जनगणना के आँकड़े में क्या हेरफेर की जा रही है? देश के कई राज्यों में जनणगना करने वाले एन्यूमेरेटर्स ने आरोप लगाया है कि उनपर आँकड़े बदलने के लिए दबाव डाला जा रहा है। राजस्थान के डायरेक्टर ऑफ सेंसस ऑपरेशंस यानी डीसीए द्वारा सभी जिला अधिकारियों को लिखे गए पत्र से भी इसका राज खुला है! इसमें कहा गया है कि जनगणना के दौरान फील्ड में जुटाए गए डेटा और पहले से मौजूद सरकारी रिकॉर्ड के डेटा के बीच काफी अंतर है। खासकर खुले में शौच, बिजली, रसोई गैस और पीने के पानी जैसी सुविधाओं में अंतर देखा जा रहा है। अब गणना करने वाले एन्यूमेरेटर्स को सीनियर अधिकारियों से डेटा दोबारा जांचने और सुधारने को कहा गया है।

राजस्थान के डीसीओ का पत्र

राजस्थान के डायरेक्टर ऑफ सेंसस ऑपरेशंस यानी डीसीओ ने 2 जून को सभी जिला अधिकारियों को पत्र लिखा। द हिंदू की विजयता सिंह ने इस पर लंबी रिपोर्ट दी है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार पत्र में कहा गया है कि अब तक जुटाए गए फील्ड डेटा में कुछ डिस्क्रिपेंसी यानी गड़बड़ियाँ नज़र आई हैं। ड्यूटी ऑफिसरों को निर्देश दिया गया है कि वे सीएमएमएस पोर्टल पर ब्लॉक स्तर का डेटा चेक करें और असल फील्ड की स्थिति के अनुसार सही करें। रिपोर्ट के अनुसार पत्र में इन बातों पर चिंता जताई गई-
  • कई घरों में खुले में शौच का विकल्प चुना जा रहा है।
  • जिन घरों में LPG कनेक्शन है, वहां भी लकड़ी, गोबर या मिट्टी के तेल जैसा ईंधन दर्ज हो रहा है। खासकर शहरों में।
  • पीने के पानी में 'ट्रीटेड टैप वाटर' का विकल्प कम चुना जा रहा है।
  • नदी, तालाब, कुआं आदि स्रोतों के लिए 'घर के अंदर' विकल्प गलत है।
  • बिजली न होने का विकल्प चुना जा रहा है।
  • इंटरनेट उपलब्ध दिखाया जा रहा है जबकि घर में फोन भी नहीं है।
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एन्यूमेरेटर्स की शिकायतें क्या-क्या

एन्यूमेरेटरों की कई बड़ी शिकायतें हैं। राजस्थान के एक एन्यूमेरेटर- सरकारी स्कूल टीचर ने नाम न छापने की शर्त पर द हिंदू से बताया, 'मोबाइल ऐप में अगर हम घर की छत टिन की बताते हैं तो ऊपर वाले कहते हैं कि इसे कंक्रीट कर दो। क्या हमें झूठ बोलना है? अगर घर में शौचालय नहीं है और लोग खुले में जाते हैं तो हमें पड़ोसी या रिश्तेदार के शौचालय या पब्लिक यूरीनल का हवाला देकर बदलने को कहा जाता है।' बता दें कि सरकार के अनुसार 13 अगस्त 2025 तक देश के 5,86,944 गांवों में से 5,66,068 गांवों को ODF यानी खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा चुका है।

रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के एक अन्य कर्मचारी ने कहा, 'हम सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए हमें ऐसे विकल्प नहीं चुनने को कहा जा रहा है जो सरकार के ख़िलाफ़ हो।' कई कर्मचारी सोशल मीडिया पर भी यह बात बता चुके हैं। उन्होंने गरीबी, असमानता और बुनियादी सुविधाओं की कमी की तस्वीर साझा की। कर्मचारियों का यह भी कहना है कि कुछ इलाकों में लोग जानकारी देने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी सरकारी योजनाएँ कट जाएंगी।

'एलपीजी, पानी, सब्सिडी वाला घर दिलाने की मांग'

रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के एक कर्मचारी ने बताया, 'मेरे इलाके के ज्यादातर घरों में न छत है, न दरवाजा, न दीवारें। वहां जनगणना का घर नंबर कहां लिखें? लोग सोचते हैं कि हम उनकी मदद करके एलपीजी, पानी, सब्सिडी वाला घर, शौचालय या पेंशन दिलवा देंगे।' द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में आंगनवाड़ी वर्कर्स यूनियन की प्रमुख रेखा देवी ने कहा, 'कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क नहीं है। सरकार सिर्फ 66 रुपये का रिचार्ज दे रही है। हम आंगनवाड़ी केंद्र भी बंद नहीं कर सकते। सारी ड्यूटी के साथ घर-घर जाना कैसे संभव है?'
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जनगणना की प्रक्रिया क्या?

यह देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना है। क़रीब 32 लाख कर्मचारी अपने मोबाइल फोन पर ऐप के जरिए डेटा भर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर सरकारी स्कूल टीचर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। जनगणना दो चरणों में हो रही है।

हाउस लिस्टिंग ऑपरेशंस यानी एचएलओ-1 अप्रैल से शुरू हुआ है और यह 30 सितंबर तक चलेगा। इसमें घर की स्थिति, सुविधाएँ, संपत्ति आदि के 33 सवाल पूछे जाते हैं। बाद में पॉपुलेशन जनगणना होगी। हर कर्मचारी को करीब 120-150 घरों की गणना करनी है। सीएमएमएस पोर्टल पर सीनियर अधिकारी रीयल टाइम में निगरानी कर रहे हैं।

राजस्थान सेंसस ऑपरेशन निदेशक के ख़त पर सफाई

रिपोर्ट के अनुसार एक सीनियर सेंसस अधिकारी ने बताया, "पत्र का मक़सद सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि असली स्थिति बिना किसी गलतफहमी के दर्ज हो। चार्ज ऑफिसर, सब-डिविजनल अधिकारी आदि फील्ड वेरिफिकेशन करेंगे। डेटा की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।'

बहरहाल, यह विवाद इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जनगणना का डेटा सरकारी योजनाओं, बजट और नीतियों के लिए आधार बनता है। अगर डेटा में बदलाव हुआ तो असली गरीबी और सुविधाओं की कमी छिप सकती है। अब इस पर नज़र है ति अंतिम डेटा में फील्ड की हकीकत कितनी उभरकर आती है।