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फिर हरियाणा फतेह की तैयारियों में जुटी बीजेपी, क्या मिलेगी जीत?

लोकसभा चुनाव 2019 में बड़ी जीत हासिल करने के बाद बीजेपी ने अब जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहाँ फ़ोकस कर लिया है। अक्टूबर-नवंबर में हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने हैं और पार्टी इन तीनों ही राज्यों में सत्ता में है। लेकिन वह किसी तरह की कोताही नहीं बरतना चाहती और सत्ता में वापसी के लिए किस कदर गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि केंद्र में गृह मंत्री का पदभार संभालने के कुछ ही दिन बाद अमित शाह ने तीनों राज्यों के नेताओं से मुलाक़ात कर विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा की थी। 

हरियाणा में चुनाव प्रचार को तेज़ करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रोहतक में रैली की है। प्रधानमंत्री ने इस दौरान कई विकास कार्यों की आधारशिला भी रखी है जिनमें गुरुग्राम में मेगा फ़ूड पार्क, रोहतक में इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप आदि शामिल हैं। 

प्रधानमंत्री की इस रैली को विजय संकल्प रैली का नाम दिया गया है। बता दें कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर इन दिनों जन आशीर्वाद यात्रा पर पूरे हरियाणा के दौरे पर निकले हुए हैं और बीजेपी इसके माध्यम से पहले से ही चुनाव प्रचार में जुटी हुई है। प्रधानमंत्री की रैली के साथ ही मुख्यमंत्री खट्टर की जन आशीर्वाद यात्रा का भी समापन हो गया है। 

मोदी ने रैली में चुनावी बिगुल फूंकते हुए कहा कि आज हरियाणा का हर परिवार मनोहर बन गया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि रैली में आई भीड़ से हवा का रुख पता चल रहा है और केंद्र व राज्य सरकार के डबल इंजन का पूरा फ़ायदा हरियाणा को मिला है।
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बीजेपी ने रोहतक में प्रधानमंत्री मोदी की रैली का आयोजन बहुत सोच-समझकर किया क्योंकि रोहतक को कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ माना जाता है। रोहतक से ख़ुद भूपेंद्र सिंह हुड्डा, उनके पिता चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा और बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा सांसद रह चुके हैं। 

जीत पर हुई थी हैरानी!

बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव में जीत मिलने के बाद हरियाणा के लोग हैरान हो गए थे क्योंकि जीत थी ही ऐसी। 2009 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को महज 4 सीटों पर जीत मिली थी जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव में उसे 47 सीटें मिली थीं। तब यह माना गया था कि यह मोदी लहर का ही असर है क्योंकि 2014 में मोदी लहर के चलते बीजेपी को अपने दम पर लोकसभा की 282 सीटें मिली थीं और उसके छह माह के भीतर ही हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए थे, ठीक वैसे ही हालात इस बार भी हैं। 

लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रदेश की 90 विधानसभा सीटों में से 79 सीटों पर आगे रही थी और इसीलिए वह मिशन 75 प्लस की रणनीति बनाकर उस पर जोर-शोर से काम कर रही है।

विपक्ष का अता-पता नहीं

दूसरी ओर हरियाणा में विपक्ष पूरी तरह सुस्त पड़ा हुआ है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस बुरी तरह गुटबाज़ी से परेशान है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक़, प्रदेश में कांग्रेस पाँच गुटों में बंटी हुई है। इनमें हुड्डा, उसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाई गईं कुमारी शैलजा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर, विधानसभा में विपक्ष की नेता रहीं किरण चौधरी और कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला का गुट है। 

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कांग्रेस के अलावा हरियाणा की बड़ी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) अपने घर के झगड़ों से ही परेशान है। कुछ समय पहले हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने अपने बड़े बेटे अजय चौटाला को पार्टी से निकाल दिया था। जिसके बाद अजय चौटाला के बेटों दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला ने अपनी नई पार्टी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) का गठन कर लिया था। 

जींद विधानसभा के उपचुनाव में जब सुरजेवाला बुरी तरह हारे थे तो जेजेपी को इनेलो से अच्छे मत मिले थे। लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी चौटाला परिवार एक होने को तैयार नहीं है और इससे सबसे बड़ा फ़ायदा बीजेपी को ही होगा क्योंकि जेजेपी, इनेलो के मतों को ही काटेगी। पहले लग रहा था कि जेजेपी चुनाव में एक बेहतर विकल्प बन सकती है लेकिन बीएसपी के साथ हुआ उसका गठबंधन टूट गया है और फिर यह एक बार बीजेपी को फ़ायदा पहुँचाने वाली स्थिति है क्योंकि बीएसपी-जेजेपी के साथ होने से जाट और दलित मतदाता साथ आ सकते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। बीएसपी ने कहा है कि वह राज्य में अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। 

हरियाणा में ग़ैर जाट मतों के ध्रुवीकरण में जुटे बीजेपी के पूर्व सांसद राजकुमार सैनी की कोशिश है कि वह किसी तरह एक बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बन जाएँ। पहले बीएसपी ने उनकी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी से गठबंधन किया था लेकिन बाद में भी बीएसपी ने इनसे भी किनारा कर लिया।

एक और राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी है जिसकी भरपूर कोशिश है कि वह भले ही हरियाणा में अपनी सरकार न बना सके लेकिन कम से कम मजबूत उपस्थिति तो दर्ज कराए। लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी की हरियाणा ही नहीं दिल्ली में जहाँ उसकी सरकार है, वहाँ भी बुरी गत हो चुकी है। 

याद दिला दें कि दिल्ली में जब दो राज्यसभा सीटों के लिए टिकट बंटवारे की बात सामने आई थी तो केजरीवाल ने एक सीट पर दिल्ली कांग्रेस के नेता रहे सुशील गुप्ता को टिकट दिया था। सूत्रों के मुताबिक़, सुशील गुप्ता के हरियाणा में बड़ी संख्या में स्कूल, कॉलेज और अस्पताल हैं और वहाँ उनका अच्छा नेटवर्क भी है। तब केजरीवाल ने कहा था कि उनका अगला लक्ष्य हरियाणा में सरकार बनाना है। केजरीवाल ख़ुद भी मूल रूप से हरियाणा के ही रहने वाले हैं। 

हरियाणा ऐसा राज्य है जहाँ से बड़ी संख्या में जवान सेना में हैं और सीमा पर देश की रक्षा में तैनात हैं। बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के मुद्दे को जिस तरह राष्ट्रवाद से जोड़ा है, उससे लगता है कि वह इस मुद्दे का सियासी लाभ उठाने की कोशिश में है। क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले जब केंद्र सरकार ने पुलवामा हमले के जवाब में पाकिस्तान के बालाकोट में हमला किया था, तब भी बीजेपी ने इसे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद से जोड़कर हरियाणा और देश भर में वोट बटोरे थे। हरियाणा की तो 10 की 10 लोकसभा सीटों पर उसे जीत मिली थी। ऐसे हालात में बीजेपी के लिए हरियाणा फतेह करना मुश्किल नहीं माना जा रहा है। लेकिन अगर कांग्रेस एकजुट होकर लड़ी और बाक़ी विपक्षी दल भी मजबूती से लड़े तो राज्य से बीजेपी सरकार की विदाई हो सकती है। 

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