बिहार के सीएम सम्राट चौधरी के शुरुआती 4 महीने चुनौतियों से भरे रहे हैं। बांकीपुर उपचुनाव में हार, पुलिस एनकाउंटर और पार्टी के अंदरूनी दबाव ने उन्हें बेचारा सीएम बना दिया है। वरिष्ठ पत्रकार समी अहमद का विश्लेषणः
बिहार के सीएम सम्राट चौधरी
15 अप्रैल को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सम्राट चौधरी 15 अगस्त तक के चार महीनों में पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर चौतरफा दबाव के शिकार नजर आ रहे हैं। उनके दबाव के दिन तो तब से ही जारी हैं जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने वाले नीतीश कुमार की पसंद के मुताबिक उन्हें बिहार में भाजपा ने अपने पहले मुख्यमंत्री के तौर पर कहरन-जबरन स्वीकार किया था लेकिन इन चार महीनों के दौरान के घटनाक्रम ने उन पर दबाव को और बढ़ा दिया है।
इस घटनाक्रम में बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार, भोजपुर पुलिस एनकाउंटर में भरत भूषण तिवारी की मौत और पटना में छात्रों के आंदोलन पर पुलिस लाठी चार्ज और एक-47 का इस्तेमाल प्रमुख हैं।
सम्राट चौधरी पर पड़ने वाला सबसे बड़ा दबाव पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की चर्चित हार से पड़ा है। यह सीट पिछले 31 सालों से भारतीय जनता पार्टी के नवीन किशोर सिन्हा और नितिन नवीन की पिता- पुत्र की जोड़ी के पास थी और इस पर प्रशांत किशोर के उम्मीदवार बनने की वजह से यह भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की सीट बन चुका था। नितिन नवीन इस सीट से विधानसभा के सदस्य थे और उन्होंने यहां से इस्तीफा देने के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की बागडोर संभाली थी।
इस तरह यह उपचुनाव सम्राट चौधरी और नितिन नवीन दोनों के लिए एक चुनौती थी क्योंकि अपना अपना पद ग्रहण करने के बाद यह बिहार में बीजेपी का पहला चुनाव था। दिलचस्प बात यह है कि अपनी सीट छोड़ने के बाद अपनी ही सीट पर अपने ही उम्मीदवार को जिताने में नाकाम तो नवनियुक्त भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन भी रहे लेकिन अंदरूनी तौर पर सम्राट चौधरी को इसके लिए निशाना बनाने की खबरें हैं।
दरअसल सम्राट चौधरी के बारे में भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस में यह धारणा बताई जाती है कि उनके राजनीतिक डीएनए में ‘संघ’ नहीं है। यही वजह है कि जब सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री घोषित किया गया तो भारतीय जनता पार्टी के बहुत से ‘संघी’ नेताओं ने आत्म पीड़ा सुनाई। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने पीड़ा में मंत्री पद तक लेना अस्वीकार कर दिया था लेकिन बताया जाता है कि केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में उन्होंने अंततः मंत्री पद स्वीकार किया।
सम्राट चौधरी और भारतीय जनता पार्टी के ‘संघी’ नेताओं के बीच के संबंध को समझने के लिए उस बहस का भी उदाहरण दिया जाता है जब तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा को सम्राट चौधरी ने बतौर मंत्री किसी सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि ज्यादा व्याकुल नहीं होना है। उनके इस जवाब से विजय कुमार सिन्हा काफी व्यथित हुए थे।
यह बात भी याद रखने की है कि सम्राट चौधरी जब मुख्यमंत्री बने तो उससे पहले नीतीश कुमार की सरकार में विजय कुमार सिन्हा उपमुख्यमंत्री थे। तब सम्राट चौधरी भी उपमुख्यमंत्री थे लेकिन प्रोटोकॉल में हमेशा विजय कुमार सिन्हा को दूसरे उपमुख्यमंत्री के तौर पर रखा गया। सम्राट चौधरी जब मुख्यमंत्री बने तो उपमुख्यमंत्री के दोनों पद जनता दल यूनाइटेड को चले गए और इस तरह विजय कुमार सिन्हा उपमुख्यमंत्री से महज एक मंत्री के पद पर आ गए।
बांकीपुर उपचुनाव में हार के कारणों में यह भी बताया गया कि सम्राट चौधरी को पसंद नहीं करने वाले गुट ने यह कोशिश ही नहीं की कि वहां से भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार जीते। हालांकि कई मंत्री और कई विधायक बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा के लिए प्रचार करते देखे गए लेकिन कुछ मंत्रियों और विधायकों के बारे में यह अफवाह भी फैली रही कि वह ऊपरी तौर पर तो चुनाव प्रचार में हिस्सा ले रहे हैं लेकिन अंदर से उनकी कोशिश यही रही कि सम्राट चौधरी के लिए यह चुनाव मुश्किल और मुसीबत बन जाए।
सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपराध नियंत्रण के लिए काफी आक्रामक बयान दिए। उनका यह बयान भी काफी चर्चित रहा जिसमें उन्होंने कहा कि अपराधियों को माला पहनाना नहीं है, उन पर माल चढ़ाना है। इसके बाद बिहार में एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर का एक दौर चला। फिर भोजपुर में हुए एनकाउंटर में भरत भूषण तिवारी की मौत हुई और इसके बाद आमतौर पर सवर्ण समुदाय और विशेष तौर पर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक सवर्ण वर्ग ने इसे सम्राट चौधरी सरकार पर हमले का एक बहाना बना लिया।
सम्राट चौधरी इस एनकाउंटर को लेकर इतने दबाव में आए कि उन्होंने 13 अगस्त को आखिरकार उस परिवार के एक सदस्य को नौकरी और आर्थिक सहायता देने की खुद घोषणा की। इस सिलसिले में पुलिस वालों की गिरफ्तारी और प्राथमिक की पहले ही हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले सम्राट चौधरी को अपनी ही पार्टी के सदस्यों की खुली आलोचना का सामना करना पड़ा। दरअसल सरकार और प्रशासन पर हमला कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना का एक उदाहरण था। अगर जीतन राम मांझी को छोड़ दिया जाए तो एनडीए घटक के प्रमुख दलित नेता चिराग पासवान ने भी सम्राट सरकार पर गंभीर सवाल उठाए।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में विपक्ष के नेताओं ने भी गंभीर सवाल उठाए। दिलचस्प बात यह रही कि विपक्षी नेताओं के सम्राट सरकार विरोधी बयानों के जवाब में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने अपने मुख्यमंत्री के समर्थन में कोई मजबूत बयान जारी नहीं किया।
एक और बात ध्यान देने की है कि जैसे ही बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की तो उन्होंने पहला हमला मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर ही किया। प्रशांत किशोर ने बयान दिया कि भारतीय जनता पार्टी को सम्राट चौधरी की जगह पर किसी अच्छे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए। ध्यान रहे कि प्रशांत किशोर सम्राट चौधरी को उनकी डिग्री और उम्र में हेराफेरी का आरोप लगाकर दागी नेता बताते हैं।
सम्राट चौधरी पर अंदरूनी दबाव का एक उदाहरण पटना में और बिहार के दूसरे हिस्सों में हुए छात्र आंदोलन के दौरान सरकार और प्रशासन की कार्रवाई भी रही है। ऐसी चर्चा रही कि उस आंदोलन को भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बिहार में बहुत बढ़ने नहीं देना चाहता था इसलिए उसे रोकने की हर कोशिश की गई और इस कोशिश में सीवान में एक-47 का इस्तेमाल बहुत चर्चा में रहा और भाजपा पर भारी पड़ा। यह भी ध्यान रखने की बात है कि छात्रों के आंदोलन के समय प्रशासन ने अखबारों में विज्ञापन देखकर तस्वीर छपवाई और इस बात के लिए इनाम की घोषणा की कि उनकी पहचान की जाए। जब मामला बहुत बिगड़ गया और दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के साथ सभी मुकदमे वापस लेने की बात तय पाई तो आनद-फानन बिहार में भी सभी गिरफ्तार आंदोलनकारी छात्रों को जेल से रिहा किया गया और मुकदमे वापस लिए गए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना था कि छात्रों के आंदोलन के साथ पुलिस ने जो बर्बरता की उसके लिए खास तौर पर जनता दल यूनाइटेड के कुछ नेता बिल्कुल तैयार नहीं थे और सम्राट चौधरी को भी ऐसी कार्रवाई की इजाजत भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में देनी पड़ी थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी फिलहाल सम्राट चौधरी को उनके पद से नहीं हटाएगी क्योंकि इसके लिए नीतीश कुमार तैयार नहीं होंगे चाहे उनकी सेहत कितनी भी खराब हो। दूसरी बात यह है कि सम्राट चौधरी इस समय कुशवाहा जाति के सबसे बड़े प्रतिनिधि के रूप में भारतीय जनता पार्टी में हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान राजद ने कुशवाहा समुदाय को अपनी ओर आकर्षित किया था और इसके मद्देनजर फिलहाल भाजपा ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती जिससे वह समुदाय नाराज हो जाए। यह जरूर है कि इसके बावजूद सम्राट चौधरी को दबाव में रखना ही भारतीय जनता पार्टी की नीति नजर आती है।