हिमाचल प्रदेश में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी में एक शूद्रों को लेकर आपत्तिजनक लिखे एक पोस्टर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जन्माष्टमी के मौक़े पर आयोजित एक छात्र कार्यक्रम के दौरान कैंपस में लगाए गए 'भगवद गीता- द टाइमलेस विज़डम' शीर्षक वाले पोस्टर में समाज को चार वर्णों में बाँटते हुए शूद्रों की भूमिका 'उच्च वर्गों की सेवा करना' बताई गई थी। पोस्टर सामने आने के बाद इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, जिसके बाद संस्थान के निदेशक प्रोफेसर लक्ष्मीधर बेहरा ने मामले की जाँच के लिए समिति गठित कर दी है।

विवादित पोस्टर आईआईटी मंडी के ऑडिटोरियम के बाहर लगाया गया था। सोशल मीडिया पर साझा किए गए पोस्टर के स्क्रीनशॉट में भगवद गीता का हवाला देते हुए चार वर्णों की भूमिकाएँ बताई गई थीं। इसमें ब्राह्मणों की भूमिका 'ईश्वर का संदेश फैलाना', क्षत्रियों की भूमिका 'समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना', वैश्यों की भूमिका 'अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना और दूसरों की मदद करना' और शूद्रों की भूमिका 'उच्च वर्गों की सेवा करना' बताई गई थी। पोस्टर में भगवद गीता का एक श्लोक भी दिया गया था, जिसमें कहा गया है कि समाज के चार वर्ग प्रकृति के गुणों और कर्मों के आधार पर बनाए गए हैं।
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पोस्टर पर मचा विवाद

पोस्टर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद कई लोगों ने इसे जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने वाला बताया। आलोचकों का कहना है कि देश के प्रमुख तकनीकी संस्थान में इस तरह का संदेश संविधान में दिए गए समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है। विवाद बढ़ने पर आईआईटी मंडी प्रशासन को सफाई देनी पड़ी।

डायरेक्टर ने बनाई जाँच समिति

आईआईटी मंडी के निदेशक प्रोफेसर लक्ष्मीधर बेहरा ने कहा कि यह पोस्टर संस्थान की ओर से जारी नहीं किया गया था, बल्कि यह एक छात्र-आयोजित कार्यक्रम का हिस्सा था। पीटीआई के अनुसार उन्होंने बताया है कि पूरे मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई गई है। इस समिति में अलग-अलग विभागों के शिक्षकों के साथ अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि जाँच के बाद ही यह तय होगा कि पोस्टर कैसे लगाया गया और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है।

छात्रों को भेजा ईमेल

रिपोर्ट के अनुसार आईआईटी मंडी समुदाय को रविवार को भेजे गए ईमेल में निदेशक ने पोस्टर की कड़ी निंदा की। उन्होंने लिखा कि इस घटना की जानकारी मिलने पर उन्हें गहरा झटका लगा। उन्होंने साफ़ किया कि संस्थान किसी भी तरह से इस पोस्टर का समर्थन नहीं करता। ईमेल में उन्होंने कहा कि संस्थान संविधान में निहित समानता, सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक सोच के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है तथा किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव की कड़ी निंदा करता है। उन्होंने कैंपस के सभी छात्रों और कर्मचारियों से सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील भी की।

प्रोफेसर बेहरा ने दावा किया कि उन्होंने हमेशा जाति आधारित भेदभाव का विरोध किया है। उनका कहना है कि जब उन्होंने आईआईटी मंडी की जिम्मेदारी संभाली थी तब संस्थान में ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के बहुत कम शिक्षक थे। उनके कार्यकाल में इन वर्गों के शिक्षकों की संख्या बढ़ी है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस्कॉन जातिगत भेदभाव के खिलाफ है।

उनके अनुसार, इस्कॉन में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग पुजारी हैं और वहां जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि गीता में वर्ण व्यवस्था का आधार 'गुण और कर्म' बताया गया है, न कि जन्म।
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प्रोफेसर बेहरा पहले भी रहे हैं विवादों में

आईआईटी मंडी के निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा इससे पहले भी कई बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। 2023 में उन्होंने छात्रों से मांसाहार न करने की शपथ लेने की अपील की थी और दावा किया था कि हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएं पशुओं पर क्रूरता से जुड़ी हैं।
2022 में उनका एक वीडियो सामने आया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने मंत्रोच्चार के जरिए एक परिवार को 'बुरी आत्माओं' से मुक्त कराया।
वह लंबे समय से भगवद गीता पर पाठ्यक्रम पढ़ाते रहे हैं और प्रस्तावित भक्तिवेदांत विश्वविद्यालय से भी जुड़े हुए हैं, जिसे इस्कॉन की पहल बताया जाता है।

फिलहाल आईआईटी मंडी प्रशासन ने साफ़ किया है कि विवादित पोस्टर संस्थान की आधिकारिक नीति का हिस्सा नहीं था और इसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच की जा रही है। अब जांच समिति की रिपोर्ट से यह साफ़ होगा कि पोस्टर किसने तैयार किया, इसे लगाने की अनुमति कैसे मिली और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए संस्थान क्या क़दम उठाएगा।