पत्रकार सुकन्या शांता की याचिका में कहा गया था कि जेल की बैरक में जाति-आधारित भेदभाव शारीरिक श्रम तक में किया जाता है। इससे विमुक्त जनजातियों और आदतन अपराधियों के रूप में वर्गीकृत लोग जेल में प्रभावित होते है। याचिका में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, ओडिशा, झारखंड, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के जेल मैनुअल में पाए गए भेदभावपूर्ण प्रावधानों को निरस्त करने की मांग की गई है।
हालाँकि मॉडल जेल मैनुअल स्पष्ट रूप से जाति के आधार पर श्रम को प्रतिबंधित करता है। लेकिन यह विमुक्त जनजातियों और खानाबदोश समुदायों के सदस्यों के अन्य भेदभावपूर्ण वर्गीकरणों पर चुप है जो अधिकांश राज्यों में प्रचलित हैं। इसी तरह, मॉडल जेल मैनुअल में सूखे या अस्वच्छ शौचालयों के इस्तेमाल और मैनुअल स्केवेंजर्स (हाथ से मानव मल उठाना) के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। मैनुअल स्कैवेंजर्स तो पुनर्वास अधिनियम, 2013 के तहत अब प्रतिबंधित भी है।