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इलाहाबाद में आफरीन फातिमा के घर को गिराता बुलडोजर। फाइल फोटो।

बुलडोजर जस्टिसः टाइम मैगज़ीन ने आफरीन फातिमा का छापा दर्द

इलाहाबाद में जिस घर को एक दिन के अंदर मात्र आरोपी के रूप में नाम आने पर गिरा दिया गया, उस पूरे घटनाक्रम और भारत में मुसलमानों के साथ हो रही नाइंसाफी को टाइम पत्रिका ने प्रकाशित किया है। टाइम पत्रिका ने यह लेख उन्हीं आफरीन फातिमा से लिखवाया है, जो एक्टिविस्ट हैं, जिनके पिता जावेद पंप जेल में हैं।

आफरीन ने लिखा है कि कभी आपने सोचा है कि अघोषित हिंदू राष्ट्र भारत में मुस्लिम होना कैसा होता है? लगातार अपमान, जुल्म, आपकी आत्मा को नष्ट करने के लिए आप अभिशप्त बना दिए जाते हैं और इन हालात में कभी-कभी, आपका घर भी उसका शिकार हो जाता है।

Bulldozer Justice: Time Magazine published Afreen Fatima pain - Satya Hindi
-आफरीन फातिमा
हमारी आस्था, इतिहास से लेकर हमारे खान-पान और कपड़ों तक पर, आज भारत पर शासन करने वाले हिंदू वर्चस्ववादियों ने हमारे समुदाय के खिलाफ अपने अभियान में कुछ भी नहीं छोड़ा है। नरेंद्र मोदी की सरकार के आठ वर्षों के दौरान, उन्होंने नियमित रूप से हमें निशाना बनाने के नए-नए तरीके खोजकर हमारे देश की धर्मनिरपेक्षता की नींव पर कड़ी चोट मारी है।
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मई में, बीजेपी की एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने टीवी पर पैगंबर मुहम्मद के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी। भारत में मुसलमान इससे नाराज़ हो गए। इसके तुरंत बाद, 10 जून को, भारत के कुछ हिस्सों में मुसलमानों ने जुमे की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन किया। ऐसा ही एक विरोध मेरे शहर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था, जो हिंसा में बदल गया था। पुलिस ने इसके बाद शहर भर में मुसलमानों की मनमानी गिरफ्तारी की।

मेरे परिवार से मेरे पिता, जो एक समुदाय के नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, पुलिस की अवैध हिरासत का शिकार हुए। पुलिस ने मेरी मां और बहन को बिना गिरफ्तारी वारंट के आधी रात को हमारे घर से उठा लिया और हिरासत के सभी नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें 35 घंटे से अधिक समय तक थाने में बैठाया। 
शहर के अधिकारियों और पुलिस ने मेरी मां और बहन को यातना और तमाम आरोपों की धमकी देकर 11 जून की रात को हमारे गेट पर एक पिछली तारीख का नोटिस जड़ दिया। जिसमें इसे अवैध इमारत होने का दावा किया गया था। इसे अगले दिन ध्वस्त करने की बात कही गई। हमने हमेशा सभी टैक्सों का भुगतान किया था, हमारे सभी संपत्ति दस्तावेज जमा हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारे घर को अचानक "अवैध" करार दिया गया था।
इस प्रकार हमारा घर भारत में "बुलडोजर न्याय" के रूप में जाना जाने वाले परिचित पैटर्न का हिस्सा बन गया। यह इस तरह काम करता है: सरकार पहले मुसलमानों को गंभीर "अपराधों" में फंसाती है, जैसे कि विरोध प्रदर्शन में भाग लेना, फिर उन्हें हिंसा के लिए दोषी ठहराना और उनके घरों को बुलडोजर से गिरा देना। इस साल की शुरुआत में, एक हिंदू त्योहार के दौरान मुस्लिम घरों और कारोबारियों पर टारगेट हमले शुरू करने से पहले, तलवार चलाने वाले हिंदू आतंकवादियों ने कई शहरों में मुस्लिम इलाकों में मार्च किया। रमजान के दौरान मस्जिदों के सामने लाउडस्पीकरों पर अश्लील हरकतें कीं गईं। फिर भी, पुलिस ने अशांति के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया, नाबालिगों सहित सैकड़ों निर्दोष मुसलमानों को गिरफ्तार किया और उनके घरों को बुलडोजर से तोड़ दिया। 

