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सांप्रदायिक भाषण - मोदी को 'पकड़ना' मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है

सुप्रीम कोर्ट का डंडा चला तो चुनाव आयोग ने भाषणों में सांप्रदायिक या अभ्रद भाषा बोलने वाले चार नेताओं को सज़ा दी। चुनाव भाषणों में वही और वैसी ही बातें कहने वाले नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव आयोग ने एक बार भी कोई ऐक्शन नहीं लिया है! आख़िर मोदी बच क्यों निकलते हैं?
नीरेंद्र नागर

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा हड़काए जाने के बाद पक्ष-विपक्ष के चार नेताओं को उनकी सांप्रदायिक या अभ्रद भाषा के लिए दो दिन से लेकर तीन दिनों तक की चुप्पी की सज़ा दे दी है। चलिए, ये चार नेता तो थोड़ी देर के लिए ख़ामोश कर दिए गए मगर बाक़ियों पर ऐक्शन कब लेगा चुनाव आयोग, ख़ासकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जो अपने चुनाव भाषणों में वही और वैसी ही बातें कहते आए हैं लेकिन चुनाव आयोग ने एक बार भी उनके ख़िलाफ़ कोई ऐक्शन नहीं लिया है! ताज़ा उदाहरण बालाकोट वाला बयान है जिसपर मीडिया में चर्चा हुई थी लेकिन उसके बाद भी एक सांप्रदायिक भाषण दिया है मोदी ने जिसपर आयोग ने रिपोर्ट तक नहीं माँगी।

पहले बालाकोट वाले भाषण की बात

लातूर की एक रैली में मोदी ने कहा था कि ‘पहली बार वोट डाल रहे (युवा) क्या अपना वोट बालाकोट पर हवाई हमला करने वाले वीरों को समर्पित कर सकते हैं? क्या वे अपना पहला वोट पुलवामा के शहीदों के नाम पर समर्पित कर सकते हैं?’

चुनाव आयोग ने निर्देश दिया था कि राजनीतिक दल सशस्त्र बलों का उल्लेख अपने भाषण और प्रचार में न करें। मोदी ने उसके निर्देश को ठेंगा दिखाते हुए अपने भाषण में पुलवामा और बालाकोट का ज़िक्र किया लेकिन आयोग उनपर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा, नहीं कर पा रहा। क्यों नहीं कर पा रहा? क्योंकि मोदी ने बालाकोट का ज़िक्र किया लेकिन यह तो नहीं कहा किसी से कि वे अपना वोट बीजेपी के पक्ष में दें। उन्होंने तो बस यह कहा कि पहली बार वोट डालने वाले पुलवामा के शहीदों और बालाकोट के वीरों के नाम अपना वोट समर्पित करें।

हालाँकि यह हर कोई जानता है कि बालाकोट और पुलवामा का हवाला वे किसलिए दे रहे थे।

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मोदी पकड़ में क्यों नहीं आते?

मोदी की यही ख़ूबी है कि वे अपनी बात कह जाते हैं और कोई उनको पकड़ भी नहीं पाता। कैराना में भी उन्होंने यही किया। पिछली 5 अप्रैल को वहाँ एक चुनावी सभा में मोदी ने कहा था - ‘याद करिए जब दिल्ली में महामिलावटी सरकार थी और यहाँ समाजवादी पार्टी की सरकार थी। जाति और धर्म के आधार पर अत्याचार किए गए। कैसे ज़ुल्म हुए, बेटियों के साथ क्या-क्या अन्याय हुआ, कितना अत्याचार हुआ, वह सब याद है ना, याद रखेंगे ना?’

मोदी अगस्त-सितंबर 2013 में हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का हवाला दे रहे थे जिसमें 42 मुसलमानों और 20 हिंदुओं समेत 62 लोग मारे गए थे। दोनों तरफ़ की औरतें भी दंगाइयों की हिंसा का शिकार हुईं और बलात्कार व यौन हिंसा के 13 मामले दर्ज़ हुए। आउटलुक की एक रिपोर्ट के अनुसार कई मामले तो सामने आए ही नहीं।

2002 गुजरात दंगों का ज़िक्र क्यों नहीं?

2002 में गुजरात में दंगे हुए लेकिन मोदीजी नहीं चाहते कि कोई उन दंगों को याद करे। इंटरव्यू के दौरान कोई पत्रकार उनसे इसके बारे में सवाल पूछता है तो वे उठकर चले जाते हैं या उसे प्लेन से उतार देते हैं। लेकिन 2019 में वे 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर को कैराना के ‘लोगों’ को याद दिलाना चाहते हैं कि ‘उनकी’ बेटियों के साथ क्या हुआ। जब वे ऐसा कहते हैं तो उनका इशारा साफ़-साफ़ उन हिंदू स्त्रियों की तरफ़ ही होता है जिनके साथ मुसलमान दंगाइयों ने अत्याचार किया क्योंकि उनकी रैली में जो भीड़ है, वह हिंदुओं की है, बीजेपी का जो कोर वोटर है, वह हिंदू है। लेकिन उनका भाषण सुनें या पढ़ें तो आप सीधे तौर पर उनपर कोई आरोप नहीं लगा सकते कि वे धर्म के आधार पर वोट माँग रहे हैं। उन्होंने तो बस यह कहा - ‘कैसे ज़ुल्म हुए, बेटियों के साथ क्या-क्या अन्याय हुआ, कितना अत्याचार हुआ, वो सब याद है ना, याद रखेंगे ना?’ कोई भी कह सकता है कि वे तो आम स्त्रियों की बात कर रहे थे- चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। वे तो प्रशासन पर आरोप लगा रहे थे जिसके राज में दंगे हुए।

मुग़ल, औरंगज़ेब की चर्चा क्यों?

