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जस्टिस चित्तरंजन दास

मैं तो बचपन से संघी था, फिर RSS में लौटने को तैयारः जस्टिस दाश

कलकत्ता हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस चित्त रंजन दाश ने सोमवार को कहा कि उनके व्यक्तित्व को निखारने, साहस और देशभक्ति पैदा करने का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को जाता है। जज ने कहा कि वह तो बचपन से ही आरएसएस से जुड़ गए थे। जज साहब ने फरमायाः 

आज, मुझे सच्चाई बतानी चाहिए। मुझ पर इस संगठन का बहुत एहसान है। मैं बचपन से लेकर जवानी तक वहां रहा। मैंने साहसी, ईमानदार होना, दूसरों के लिए समान नजरिया रखना और सबसे ऊपर, सीखा है- आप जहां भी काम करते हैं वहां देशभक्ति की भावना और काम के प्रति प्रतिबद्धता होनी चाहिए। मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं आरएसएस का सदस्य था और हूं।"


-जस्टिस चित्तरंजन दाश (अब रिटायर), कलकत्ता हाईकोर्ट 20 मई 2024 सोर्सः लाइव लॉ

हालांकि जस्टिस दाश ने यह भी कहा कि जज बनने के बाद उन्होंने खुद को आरएसएस से अलग कर लिया और सभी मामलों और मुकदमों को निष्पक्षता से निपटाया, चाहे वे किसी भी पार्टी से जुड़े रहे हों।

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जस्टिस दाश ने विस्तार से संघ से अपने रिश्तों के बारे में कहा- "न्यायिक सेवा में आने के बाद लगभग 37 वर्षों तक संगठन (आरएसएस) से दूरी बना ली। मैंने कभी भी अपने करियर में तरक्की पाने के लिए अपने संगठन की सदस्यता का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि यह हमारे सिद्धांत के खिलाफ है। मैंने सभी के साथ समान व्यवहार किया है चाहे वह कम्युनिस्ट शख्स रहा हो, चाहे वह भाजपा या कांग्रेस या यहां तक ​​कि टीएमसी का शख्स हो। मेरे मन में किसी के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं था। मेरे सामने दो सिद्धांत थे: एक था सहानुभूति और दूसरा था इंसाफ के लिए कानून को झुकाया जा सकता है, लेकिन इंसाफ को कानून के हिसाब से नहीं बनाया जा सकता है।"

ओडिशा के सोनेपुर में 1962 में पैदा हुए जस्टिस दाश 1986 में वकील बने। 1999 में, उन्होंने ओडिशा जूडिशल सर्विसेज में प्रवेश किया और राज्य के विभिन्न हिस्सों में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। फिर उन्हें उड़ीसा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (प्रशासन) के रूप में नियुक्त किया गया।

10 अक्टूबर, 2009 को उन्हें उड़ीसा हाईकोर्ट के अतिरिक्त जज के रूप में प्रमोट किया गया और 20 जून, 2022 को कलकत्ता हाईकोर्ट में नियुक्त कर दिया गया।

जस्टिस दाश ने कहा कि "मैंने दो सिद्धांतों का जीवन में हमेशा पालन किया है। चाहे मैंने गलत किया होगा या सही किया होगा, लेकिन, मैं अब संगठन (संघ) में वापस जाने के लिए तैयार हूं। अगर वे मुझे किसी भी मदद के लिए बुलाते हैं, या किसी भी काम के लिए बुलाते हैं। वो काम मैं करने में सक्षम हूं तो मदद करूंगा। चूँकि मैंने अपने जीवन में कुछ भी गलत नहीं किया है, इसलिए मुझमें यह कहने का साहस है कि मैं संगठन से हूँ, क्योंकि यह भी गलत नहीं है। अगर मैं एक अच्छा इंसान हूं, तो मैं किसी बुरे संगठन से नहीं जुड़ सकता।''

ऐसी है हमारी जूडिशरी

जस्टिस दाश से पहले एक और जज साहब ने अपनी प्रतिबद्धता भाजपा से जताई थी। हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट के एक अन्य जज, जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने भाजपा में शामिल होने के लिए पद से इस्तीफा दे दिया था। वो पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के तमलुक लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव भी लड़ रहे हैं। यह जज तो सेवा में रहते हुए ही भाजपाई बन बैठे और फिर इस्तीफा दिया। इनके तमाम फैसलों पर पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी सवाल उठाती रही है। 

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इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे रंजन गोगोई को भी रिटायरमेंट के बाद भाजपा ने राज्यसभा का सांसद पद एक तरह से नवाजा था। ये वही जस्टिस गोगोई हैं जिनकी अगुआई वाली बेंच ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने के लिए जमीन सरकार को सौंपी थी। यानी आरएसएस और भाजपा का राम मंदिर का सपना जस्टिस गोगोई की वजह से पूरा हुआ था। हालांकि अपने फैसले में जस्टिस गोगोई की बेंच ने लिखा था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गलत गिराया गया। लेकिन चूंकि करोड़ों लोगों की आस्था का सवाल है तो मस्जिद की जगह मंदिर बनाने के लिए जमीन सरकार को सौंपी जाती है। सरकार एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर बनाने की जिम्मेदारी ट्रस्ट को सौंपे। उसके बाद जो हुआ वो सभी के सामने है। यानी कुल मिलाकर न्यायपालिका पूरी तरह पाक साफ होने का दावा नहीं कर सकती। लेकिन अगर कल को कोई जज यह स्वीकार कर ले कि वो मदरसे से पढ़ा है और मुस्लिम लीगी रहा है या जन्मजात कांग्रेसी रहा है तो देश में तूफान आ जाएगा। यही चित्तरंजन दाश अगर मुसलमान नाम वाले होते और अपनी प्रतिबद्धता मुस्लिम लीग से बताते तो उनके खिलाफ कई राष्ट्रवादी एफआईआर करा देते और कोई ताज्जुब नहीं कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेती। ऐसा इस देश में हो रहा है। 
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क़मर वहीद नक़वी
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