दूसरी तरफ स्टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बांड की बिक्री पर शाखाओं से डेटा सीलबंद लिफाफे में उसके मुंबई मुख्यालय को भेजा जाता है। इसी तरह, बांड भुनाने वाले राजनीतिक दलों का डेटा नामित शाखाओं द्वारा सीलबंद कवर में भेजा जाता है। बैंक ने कहा कि गुमनामी बनाए रखने के लिए बिक्री और नकदीकरण के आंकड़ों को अलग कर दिया गया है। इसलिए 2019 के बाद से जारी किए गए कुल 22,217 चुनावी बांड के खरीदारों का लाभार्थी पार्टियों से मिलान करने में कई महीने लगेंगे। यहां पर यह सवाल उठता है कि स्टेट बैंक सहित देश के तमाम बैंक आईटी से लैस हैं। पिछले दस वर्षों में बैंकों का डिजटलीकरण मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है, ऐसे में डेटा अभी भी सीलबंद लिफाफे में भेजा जा रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण है दानदाता की केवाईसी। एक-एक चुनावी बांड को खरीदार की पहचान केवाईसी से करने के बाद ही एसबीआई की शाखाओं से बेचा गया। हर एसबीआई ब्रांच ने बांड बेचते समय केवाईसी के अलावा बांड पर छिपे हुए सीरियल नंबरों की मौजूदगी भी दर्ज की। यानी हर एसबीआई ब्रांच के पास दानदाता की केवाईसी के जरिए पहचान और सीरियल नंबर तो वैसे ही उपलब्ध है। सभी शाखाएं इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए जुड़ी हुई हैं। तभी सारा लेन-देन हो पाता है।