पटना में बुधवार को हुए छात्रों और नौजवानों के प्रदर्शन में उनका ग़ुस्सा सीधे भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और उसके दफ्तर पर निकला। ध्यान देने की अहम बात यह रही कि बीजेपी और उसके अहम सहयोगी जनता दल यूनाइटेड का दफ्तर एक ही सड़क पर कुछ दूरी पर है लेकिन जेडीयू के ना तो किसी नेता को निशाना बनाया गया और ना ही कोई प्रदर्शनकारी जदयू के ऑफिस पहुंचा।

भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर पर ग़ुस्सा निकालने के अलावा बीजेपी के तीन विधायकों और एक एमएलसी की गाड़ियों में प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की। एक विधायक विनय बिहारी ने तो विधानसभा तक में इस बात की शिकायत की। इसके अलावा आरजेडी से बीजेपी में गए वरिष्ठ नेता और मंत्री राम कृपाल यादव के सरकारी आवास पर भी प्रदर्शनकारियों का ग़ुस्सा निकला।

बीजेपी के प्रोटेस्ट में जेडीयू नहीं पहुँचा

एक और दिलचस्प बात यह हुई कि कल ही भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस के राज्य मुख्यालय सदाकत आश्रम में आंदोलन के लिए पहुंचे तो जेडीयू का कोई समर्थन उन्हें नहीं दिख रहा था। वहाँ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के पीटे जाने का आरोप भी लगा और इस सिलसिले में कांग्रेस के कुछ नेताओं पर केस भी दर्ज होने की ख़बर है। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के नेता वहां राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास के सामने धरना दिए जाने के खिलाफ प्रदर्शन के लिए पहुंचे थे।
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वैसे तो यह माना जाता है कि नीतीश कुमार के कार्यकाल से ही जदयू का भगवाकरण और भाजपाकरण शुरू हो गया था, इसके बावजूद छात्रों और नौजवानों ने जदयू के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की। जब से जेडीयू पर वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की पकड़ मजबूत हुई है और नीतीश कुमार की सेहत बिगड़ती गई है तब से यह माना जा रहा है कि जेडीयू विचारधारा के स्तर पर लगभग पूरी तरह भाजपाकृत हो गई है।

जेडीयू-बीजेपी में क्या चल रहा है?

इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने अगर जदयू पर गुस्सा नहीं निकाला तो इसकी वजह यह बताई जा रही है कि बिहार के आम लोगों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि भले ही जदयू के सहयोग के बिना बिहार में सरकार नहीं चल सकती लेकिन इस समय यहां भारतीय जनता पार्टी का ही शासन है।

जदयू के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि इस स्थिति से जहाँ बीजेपी की विचारधारा वाले उनके नेता अंदर-अंदर परेशान हैं तो दूसरी ओर जिन नेताओं को इनकी वजह से पार्टी में अलग-थलग होने का गहरा एहसास है, वह दूर से इस स्थिति के मजे ले रहे हैं। लंबे समय से जदयू में नीतीश कुमार की पसंद के एक जमीनी कार्यकर्ता ने कहा कि हमेशा बीजेपी के लोग ही मजे लेंगे, कभी हमें भी तो मजे लेने दीजिए।

दरअसल, जनता दल यूनाइटेड में बीजेपी की विचारधारा के विरोधी धड़े का यह मानना है कि बिहार में भगवा दल का मजबूत होना उनके लिए शुभ संकेत नहीं है और अगर छात्रों और नौजवानों का गुस्सा बीजेपी की तरफ है तो इसे और बढ़ने देना चाहिए।

बीजेपी का फोकस हिंदुत्व

उनका यह भी मानना है कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपने हिंदुत्व की विचारधारा को सरकारी कार्यक्रमों में बहुत तेजी से बढ़ाया है और इससे उनके समर्थकों में असंतोष है। उदाहरण के लिए नीतीश कुमार के समय में घोषित किए गए मॉडल स्कूलों की परिकल्पना में स्कूलों के नाम के साथ सरस्वती विद्या निकेतन जैसा नाम जोड़ा जाना और उन्हें भगवा रंग में रंगना, इस बात का स्पष्ट लक्षण बताए जा रहा है कि भाजपा ने जेडीयू की राजनीतिक संवेदनाओं का कोई ख्याल नहीं रखा है। इसी तरह कुछ और सरकारी स्कीमों में बीजेपी ने हिंदुत्व की वह सीमा पार कर ली है जिसे नीतीश कुमार के समय में कभी स्वीकार्य नहीं माना गया।

जदयू के इस धड़े के अंदर इस बात का भी एहसास है कि भले ही नीतीश कुमार ने अपनी पसंद के बीजेपी नेता सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की बागडोर दे दी लेकिन भारतीय जनता पार्टी सम्राट चौधरी से भी वही काम करवा रही है जो किसी और हिंदुत्ववादी नेता से करवाया जा सकता था। यही वजह है कि जब भरत तिवारी एनकाउंटर मामला हुआ तो सम्राट चौधरी की सरकार पर भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने भी बड़ा हमला किया था।
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इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि राहुल गांधी ने जब प्रधानमंत्री आवास के सामने धरना दिया तो एक के बाद एक भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसकी निंदा की और इसे प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ बताया लेकिन इस तरह का बयान जदयू के नेताओं की तरफ से नहीं आया। पटना में कांग्रेस पार्टी के दफ्तर पर जब बीजेपी के नेता प्रदर्शन कर रहे थे तो जेडीयू का नैतिक समर्थन भी देखने को नहीं मिला हालांकि उसके नेता यह कह सकते हैं कि उनकी पार्टी का कार्यक्रम नहीं था।

बीजेपी की रणनीति

यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि छात्रों और नौजवानों के इस गुस्से को शांत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को सामने नहीं लाया जबकि वह जेपी नड्डा से काफी युवा हैं। बीजेपी यह कह सकती है कि जेपी नड्डा के अनुभव की वजह से उन्हें छात्र आंदोलन के नेताओं से बातचीत के लिए चुना गया लेकिन इससे बिहार में यह एहसास जरूर है कि नितिन नवीन को बीजेपी ने अध्यक्ष तो बना दिया लेकिन वह रुतबा नहीं दे रही हालांकि अध्यक्ष बनाने के समय यह कहा गया था कि भारत की जनता पार्टी में एक युवा को यह मौका दिया है। कुछ लोग इसकी वजह यह भी बताते हैं कि बांकीपुर उपचुनाव के लिए जिस तरह उम्मीदवारों के चयन में नितिन नवीन की गलती मानी गई वह उनके खिलाफ गई है। याद रहे कि इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर सबसे चर्चित उम्मीदवार हैं और भारतीय जनता पार्टी को अपना उम्मीदवार 24 घंटे के अंदर ही बदलना पड़ा था।
इस घटना से यह बात तो बिल्कुल नहीं कहीं जा सकती है कि जदयू फिलहाल बीजेपी से कोई औपचारिक दूरी बनाना चाहता है लेकिन इतना ज़रूर है कि वह कहीं से इस समय बीजेपी के साथ खड़े हुए भी नज़र नहीं आना चाहता क्योंकि उसे पता है कि छात्रों और नौजवानों का गुस्सा कितना गंभीर है।