निजी संपत्ति के ऐसे विध्वंस के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, भले ही उन लोगों को वास्तव में हिंसक कृत्यों में शामिल पाया गया हो। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; यह एक्शन यह प्रदर्शित करता है कि हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं है। हम समान नागरिक नहीं हैं।


-आफरीन फातिमा, टाइम पत्रिका में

जब से हमारा अपना घर तोड़ा गया तब से मेरे पिता जेल में हैं। हमारे घर तोड़ने का लाइव प्रसारण हुआ। हमारे चेहरे प्राइम टाइम बहसों पर ऐसे दिखाए गए, जैसे हम अपराधी हों। टीवी एंकर हमारे जीवन और सक्रियता के बारे में कहानियां सुना रहे थे, साजिश को हवा दे रहे हैं, हमें "देशद्रोही" और "जिहादी" कह रहे हैं। इसके बाद मुझे जान से मारने और रेप की धमकियां मिल रही हैं। 

अब जबकि हर कोई जानता है कि मैं कैसी दिखती हूं, मुझे सार्वजनिक रूप से बाहर निकलने में डर लगता है। मेरी जिन्दगी एक कैदी की तरह हो गई है।


-आफरीन फातिमा, टाइम मैगजीन में

मेरे खिलाफ कोई गिरफ्तारी वारंट नहीं है। अब उसकी जरूरत भी कहां रही। मेरे अधिकांश साथी मुस्लिम छात्र कार्यकर्ता जो जेल में हैं, उन्हें बिना किसी उचित प्रक्रिया या कागजी कार्रवाई के गिरफ्तार कर लिया गया। कभी-कभी जब वे लापता हो जाते हैं, तो उनके माता-पिता को यह भी नहीं पता होता है कि उन्हें हिंदू चरमपंथियों ने गिरफ्तार किया है या उनका अपहरण कर लिया गया है - वैसे भी दोनों के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। 

मैंने खुद को कैद कर लिया है क्योंकि भारत में एक युवा मुस्लिम महिला के रूप में - जहां अति-दक्षिणपंथी हिंदू हमें ऑनलाइन नीलाम (बुल्ली बाई-सुल्ली डील्स) करते हैं। भारत में एक मुखर मुसलमान की स्थिति बदतर है।


-आफरीन फातिमा, टाइम पत्रिका में

मेरी परवरिश काफी मध्यमवर्गीय रही। मेरे अब्बू (पिता) एक व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। अपने सीमित बजट के बावजूद, अब्बू और अम्मी, मेरी माँ, ने मुझे और मेरे चार भाई-बहनों को शहर के सबसे अच्छे स्कूल में भेजा और हमें बेहद स्वतंत्र, ईश्वर-भक्त, सामाजिक रूप से जिम्मेदार और दिमाग वाले नागरिक के रूप में पाला। हालांकि हिंदू एकाधिकारवादी हमें संविधान द्वारा गारंटीशुदा समान नागरिकता के योग्य नहीं मानते हैं। हम अपनी धार्मिक पहचान का दावा उस तरह नहीं कर सकते हैं, जैसा बाकी लोग करते हैं। अगर हम ऐसा करते हैं तो हमें "कट्टरपंथी" या "जिहादी" कहा जाता है। हम देखने या सुनने के लिए नहीं बने हैं, क्योंकि उनके लिए हमारा अस्तित्व ही एक अपराध है।

