दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से उन आरोपों पर जवाब मांगा है, जिनमें कहा गया है कि सामाजिक कार्यकर्ता और APCR अध्यक्ष नदीम खान को गैर-कानूनी और बिना इजाज़त के हिरासत में रखा गया था, क्योंकि उन्हें SIR के खिलाफ CJP प्रोटेस्ट में शामिल होने की आशंका थी।
सामाजिक कार्यकर्ता और APCR अध्यक्ष नदीम खान।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक्टिविस्ट नदीम खान की कथित अवैध नज़रबंदी के मामले में दिल्ली पुलिस से जवाब माँगा है। अदालत ने पूछा कि पुलिस किस अधिकार से उनके घर में दाख़िल हुई और उन्हें आने-जाने से रोकने का क्या क़ानूनी आधार था। पुलिस को दो हफ़्ते में स्टेटस रिपोर्ट दाख़िल करने का निर्देश दिया गया है।
नदीम खान एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स यानी APCR के अध्यक्ष हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण SIR के ख़िलाफ़ सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल होने की आशंका के चलते पुलिस ने उन्हें बिना किसी लिखित आदेश के उनके घर और कार्यालय तक सीमित कर दिया था।
हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन सांब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान शाहीन बाग़ पुलिस स्टेशन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। अदालत ने मौखिक रूप से पूछा, 'आप इस व्यक्ति के घर में कैसे घुस सकते हैं? आपको अपना काम करने का अधिकार है, लेकिन आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?'
अदालत ने पुलिस से यह भी पूछा है कि नदीम खान को घर में सीमित रखने का क़ानूनी आधार क्या था। पुलिस की ओर से पेश वकील ने कहा कि खान 29 सितंबर को प्रदर्शन करने वाले थे और इसके लिए अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस का दावा था कि उसे ऐसी जानकारी मिली थी कि अनुमति नहीं मिलने के बावजूद खान प्रदर्शन करने जा सकते हैं, इसलिए उनकी आवाजाही सीमित की गई।
हालाँकि, सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से कोई लिखित जवाब या स्टेटस रिपोर्ट पेश नहीं की गई। अदालत ने पुलिस को नोटिस जारी करते हुए दो हफ़्ते के भीतर स्टेटस रिपोर्ट दाख़िल करने को कहा। खान के वकील की ओर से उनकी निगरानी और रोज़ाना फ़ोन किए जाने पर रोक लगाने का अनुरोध भी किया गया। पुलिस के वकील ने आश्वासन दिया कि अब खान को फ़ोन नहीं किया जाएगा। अदालत ने इस आश्वासन को अपने आदेश में दर्ज कर लिया।
8 अक्टूबर को फिर हिरासत में लेने की आशंका थी
याचिका के मुताबिक़, 8 अक्टूबर को नदीम खान को पुलिस की ओर से बताया गया कि उन्हें अगले दिन हिरासत में लिया जा सकता है और 10 अक्टूबर तक घर में ही रखा जा सकता है। इसके बाद खान ने दिल्ली हाईकोर्ट में तत्काल सुनवाई की माँग की।नदीम खान की याचिका में आशंका जताई गई कि उन्हें SIR के ख़िलाफ़ होने वाले CJP प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने के लिए पहले से ही सीमित किया जा रहा था। याचिकाकर्ता का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने की आशंका अपने आप में किसी व्यक्ति को बिना क़ानूनी प्रक्रिया के घर में सीमित रखने का आधार नहीं हो सकती।
29 सितंबर को घर और कार्यालय पहुँची थी पुलिस
नदीम खान की ओर से पेश वकील शाहरुख आलम ने अदालत को बताया कि 29 सितंबर को पुलिसकर्मी खान के घर और कार्यालय पहुँचे थे। दोनों एक ही परिसर में हैं। वकील के मुताबिक, पुलिस सुबह करीब 9:30 बजे पहुँची और शाम 5:30 बजे तक वहाँ रही। आलम ने कहा कि पुलिसकर्मियों ने उनसे चाय और दोपहर के भोजन की माँग की, जिसे उन्होंने उपलब्ध कराया। लेकिन उनके मुताबिक, पुलिसकर्मी खान को घर और कार्यालय तक सीमित रखने के लिए कोई लिखित आदेश या वारंट नहीं दिखा सके। वकील ने अदालत में दलील दी कि पुलिस की मौजूदगी और निगरानी के कारण खान की आवाजाही प्रभावित हुई। उन्होंने यह भी कहा कि 29 सितंबर के बाद से पुलिस की ओर से लगातार निगरानी की जा रही थी।
