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रिलायंस व अडानी समूह के आला अफ़सर भी थे पेगासस की नज़र में

पेगासस सॉफ़्टवेअर से जासूसी कराने के मामले में नए नाम जुड़ते जा रहे हैं, नए खुलासे होते जा  रहे हैं और पता चल रहा है कि यह कितना बड़ा जाल था और कितने व किस तरह के लोग इसके निशाने पर थे।

रिलायंस व अडानी जैसे बड़े कॉरपोरेट घरानों के अलावा जीवन बीमा निगम जैसी सरकारी कंपनियों के आला अफ़सरों के नाम भी एनएसओ के लीक डेटाबेस में शामिल हैं। 

बता दें कि फ्रांसीसी मीडिया ग़ैर-सरकारी संगठन फॉरबडेन स्टोरीज़ ने स्पाइवेअर पेगासस बनाने वाली इज़रायली कंपनी एनएसओ के लीक हुए डेटाबेस को हासिल किया तो पाया कि उसमें 10 देशों के 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों के फ़ोन नंबर हैं।

इनमें से 300 भारतीय हैं। इस संगठन ने 16 मीडिया कंपनियों के साथ मिल कर इस पर अध्ययन किया। इसमें भारतीय मीडिया कंपनी 'द वायर' भी शामिल है। 

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कॉरपोरेट जगत 

जेट एअरवेज़ के संस्थापक नरेशन गोयल, सरकारी कंपनी गैस अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख बी. सी. त्रिपाठी, स्पाइसजेट के अध्यक्ष अजय सिंह और एस्सार समूह के प्रशांत रुइया भी पेगासस सॉफ़्टवेअर के निशान पर थे। 

उनके नाम भी एनएसओ के लीक डेटाबेस में थे, यानी उनके फ़ोन भी निशाने पर थे। लेकिन यह साबित नहीं हो सका है कि इन लोगों की जासूसी वाकई हुई थी। रिलायंस और अडानी जैसे बड़े औद्योगिक समूहों के शीर्ष के अफ़सर भी पेगासस के निशाने पर थे।

रिलायंस एडीए समूह के ए. एन. सेतुरमण और रिलायंस समूह में लंबे समय तक ऊँचे पद पर काम कर चुके वी. बालासुब्रमणियन के नाम भी एनएसओ की सूची में थे।

अडानी समूह के एक बड़े अफ़सर का नाम भी एनएसओ के डेटाबेस में पाया गया था। 

इसके अलावा फ्रैंकलिन टेंपलटन, डीएसपी ब्लैकरॉक और मोतीलाल ओसवाल भी पेगासस सॉफ़्टवेअर के निशाने पर थे। 

रोटोमैक के विक्रम कोठारी, उनके बेटे राहुल कोठारी, एअरसेल के सी. शिवशंकरन को भी एनएसओ के भारतीय ग्राहक ने निशाने पर लिया था। 

सरकारी उपक्रम जीवन बीमा निगम और गुजरात नर्मदा वैली फ़र्टिलाइज़र के प्रमुख भी पेगासस सॉफ़्टवेअर के निशाने पर थे।
बता दें कि सरकार इन दोनों  कंपनियों के अपने शेयरों का एक छोटा हिस्सा बेचने पर तैयार हो चुकी है। 

मामला सुप्रीम कोर्ट में

पेगासस स्पाइवेयर मामले की जाँच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कराए जाने को लेकर सीपीएम के एक सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इससे पहले एक वकील ने भी अदालत में याचिका दायर कर ऐसी ही मांग की थी।

प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया सहित पत्रकारों के कई संगठन भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जाँच कराए जाने की मांग कर चुके हैं। विपक्षी दल के नेता भी संयुक्त संसदीय कमेटी यानी जेपीसी या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जाँच की मांग लगातार कर रहे हैं। 

याचिका में कहा गया है कि सरकार ने न तो स्वीकार किया है और न ही इनकार किया है कि स्पाइवेयर उसकी एजेंसियों द्वारा खरीदा और इस्तेमाल किया गया था।बता दें कि सरकार ने एक बयान में कहा है कि उसकी एजेंसियों द्वारा कोई अनधिकृत रूप से इन्टरसेप्ट नहीं किया गया है और विशिष्ट लोगों पर सरकारी निगरानी के आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है।

पेगासस जासूसी के राजनीतिक नतीजे क्या होंगे, बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष। 
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