2017 में, जब मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी, अजय सिंह बिष्ट उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, जिस उत्तर भारतीय राज्य से मैं आती हूं। यह भारत का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। जिसकी आबादी ब्राजील की तुलना में अधिक है। उस राज्य में मुसलमान आबादी का पांचवां हिस्सा है। एक मठवासी प्रमुख जो हिंदू वर्चस्ववाद के सबसे अधिक कट्टरपंथी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, योगी आदित्यनाथ के नाम से जाने जाते है। वो अपने नफरत भरे भाषण और मुसलमानों के खिलाफ नीतियों के लिए जाने जाते हैं। 
जैसे ही बिष्ट सत्ता में आए, मेरी जिंदगी बदलने लगी। उग्रवादी हिंदू राजनीति ने रफ्तार पकड़ी तो राज्य में सामाजिक माहौल खराब होने लगा। राजनीति में हाशिए पर पड़े मुसलमानों को सांस्कृतिक रूप से मिटाया जाने लगा। मुस्लिम लगने वाले स्थान के नाम बदलने लगे। मेरे शहर का नाम मुगल काल के इलाहाबाद से बदलकर प्रयागराज कर दिया गया।
हम अपने समुदाय के अस्तित्व के खतरे के बारे में अधिक जागरूक हो गए थे और इस अन्याय का सामना करना चाहते थे। मैंने एएमयू छात्र संघ का चुनाव लड़ा और बिष्ट के नफरत फैलाने वाले और पूरे भारत में मुसलमानों के लिए बढ़ते खतरे के खिलाफ बोलने के लिए मंच का उपयोग करते हुए अध्यक्ष चुना गया। मुझे जिस बदसूरत दक्षिणपंथी प्रतिशोध का सामना करना पड़ा, उसने मुझे पीछे धकेलने के लिए और अधिक दृढ़ बना दिया। 
एक छात्र नेता के रूप में, मुझे एक "स्वतंत्र सोच", "आधुनिक" मुस्लिम महिला कहा जाता था जो पितृसत्ता का सामना कर रही थी। लेकिन सभी ने उस पहचान को नज़रअंदाज़ करने का फैसला किया जिसे मैं वास्तव में सबसे अधिक जोर देने की कोशिश कर रही थी: एक भारतीय मुसलमान की। मैंने उन जगहों पर एक मुस्लिम महिला के रूप में अपनी उपस्थिति का दावा करने के लिए हिजाब पहनना शुरू कर दिया, जहां मैं अवांछित महसूस करती थी।
मेरी सक्रियता ने मुझे 2019 में मुसलमानों के साथ भेदभाव करने वाले एक नए नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में शामिल किया। 

कई मुस्लिम छात्र नेताओं की तरह, मुझे भी बेशर्म पक्षपाती टेलीविजन चैनलों पर मीडिया ट्रायल का सामना करना पड़ा, जो भारत में नफरतों के प्रमुख वाहक हैं। उन्होंने मेरे भाषणों को गलत तरीके से पेश किया और मुझे अलगाववादी करार दिया।


-आफरीन फातिमा, टाइम पत्रिका में

मेरे कई दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया गया और विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए राष्ट्रीय राजधानी में सुनियोजित और राज्य प्रायोजित दंगों में मुसलमानों को मार दिया गया। मुसलमानों द्वारा अहिंसक नागरिक अधिकारों के विरोध के जवाब में हमारे लिए एक स्पष्ट संदेश था: यहां मुसलमानों का कोई अधिकार नहीं है। 
इसके बाद कोरोना आ गया। महामारी फैल गई। विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए गए। हमारा घर (जो अब गिराया जा चुका है) एक खाद्य वितरण केंद्र बन गया, जहां हमने उन लोगों को मासिक राशन दिया, जो 2020 में कोविड लॉकडाउन के दौरान भूखे रह जाते थे। नफरत बांटने के धंधे में जुटे लोग चुप नहीं बैठे, उन्होंने कोविड19 के लिए अब मुसलमानों को दोष देना शुरू कर दिया। 

उन्होंने कहा कि भारत में कोरोना वायरस का प्रसार मुसलमान कर रहा है। सरकार ने भी जवाबदेही से बचने के लिए हमारे समुदाय को बलि का बकरा बना दिया। क्योंकि हमारे खिलाफ नफरत सभी तर्क को रौंद देती है।


-आफरीन फातिमा, टाइम मैगजीन में

और हर गुजरते हफ्ते में मुसलमानों पर हमले की एक नई सीमा, एक नई चाल, नया आक्रोश, नया भय। रमज़ान को टारगेट किया गया। देश में हिंसक हिंदू जुलूस शुरू हो गए, जिससे अधिक हिंसा हुई।मुस्लिम घरों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। हालात ने मेरे अब्बू की नींद छीन ली। वो नफरत के बढ़ते ज्वार के खिलाफ खुद को असहाय महसूस करते थे। वो अपने अधिकार जानते थे, उन्होंने अदालत और पुलिस के साथ याचिकाएं और शिकायतें दर्ज कराना जारी रखा।

बीजेपी प्रवक्ता द्वारा पैगंबर मुहम्मद पर भद्दी टिप्पणियों के बाद, उन्होंने फेसबुक पर शांति की अपील की।

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मेरे अब्बू के साथ पुलिस हिरासत में क्या हो रहा है, कोई नहीं जानता। क्या मुझे फिर से रातों को अच्छी नींद आएगी, कई दिन एक धुंधलेपन में बीत गए। हम बेगुनाही साबित करने में जुटे हैं। यही दर्द ही सजा है। मोदी के भारत में मुसलमान होने की यह सजा है। क्या दुनिया जानती है कि हम कैसे रहते हैं? क्या दुनिया को हमारी परवाह भी है?

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