नदीम खान का आरोप है कि उन्हें न तो नज़रबंदी से संबंधित कोई लिखित आदेश दिया गया और न ही यह बताया गया कि किस क़ानूनी प्रावधान के तहत उन्हें घर से बाहर जाने से रोका जा रहा है।
निगरानी रखी गई
नदीम खान के वकील ने अदालत को बताया कि 2 अक्टूबर को जब खान अपनी बीमार माँ से मिलने के लिए घर से निकल रहे थे, तब सुबह करीब 7:30 बजे पुलिस का फ़ोन आया। वकील के अनुसार, पुलिस ने उनसे पूछा कि वह कहाँ जा रहे हैं। आलम ने कहा कि उस समय पुलिस ने उन्हें जाने से नहीं रोका, लेकिन लगातार निगरानी जारी रही। उन्होंने बताया कि पुलिस के एक अधिकारी ने अपना नाम इंस्पेक्टर निशांत बताया था।
वकील ने अदालत में इस व्यवहार को उत्पीड़न और मनमानी कार्रवाई बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की गतिविधियों पर इस तरह लगातार नज़र रखना और बार-बार उसकी स्थिति के बारे में पूछना उचित नहीं है, ख़ासकर तब जब उसके ख़िलाफ़ कोई लिखित आदेश नहीं दिखाया गया हो। इस मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस से यह साफ़ करने को कहा कि नदीम खान की आवाजाही सीमित करने के पीछे क्या क़ानूनी आधार था और पुलिस ने किस अधिकार के तहत यह कार्रवाई की।
प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली थी: पुलिस
सुनवाई के दौरान शाहीन बाग़ पुलिस स्टेशन की ओर से पेश वकील ने कहा कि नदीम खान 29 सितंबर को प्रदर्शन करने जा रहे थे, जबकि पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। पुलिस के मुताबिक, उसे ऐसी जानकारी मिली थी कि अनुमति से इनकार के बावजूद खान प्रदर्शन करने की योजना पर आगे बढ़ सकते हैं। पुलिस के वकील ने इसी आधार पर कहा कि खान की आवाजाही सीमित की गई थी।
लेकिन अदालत ने इस दलील पर सवाल उठाया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन सांब्रे ने पूछा कि पुलिस ने अपनी कार्रवाई के पक्ष में लिखित जवाब क्यों दाख़िल नहीं किया, जबकि याचिका की जानकारी उसे पहले से दी गई थी। अदालत ने कहा कि प्रदर्शन की अनुमति देने या न देने का अधिकार पुलिस के पास हो सकता है, लेकिन इससे यह साफ़ नहीं होता कि किसी व्यक्ति को उसके घर में सीमित रखने का अधिकार भी मिल जाता है। पुलिस को यह बताना होगा कि ऐसी कार्रवाई किस क़ानून के तहत की गई।
पीठ ने पुलिस से पूछा कि खान को सीमित रखने का आधार क्या था और क़ानून में ऐसा करने की अनुमति कहाँ दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट के 11 अक्टूबर के आदेश का भी दिया हवाला
नदीम खान के वकील ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 11 अक्टूबर के आदेश का हवाला दिया। इस आदेश में शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों की सभा के मामलों में अवैध हिरासत नहीं होने देने की बात कही गई थी, ख़ासकर उन क्षेत्रों के बाहर जहाँ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू हो। वकील के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपने पेशेवर ड्यूटी के निर्वहन में किसी भी तरह से बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
दो हफ़्ते में स्टेटस रिपोर्ट देगी पुलिस
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए दो हफ़्ते में स्टेटस रिपोर्ट दाख़िल करने का निर्देश दिया है। पुलिस को अपनी कार्रवाई और नदीम खान की आवाजाही सीमित करने के आधार के बारे में अदालत को बताना होगा।
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने या प्रदर्शन में शामिल होने की आशंका के आधार पर पुलिस किसी व्यक्ति को बिना लिखित आदेश के उसके घर में सीमित रख सकती है। अदालत ने पुलिस से इसी कार्रवाई का क़ानूनी आधार साफ़ करने को कहा है।