दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के मुताबिक, दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ‘No Mapping’ यानी मैपिंग नहीं होने या ‘Logical Discrepancies’ यानी तार्किक विसंगतियों के आधार पर नोटिस दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने अब तक यह सार्वजनिक नहीं किया है कि किन मतदाताओं को नोटिस भेजे गए हैं और उन्हें नोटिस देने की सटीक वजह क्या है।
यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पारदर्शिता कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने याचिका दाखिल कर निर्वाचन आयोग और दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी पर SIR प्रक्रिया में पर्याप्त सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाया है। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर 21 सितंबर को सुनवाई करने वाला है।

33.13 लाख मतदाता किन श्रेणियों में?

याचिका में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल 33,13,000 से अधिक मतदाताओं को दो श्रेणियों में रखा गया है।
  • 13,79,785 मतदाता ‘No Mapping’ श्रेणी में हैं।
  • 19,33,134 मतदाता ‘Logical Discrepancies’ श्रेणी में हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन दोनों श्रेणियों में रखे गए मतदाताओं की पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि किसी व्यक्ति को इन श्रेणियों में रखने का सटीक आधार क्या है।
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मैपिंग’ का मतलब क्या है?

SIR में ‘मैपिंग’ का अर्थ मौजूदा मतदाता के विवरण को 2002 की मतदाता सूची से जोड़ना है। इसमें पुराने रोल में संबंधित मतदाता का पार्ट नंबर और सीरियल नंबर देखा जाता है। अगर किसी मौजूदा मतदाता का नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं मिलता, तो उसके माता-पिता के 2002 के मतदाता रिकॉर्ड के आधार पर लिंक स्थापित किया जाता है। ओखला के कांग्रेस बूथ लेवल एजेंट-1 फौजुल अजीम के अनुसार, किस मतदाता की मैपिंग नहीं हुई है और किसे नोटिस भेजा गया है, इसकी जानकारी मुख्य रूप से बूथ लेवल अधिकारियों और चुनाव अधिकारियों के पास है।

‘Logical Discrepancies’ पर सबसे बड़ा सवाल

याचिकाकर्ताओं ने ‘Logical Discrepancies’ शब्दावली पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि निर्वाचन आयोग के 14 मई के संचार और मूल SIR आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किसी मतदाता को ‘Logical Discrepancy’ की श्रेणी में रखने के लिए कौन-से निश्चित मानदंड या पद्धति अपनाई जाएगी।
याचिका के मुताबिक, ऐसी विसंगतियों में नाम, माता-पिता के विवरण या उम्र में अंतर जैसी बातें शामिल हो सकती हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या पश्चिम बंगाल में इस्तेमाल किए गए SIR के मानदंडों को दिल्ली में भी लागू किया जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं की मांग क्या है?

अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने निर्वाचन आयोग से मांग की है कि नोटिस पाने वाले सभी मतदाताओं की एक समेकित और खोज योग्य सूची सार्वजनिक की जाए।

इस सूची में—
  • मतदाता का नाम,
  • पता,
  • नोटिस की संबंधित श्रेणी,
  • और नोटिस जारी करने की विशिष्ट वजह स्पष्ट रूप से दी जाए।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ECI और दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने न तो नोटिस पाने वाले मतदाताओं की सूची सार्वजनिक की है और न ही नोटिस जारी करने के सटीक आधार को स्पष्ट किया है।

ड्राफ्ट मतदाता सूची में 47.56 लाख नाम बाहर

दिल्ली की 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में उन मतदाताओं को शामिल किया गया है जिन्होंने Enumeration Forms जमा किए थे। याचिका में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक इस ड्राफ्ट रोल में करीब 97.53 लाख मतदाता हैं।इसके अलावा करीब 47.56 लाख मतदाताओं को ASDD श्रेणियों के तहत ड्राफ्ट सूची से बाहर रखा गया है। ASDD का मतलब है—Absent, Shifted, Dead और Duplicate, यानी अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट मतदाता।
इस तरह दिल्ली की SIR प्रक्रिया में एक तरफ लाखों नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर होने का मुद्दा है और दूसरी तरफ ड्राफ्ट सूची में शामिल लाखों मतदाताओं को नोटिस दिए जाने को लेकर पारदर्शिता का सवाल उठ रहा है।

अंजलि भारद्वाज ने 9 सितंबर को यह मामला उठाया था

अंजलि भारद्वाज ने 9 सितंबर को X पर पोस्ट कर दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से सवाल किया था कि ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल 33 लाख से अधिक लोगों को नोटिस दिए जाने की खबरों के बावजूद इनके विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए।उन्होंने बताया था कि करीब 19.33 लाख मतदाताओं को ‘anomalies’ या ‘logical discrepancies’ के तहत और लगभग 13.79 लाख को ‘unmapped’ श्रेणी में रखा गया है।भारद्वाज ने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक ‘Logical Discrepancies’ और ‘No Mapping’ श्रेणी में आने वाले मतदाताओं की सूची दिल्ली CEO की वेबसाइट पर प्रकाशित और संबंधित कार्यालयों में प्रदर्शित की जानी चाहिए।
इसके बाद भारद्वाज और जोहरी ने 13 सितंबर को दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को विस्तृत प्रतिनिधित्व भेजा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट 21 सितंबर को सुनवाई करेगा।

JJ बेला एस्टेट में सैकड़ों नाम हटे

SIR को लेकर मध्य दिल्ली के JJ बेला एस्टेट के निवासियों में भी चिंता है।रिपोर्ट के मुताबिक, चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र के पुराने पार्ट 33 के 728 मतदाताओं को ASDD श्रेणी के आधार पर ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया। बूथ लेवल ऑफिसर और बूथ लेवल एजेंट की बैठक के मिनट्स में 632 मतदाताओं को ‘Shifted’ यानी स्थानांतरित बताया गया था। लेकिन बाद में किए गए जमीनी सत्यापन में सामने आया कि 500 से अधिक ऐसे निवासी अभी भी JJ बेला एस्टेट में रह रहे थे, जिन्होंने Enumeration Forms भी भरे थे। इन लोगों ने मतदाता सूची में अपना नाम दोबारा शामिल कराने की कोशिश शुरू कर दी।

462 लोगों ने Form 6 भरा

इलाके के निवासी कमल मास्टर के मुताबिक, ड्राफ्ट सूची प्रकाशित होने के बाद JJ बेला एस्टेट के निवासियों ने BLO को 462 Form 6 आवेदन जमा किए हैं। उनका कहना था कि बाकी मतदाताओं को भी Form 6 भरना है। उन्होंने बताया कि बस्तियों में रहने वाले लोगों की मदद वहां के पढ़े-लिखे बच्चों ने फॉर्म भरने में की। कमल मास्टर के अनुसार, निर्वाचन आयोग ने उन्हें आश्वासन दिया है कि इन लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल कर दिए जाएंगे। अब यह देखना होगा कि अंतिम मतदाता सूची में कितने नाम वापस जोड़े जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में अब क्या होगा?

दिल्ली SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का मुख्य सवाल पारदर्शिता और मतदाताओं को नोटिस दिए जाने के स्पष्ट आधार से जुड़ा है।याचिकाकर्ता चाहते हैं कि आयोग यह सार्वजनिक करे कि किन मतदाताओं को नोटिस दिया गया है, उन्हें ‘No Mapping’ या ‘Logical Discrepancy’ में क्यों रखा गया, इन श्रेणियों को तय करने की स्पष्ट पद्धति क्या है, संबंधित मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर किस प्रक्रिया के तहत मिलेगा।
21 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस पूरे विवाद में आगे की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी।