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क्या केजरीवाल सरकार कोरोना मौतों को छुपा रही है? 

दिल्ली में कोरोना कितने भयानक तरीक़े से फैल रहा है, इसका अंदाज़ा आप कैसे लगाएँगे- ज़ाहिर है कि आप कुल मरीज़ों की तादाद देखेंगे और साथ ही यह भी देखेंगे कि कोरोना ने कितने लोगों की जान ली है। इसके आधार पर ही आप सरकार के काम की समीक्षा भी कर लेंगे। अगर कोई सर्वे करने आए और आपसे यह पूछे कि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने कोरोना में कैसा काम किया है तो ज़ाहिर है कि आपके दिमाग़ में मौतों के सरकारी आँकड़े ही होंगे। ऐसे एक सर्वे ने केजरीवाल को 65 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट दिलाकर नंबर वन पर रखा भी है।

ऐसे में दिल्ली में कोरोना से हुई मौतों के विवाद ने केजरीवाल के नंबर वन होने पर सवाल उठा दिए हैं। मौतों का यह विवाद ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के साथ शुरू हुआ। 9 मई तक दिल्ली सरकार बता रही थी कि राजधानी में अब तक 66 मौतें हुई हैं। ज़ाहिर है कि मार्च से लेकर मई की शुरुआत तक के 50 दिनों में अगर दिल्ली में सिर्फ़ 66 लोगों की जान गई हो तो वह इस लिहाज़ से ज़्यादा श्रेय लेने वाली बात बनती है कि हज़ारों की जान बचाई गई है। उस रिपोर्ट में बताया गया कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में ही 9 मई तक 116 मौतें रिपोर्ट हो चुकी हैं तो भला दिल्ली सरकार कैसे यह दावा कर सकती है कि सिर्फ़ 66 मौतें ही हुई हैं। 

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उस रिपोर्ट में बताया गया कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में 47, राममनोहर लोहिया अस्पताल में 52, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में 3 और एम्स के झज्जर सेंटर में 14 मौतें हुई हैं। इन सबका जोड़ 116 बन जाता है। इसके अलावा रिपोर्ट से इतर साकेत के मैक्स अस्पताल में भी तब तक 20 मौतों की ख़बर आ चुकी थी। अब सवाल यह है कि अगर 66 मौतें हुई थीं तो फिर अस्पतालों के रिकॉर्ड में वे 136 कैसे हो गईं?

हर बात पर अपनी राय रखने में सबसे आगे रहने वाले अरविंद केजरीवाल उससे पहले तक लगभग हर रोज़ ही प्रेस कांफ्रेंस के नाम पर वीडियो कांफ्रेंस करके दिल्ली को यह बताते थे कि हमने कोरोना पर कितने शानदार तरीक़े से जीत हासिल की। लेकिन इस विवाद पर वह कुछ नहीं बोले और उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को आगे कर दिया। सत्येंद्र जैन इस सारे विवाद पर कोई पुख्ता स्पष्टीकरण नहीं दे सके। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि हमने हर मौत की जाँच के लिए डॉक्टरों की एक कमेटी बनाई हुई है। वही तय करती है कि मौत कोरोना से हुई या नहीं। यही नहीं, उन्होंने अस्पतालों पर भी दोष मढ़ दिया कि वे हमें पूरी डेथ समरी ही नहीं भेजते। हम कैसे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मौत कोरोना से ही हुई है।

अगर सरकारी अस्पतालों से भी दिल्ली सरकार को सही आँकड़े नहीं मिल रहे या फिर आँकड़े छिपाए जा रहे हैं तो फिर यह तो वाक़ई हैरानी की और निकम्मेपन की बात ही कही जा सकती है।

बहरहाल, उस दिन के बाद से अचानक मौतों का आँकड़ा बढ़ना शुरू हो गया। 11 दिनों में यह आँकड़ा 231 तक पहुँच गया यानी 14 दिन में 165 मौतें। उस दिन के बाद केजरीवाल ने अपनी रूटीन वीडियो कांफ्रेंस भी बंद कर दी और वह चैनलों पर अवतरित होने से परहेज करने लगे।

इस बीच दिल्ली नगर निगम भी कूद पड़ा। उसने जो आँकड़े दिए हैं, वो दिल्ली में 16 मई तक ही क़रीब 500 मौतों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं। दिल्ली में कोरोना से मरने वालों का अंतिम संस्कार सिर्फ़ गिने-चुने स्थानों पर ही किया जा रहा है। दिल्ली नगर निगम में साउथ और नॉर्थ एमसीडी ही कोरोना की मौतों का अंतिम संस्कार करा रहे हैं। ईस्ट एमसीडी में कोई श्मशान घाट या कब्रिस्तान इसके लिए तय नहीं किया गया। नॉर्थ एमसीडी के तहत दिल्ली के सबसे बड़े निगम बोध श्मशान घाट, मंगोलपुरी मुसलिम कब्रिस्तान और मंगोलपुरी क्रिश्चियन कब्रिस्तान आता है।

क्या हैं अंतिम संस्कार के आँकड़े?