मोदी यह काम पहले भी कर चुके हैं। पिछले गुजरात विधानसभा चुनावों की बात है। 6 दिसंबर 2017 को मोदी ने एक रैली में कहा कि ‘ऊँच-नीच इस देश के संस्कार नहीं हैं, मुग़ल संस्कार वालों को मेरे जैसे का अच्छा कपड़ा पहनना सहन नहीं होता।’ मोदी तब कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर की एक टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। अय्यर ने किसी पत्रकार से बात करते हुए कहा था कि यह आदमी बहुत नीच है।

माना, अय्यर ने बहुत घटिया भाषा का प्रयोग किया था और बाद में सफ़ाई भी दी थी कि मेरा यह मतलब नहीं था लेकिन सोचिए, ऊँच-नीच के मामले का मुग़लों से क्या लेना-देना! यह सही है कि मुग़लों ने इस देश पर सदियों राज किया, कुछ अच्छे राजा हुए, कुछ बुरे लेकिन उन्होंने ऊँच-नीच के आधार पर दीवानेआम और दीवानेख़ास के अलावा कोई विशेष भेदभाव किया, ऐसा भेदभाव जो किसी और राजा या बादशाह ने न किया हो, ऐसा हमने कहीं पढ़ा नहीं है।

ऊँच-नीच की भावना यदि इस देश में है तो सबसे ज़्यादा वह हिंदुओं में है, उनकी वर्ण व्यवस्था यानी जातिप्रथा ही ऊँच-नीच पर आधारित है। हमारे ज्ञानी और ताक़तवर पुरखों ने पूरे समाज को चार भागों में बाँट दिया, कुछ जातियों को ऊँची ठहरा दिया, कुछ जातियों को नीची।

और यह ऊँच-नीच की भावना आज भी व्याप्त है, गली-गली, गाँव-गाँव, शहर-शहर। इसलिए यह कहना कि ऊँच-नीच इस देश के संस्कार नहीं हैं, सच्चाई से आँखें मूँदना है या ख़ुद को और दूसरों को धोखा देना है।

मोदी का वोटर समझता है उनके मन की बात

चलिए, आँखें मूँद लें यदि मोदी को यह मानने में शर्म आती है कि हिंदू समाज में छुआछूत है, ऊँच-नीच है, लेकिन अपनी बुराई को दूसरों पर उन्होंने क्यों लादा, मुग़लों को इसमें क्यों लपेटा?

मोदी ने मुग़लों को इसलिए लपेटा कि मुग़ल मुसलमान थे। वे मुसलमान बोलकर ‘आचार संहिता’ के उल्लंघन के जाल में फँसना नहीं चाहते थे इसलिए वे अपने भाषणों में ‘मुग़लों’ को ले आते हैं, ‘औरंगज़ेब’ को ले आते हैं। उनका वोटर समझता है कि मोदी क्या कहना चाहते हैं। मुग़ल यानी मुसलमान, औरंगज़ेब यानी मुसलमान, अहमद पटेल यानी मुसलमान।

मोदी जब सीएम थे तब भी इसी तरह इशारों-इशारों में अपनी बात कहते थे। मुझे उनका एक चुनावी भाषण आज भी याद है जिसमें उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस यदि सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा? अहमद मियाँ पटेल। क्या आपलोग अहमद मियाँ पटेल को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हो?’ साफ़ है, जवाब ना में होगा। मोदी ने न हिंदू कहा, न मुसलमान कहा, बस अहमद पटेल के नाम के बीच ‘मियाँ’ लगा दिया लेकिन मतलब साफ़ हो गया।

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जे. एम. लिंग्दोह मामला

इसी तरह 2002 में जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे. एम. लिंग्दोह ने दंगों के कारण चुनावी तारीख़ों को पीछे किया तो मोदी जी ख़फ़ा हो गए। लिंग्दोह ने वही काम किया जो किसी भी चुनाव आयुक्त को करना चाहिए था ताकि चुनाव भय और घृणा के माहौल में न हो। लेकिन मोदी और बीजेपी ने इसे एक अलग रंग दे दिया कि चूँकि लिंग्दोह ईसाई हैं और सोनिया भी ईसाई हैं, इसलिए वे ऐसा कर रहे हैं।

अब मोदी भरी सभा में यह तो नहीं कह सकते कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने 'ईसाई होने के कारण' चुनाव जल्दी कराने में रोड़े अटकाए तो उन्होंने एक निराला रास्ता निकाला। वे भाषणों में लिंग्दोह का पूरा नाम लेते थे – जेम्स माइकल लिंग्दोह ताकि जिनको न पता हो (मुझे भी तब नहीं पता था) कि लिंग्दोह ईसाई हैं, उनको भी पता चल जाए और यह संदेश हिंदू वोटरों तक पहुँच जाए।

यही मोदी की ख़ूबी है कि वे अपना काम कर भी जाते हैं और कोई उनको पकड़ भी नहीं पाता - बिल्कुल उस अपराधी की तरह जो चेहरा छुपाकर और ग्लव्ज़ पहनकर जुर्म करता है ताकि सीसीटीवी में तसवीर आ भी जाए या हथियार बरामद भी हो जाए तो न चेहरा दिखे, न उसकी उँगलियों के निशान कहीं नज़र आएँ।

डॉन की ही तरह मोदी को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

नीरेंद्र नागर
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