बीते एक साल में दुनिया भर में लोकतंत्र को लेकर बढ़ती चिंता ने राजनीति शास्त्र के एकेडेमिक्स में हलचल मचा दी है, पिछले साल ही कम से कम 5 ऐसी किताबें हारवर्ड से लेकर कैंब्रिज तक के विश्वविद्यालयों से आयी हैं जिन्होंने दुनिया भर में पाठकों को हिला कर रख दिया है।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।














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