दिल्ली में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन के बाद राज्य में पार्टी के वजूद को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। दूसरी बार भी पार्टी शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी है।
कांग्रेस की ख़राब हालत का अंदाजा इससे लग जाता है कि उसके कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलोठिया 4056 वोट, शिवानी चोपड़ा 4965 वोट, पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ 3382 वोट और पूनम आज़ाद झा महज 2601 वोट ही ला सके।
कांग्रेस को अपने परंपरागत वोटरों मुसलिम, दलित और पूर्वांचलियों ने भी पूरी तरह नकार दिया और पार्टी 2015 में मिले 9 फ़ीसदी वोटों से फिसलकर 4.26 फ़ीसद पर आ गई।
लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस दिल्ली में खड़ी कैसे होगी। उसके वरिष्ठ नेता मेहनत करना नहीं चाहते। उसका सारा वोट बैंक आम आदमी पार्टी के पास जा चुका है और उसके पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो इस वोट बैंक को उसके पाले में वापस ला सके। कांग्रेस को यह समझना होगा कि वह सिर्फ़ इसमें ख़ुश न हो कि बीजेपी सत्ता में नहीं आई। उसे इस पर चिंतन करना चाहिए कि लंबे समय तक देश की सत्ता और दिल्ली में राज करने के बाद आज उसकी यह स्थिति क्यों हो गई है कि वह कुछ राज्यों में सत्ता में हिस्सेदारी मिलने और बीजेपी के सत्ता में न आने को ही कामयाबी मानकर बैठी है।