16 मई के आँकड़ों के अनुसार निगम बोध घाट में तब तक 191 शवों का, मुसलिम कब्रिस्तान में 10 शवों का और क्रिश्चियन कब्रिस्तान में एक शव का संस्कार किया गया। कुल मिलाकर यह आँकड़ा 202 बनता है। अगर साउथ एमसीडी की बात करें तो उनके तहत पंजाबी बाग़ श्मशान घाट, आईटीओ मुसलिम कब्रिस्तान और मदनपुर खादर कब्रिस्तान आता है जहाँ 16 मई तक 242 शवों का अंतिम संस्कार किया गया। इनमें पंजाबी बाग़ में 162, आईटीओ कब्रिस्तान में 61 और मदनपुर खादर में एक शव का अंतिम संस्कार हुआ। ये सारे कोरोना-पॉजिटिव केस थे। इसके अलावा 69 ऐसे शवों का अंतिम संस्कार कोरोना प्रोटोकॉल से किया गया जिनके बारे में संदेह था कि उन्हें कोरोना हुआ है। ये सब मिलाकर गिनती 495 तक पहुँच जाती है।

दिल्ली नगर निगम में बीजेपी का शासन है, आम आदमी पार्टी को उसके आँकड़ों पर विश्वास नहीं है। विपक्षी दल इन आँकड़ों पर दिल्ली सरकार से जवाब तलब कर रहे हैं तो सत्येंद्र जैन कहते हैं कि नगर निगम के आँकड़े ज़रूर हैं लेकिन उन्होंने इसके साथ कोई दस्तावेज़ी सबूत तो भेजा नहीं है। इसलिए हम विश्वास नहीं कर रहे। 

सवाल यह है कि दिल्ली सरकार मौतों को लेकर इतनी लुका-छिपी क्यों कर रही है? क्या वो मौतों का आँकड़ा छिपा रही है?

मौतों को कम करके दिखाने का संदेह इसलिए भी पैदा होता है कि ये सारी रिपोर्टें आने के बाद दिल्ली सरकार ने अपनी नीति में दो बड़े बदलाव भी किए हैं। पहला बदलाव, अगर कोई मरीज़ हार्ट, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारी से भी ग्रस्त है तो फिर उसकी मौत को ‘कोरोना मौत’ नहीं कहा जाएगा। दूसरा बदलाव, अगर किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है तो उसके शव का कोरोना टेस्ट नहीं होगा। कारण यह बताया गया है कि जहाँ कोरोना का शक है और तब तक मौत हो जाती है तो फिर टेस्ट के नाम पर कई दिन तक शव नहीं मिल पाता। इससे लोग परेशान होते हैं। अब सवाल यह है कि अगर उसका टेस्ट नहीं होता और उसकी मौत कोरोना से ही होती है तो ज़ाहिर है कि उसके अंतिम संस्कार के वक़्त कोविड-19 प्रोटोकॉल नहीं अपनाया जाएगा। शव से भी कोरोना वायरस फैल सकता है, यह बात भी साबित हो चुकी है। इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने शवों का कोरोना टेस्ट करने पर रोक लगा दी है। ज़ाहिर है कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है तो फिर कोरोना से हुई मौतों का आँकड़ा काफ़ी बढ़ जाएगा। 

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यहाँ भी यह ग़ौर करने वाली बात है कि दिल्ली पुलिस के एक सिपाही और एक कांट्रैक्ट टीचर की मौत कोरोना से हुई। इसका पता उनकी मौत के बाद हुए टेस्ट से ही चला था। दिल्ली सरकार ने इनकी मौत के बाद इन्हें कोरोना योद्धा भी माना है। इनके परिवारवालों को एक-एक करोड़ रुपए की सम्मान राशि भी दी है। अगर इनका मरणोपरांत टेस्ट नहीं होता तो कैसे पता चलता कि उनकी मौत कोरोना से हुई है?

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दिलबर गोठी
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