी हेल्पलाइन / संपर्क नंबर पर उपलब्ध कराएँ, ताकि संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधि-सम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।”

कई जिलों जैसे पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, जहानाबाद, कटिहार और बेगूसराय की पुलिस ने तो अपना नंबर जारी कर यह जानकारी देने को कहा है। इन सभी जिलों की पुलिस ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर कई लोगों की तस्वीर या वीडियो फुटेज डाला है जिन्हें पुलिस उपद्रवी बता रही है और उन्हें पकड़ने में लोगों की मदद मांग रही है।
पटना पुलिस ने अपनी विज्ञप्ति में यह दावा किया कि गांधी मैदान में धरना प्रदर्शन बिना अनुमति के किया गया, जबकि आयोजकों का कहना था कि उन्होंने इसकी अनुमति ले रखी थी। पुलिस ने यह भी दावा किया कि गांधी मैदान और आसपास के क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू की गई थी लेकिन इसकी घोषणा पहले कहीं नहीं देखी गई थी।

छात्रों पर लाठीजार्च का आरोप

आयोजकों और धरना में जाने वाले नौजवानों का यह कहना था कि पुलिस ने उन्हें बैरिकेडिंग लगाकर धरना स्थल पर जाने से रोका और वहां पहुँचने की कोशिश में उनके साथ पुलिस ने बदसलूकी की और लाठियाँ बरसाईं। प्रदर्शनकारी नौजवानों का कहना है कि एक तरफ़ पुलिस यह कहती है कि उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है तो दूसरी ओर प्रदर्शन को रोकने के लिए हर तरह के अड़ंगे भी लगा देती है। जब इस बात का विरोध किया जाता है तो पुलिस लाठियां भांजने लगती है।

पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है जब पुलिस ने आम प्रदर्शनकारियों के साथ इतनी सख्ती बरतने की नीति अपनाई है और इसका प्रचार भी कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समय में भी छात्रों और बेरोजगारों के जुलूसों पर पुलिस ने लाठियाँ बरसाई हैं, लेकिन जिस स्तर पर अभी कार्रवाई हो रही है वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। शायद भारतीय जनता पार्टी यह जताना चाहती है कि उसके पहले मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बिहार में किसी भी आंदोलन को सख्ती से कुचलने की नीति अपनाई जाएगी।
कुछ सूत्रों का यह भी कहना है कि दरअसल बिहार की गतिविधियों पर दिल्ली में मौजूद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की पैनी नजर है और वह किसी भी तरह यह नहीं चाहते कि यहां का आंदोलन जंतर मंतर के आंदोलन की तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने।

प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि दरअसल सरकार प्रदर्शन करने वाले छात्रों और नौजवानों के साथ-साथ उनके मां-बाप को भी यह संदेश देना चाहती है कि वह ऐसे आंदोलनों से दूर रहें। इसीलिए पुलिस उन लोगों की तस्वीरें सार्वजनिक कर रही है जो उसकी नजर में उपद्रवी हैं ताकि मुहल्ले वालों के साथ-साथ उनके घर वालों तक भी यह संदेश पहुंचे और आगे के किसी आंदोलन में ना वह हिस्सा लें और ना ही बाकी कोई छात्र नौजवान आगे आए।