सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बावजूद सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी की रणनीति पूरी तरह सफल नहीं रही?
बिहार विधानसभा चुनाव की पहली सूची में सम्राट चौधरी का नाम।
भारतीय जनता पार्टी ने सम्राट चौधरी को अपने विधायक दल का नेता चुनकर पहली बार बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने में कामयाबी तो हासिल कर ली लेकिन दूसरे राज्यों की तरह यहाँ उसका सरप्राइज फ़ैक्टर फ़ेल हो गया। उसकी दूसरी नाकामी यह मानी जा रही है कि सम्राट चौधरी की पृष्ठभूमि आरएसएस की नहीं रही है।
सीएम बीजेपी की पसंद के हैं?
यह कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को किनारे लगाने की अपनी कोशिश में कामयाब होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी इस बात पर मन मसोस कर रह गई कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को बिहार का मुख्यमंत्री नहीं बना सकी जो न केवल उसकी पसंद का हो बल्कि वह यह भी कह सके कि उसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था।
वैसे तो आम धारणा यही है कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में बहुत पहले से अप्रासंगिक हो गए थे लेकिन एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना यह है कि कभी-कभी उनका टावर पकड़ लेता था यानी कभी-कभी वह अपने पुराने फॉर्म में आ जाते थे। शायद यही वजह है कि सम्राट चौधरी के मामले में यह माना जा रहा है कि इसमें नीतीश कुमार की राय को ही प्राथमिकता मिली है।
सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री चुनकर भारतीय जनता पार्टी यह साबित करने में भी नाकाम रही है कि वह ऐसे मामलों में जाति का समीकरण नहीं देखती है। सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोइरी) जाति से आते हैं जिन्हें नीतीश कुमार की कुर्मी जाति का ही जुड़वां माना जाता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में राजद ने कुशवाहा समुदाय से अच्छा समर्थन प्राप्त किया था और बिहार की जाति आधारित राजनीति में कुशवाहा समुदाय का झुकाव राजद की ओर बढ़ रहा था। हालांकि एनडीए के पास अपने घटक दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के रूप में एक कुर्मी नेता मौजूद था लेकिन जो बात सम्राट चौधरी में है वह शायद उनमें नहीं। सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी भी बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभा चुके हैं।
भारतीय जनता पार्टी की मजबूरी इस बात से भी समझ में आ सकती है कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में चुना है जिनकी छवि साफ-सुथरी नहीं है।
दागी छवि का असर नहीं?
इस बात को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि सम्राट चौधरी के कथित आपराधिक रिकॉर्ड के आरोपों की चर्चा के बावजूद भारतीय जनता पार्टी उनके नाम को नामंजूर नहीं कर सकी। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने इस बारे में कई दावे किए थे जिसमें यह बात भी शामिल थी कि सम्राट ने अपनी उम्र कम बताकर हत्या के एक मामले में खुद को बरी करवा लिया था।
प्रशांत किशोर के आरोपों में उम्र छिपाने का मामला भी शामिल था हालांकि विकीपीडिया पर मौजूद जानकारी के मुताबिक 16 नवंबर 1968 को जन्मे सम्राट चौधरी को निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पसंद बताया जा रहा था लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए दिक्कत यह थी कि सम्राट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि के नहीं हैं।
आरजेडी से राजनीति की शुरुआत
सम्राट चौधरी फिलहाल भागलपुर जिले के तारापुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी से हुई। हालांकि बाद में उन्होंने विद्रोह कर दिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। सम्राट और उनके पिता शकुनी चौधरी भी राजद सरकार में मंत्री रह चुके हैं। हालांकि सम्राट चौधरी भारतीय जनता पार्टी की बिहार इकाई के अध्यक्ष भी बने लेकिन यह समझा जाता है कि उन्हें संघ परिवार का वैसा समर्थन नहीं है। वैसे भी वह बुलडोजर राजनीति का पक्षधर नहीं होने की बात कहते हैं।
इसलिए आखिरी लम्हे तक भारतीय जनता पार्टी किसी एक नेता का नाम बतौर भावी मुख्यमंत्री नहीं ले रही थी और कम से कम आधा दर्जन नामों की चर्चा हो रही थी। भाजपा का एक तबका यह चाहता था कि न केवल संघ पृष्ठभूमि का बल्कि बिहार में उसका पहला मुख्यमंत्री सवर्ण वर्ग से हो। इसलिए उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के अलावा श्रेयसी सिंह और मंगल पांडे का भी नाम मुख्यमंत्री पद के लिए लिया जा रहा था। विडंबना यह है कि विजय कुमार सिन्हा ने ही सम्राट चौधरी का नाम भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल के नेता के रूप में प्रस्तावित किया। एक ही पार्टी में रहते हुए दोनों के रिश्ते अच्छे नहीं बताए गए हैं।
सम्राट चौधरी का नाम तय होने के साथ ही बिहार में यह भी तय हो गया कि सवर्ण जाति को फिलहाल अपने मुख्यमंत्री के लिए और इंतजार करना पड़ेगा। इस बात का श्रेय लालू प्रसाद की राजनीति को दिया जाता है और अभी यह कहना मुश्किल है कि भारतीय जनता पार्टी किसी सवर्ण को बिहार में कब मुख्यमंत्री बनाने की स्थिति में आएगी।
पढ़ाई लिखाई के मामले में भी सम्राट चौधरी का रिकॉर्ड विवादों से भरा रहा है। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने उनकी डिग्री पर गंभीर सवाल उठाए थे और कई बार उन पर सातवीं फेल होने का भी आरोप लगा। यह लगभग उसी तरह का आरोप है जैसे राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव पर नौवीं फेल होने का ताना मारा जाता है।
एक और बात ध्यान देने की है कि भारतीय जनता पार्टी सम्राट चौधरी को अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश न करके यह कह रही है कि वह एनडीए के मुख्यमंत्री हैं। इससे यह समझ जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी में इस बात को लेकर डर है कि कहीं जेडीयू के मतदाता उससे बिदक ना जाएं। इस बात को सम्राट चौधरी की जाति को भी जोड़कर देखा जा सकता है।
वैसे तो नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार अपने पापा की पार्टी जेडीयू में शामिल हो चुके हैं लेकिन उनके उप मुख्यमंत्री ना बनने की वजह से भी भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के जातीय समीकरण के लिए सम्राट चौधरी ज़रूरी हो गए थे।