दिल्ली का जंतर-मंतर दो दशक से अधिक समय तक राजनीतिक विरोध, जन आंदोलनों और नागरिक प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन दिल्ली पुलिस ने इसे प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल की सूची से बाहर कर दिया है। इसके बाद विपक्षी दलों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सवाल उठाया है कि क्या इस फैसले का मकसद प्रदर्शनकारियों को संसद और सत्ता के प्रमुख केंद्रों से दूर करना है।

सरकार और विपक्ष के तर्क

सरकार ने जंतर-मंतर के विकल्प के तौर पर रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली के शाहदरा में सीबीडी ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी ग्राउंड तय किए हैं। विपक्ष का कहना है कि ये स्थान जंतर-मंतर की तरह संसद के नजदीक नहीं हैं और यहां प्रदर्शन आयोजित करने में खर्च, उपलब्धता, यातायात तथा मीडिया का ध्यान आकर्षित करने जैसी कई व्यावहारिक बाधाएं हैं। हालांकि, दिल्ली पुलिस का तर्क है कि जंतर-मंतर पर बार-बार होने वाले प्रदर्शनों से मध्य दिल्ली में यातायात, कारोबार और सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती हैं।

जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने पर विवाद

दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर 2026 के आदेश के तहत जंतर-मंतर रोड को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है। 10 अक्टूबर को सीजेपी ने 'जंतर-मंतर 2.0' के नाम से प्रदर्शन का आह्वान किया था। इसके बाद दिल्ली में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। इस इसी घटनाक्रम को जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के तत्काल राजनीतिक संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि जंतर-मंतर को हटाने से नागरिकों के लिए सरकार के सामने अपनी मांगें रखने और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का एक महत्वपूर्ण मंच कमजोर होगा। हालांकि, पुलिस के आदेश में इस फैसले को सीधे तौर पर CJP के प्रदर्शन से जोड़ने के बजाय गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों का हवाला दिया गया है।
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अखिलेश यादव से लेकर कांग्रेस तक, विपक्ष ने उठाए सवाल

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने पर भाजपा सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार उन जगहों से लोगों को दूर रखना चाहती है, जहां सत्ता में बैठे लोगों तक जनता के गुस्से की आवाज सीधे पहुंच सकती है।
अखिलेश यादव के मुताबिक, प्रदर्शन के लिए लोक कल्याण मार्ग पर ही कोई स्थान निर्धारित किया जाना चाहिए था। उनका तर्क था कि जब विरोध का संदेश सत्ता के सर्वोच्च केंद्र तक सीधे पहुंचेगा, तभी समाधान की संभावना बढ़ेगी। आम आदमी पार्टी की दिल्ली इकाई के प्रमुख और पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने भी इस फैसले की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह नई पीढ़ी, खासकर Gen Z के विरोध प्रदर्शनों से घबराए हुए हैं।

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने भी तंज कसते हुए इसे मोदी और शाह के लिए 'Demokursi' का मामला बताया।

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने कहा कि प्रदर्शन स्थल बदलने से असहमति की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की कि कल प्रधानमंत्री मोदी लोकतंत्र को ही प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर कर सकते हैं, क्योंकि समस्या प्रदर्शन की जगह नहीं, बल्कि लोगों के विरोध करने के विचार से है।
CJP के सह-संयोजक आशुतोष रंका ने भी व्यंग्य करते हुए सवाल उठाया कि फिर माउंट एवरेस्ट को ही प्रदर्शन का निर्धारित स्थल क्यों नहीं घोषित कर दिया जाता। इन बयानों से स्पष्ट है कि विपक्ष इस फैसले को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध के लिए उपलब्ध स्थान और अवसर से जुड़े सवाल के रूप में उठा रहा है। ये विपक्षी नेताओं के आरोप हैं; सरकार की मंशा के बारे में इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

रामलीला मैदान भी तुरंत उपलब्ध नहीं

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, रामलीला मैदान में प्रदर्शन करने की सबसे बड़ी व्यावहारिक बाधा इसकी उपलब्धता है। अक्टूबर से दिसंबर के त्योहारों के मौसम में यहां सांस्कृतिक और अन्य कार्यक्रमों के कारण बुकिंग की मांग अधिक रहती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय शेष वर्ष के लिए केवल 29, 30 और 31 दिसंबर की तारीखें उपलब्ध थीं। इस हिसाब से यदि विपक्ष या CJP संसद के नजदीक उपलब्ध विकल्प पर प्रदर्शन करना चाहे, तो उसे दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक इंतजार करना पड़ सकता था। यह विवरण 13 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में बताई गई उपलब्धता पर आधारित है; वास्तविक बुकिंग की स्थिति बाद में बदल सकती है। फिर भी, इससे यह सवाल उठता है कि यदि किसी राजनीतिक या जन आंदोलन को तत्काल प्रदर्शन करना हो, तो क्या निर्धारित वैकल्पिक स्थलों पर उसे समय रहते जगह मिल सकेगी?

जंतर-मंतर क्यों था इतना महत्वपूर्ण?

जंतर-मंतर की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं थी कि वहां प्रदर्शन करने के लिए एक सड़क उपलब्ध थी। संसद और केंद्रीय सत्ता के प्रमुख संस्थानों के नजदीक होने के कारण वहां होने वाला छोटा प्रदर्शन भी राजनीतिक और मीडिया का ध्यान खींच सकता था। पिछले दो दशकों से अधिक समय में राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, ट्रेड यूनियनों, किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने यहां अपनी मांगें उठाईं। भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, शिक्षा, चुनाव सुधार और किसानों के मुद्दों पर हुए आंदोलनों ने इसे राष्ट्रीय विरोध के एक परिचित प्रतीक में बदल दिया।
किसी भी प्रदर्शन स्थल की भौगोलिक स्थिति उसके राजनीतिक प्रभाव को भी निर्धारित करती है। संसद के नजदीक होने से विरोध का संदेश सत्ता के केंद्र तक पहुंचता है। इसके उलट, शहर के दूरवर्ती हिस्सों में आयोजित प्रदर्शन को राष्ट्रीय स्तर पर उतना ध्यान मिलना कठिन हो सकता है। इसीलिए विपक्ष की आपत्ति सिर्फ दूरी को लेकर नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान ऐसा होना चाहिए, जहां आम लोग आसानी से पहुंच सकें और उनकी आवाज सत्ता तक प्रभावी ढंग से पहुंचे?

जंतर-मंतर से पहले कहां होते थे प्रदर्शन?

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास जंतर-मंतर से भी पुराना है। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक इंडिया गेट और विजय चौक के निकट बोट क्लब के लॉन बड़े राजनीतिक और जन प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र रहे। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हजारों किसान बोट क्लब पर जुटे थे। किसान अपने मवेशियों के साथ कई दिनों तक वहां डटे रहे और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर अपनी मांगें मानने का दबाव बनाया। इतने बड़े जमावड़े, प्रमुख सरकारी संस्थानों के नजदीक प्रदर्शन और सुरक्षा तथा सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के बाद बोट क्लब में प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाए गए। 1993 तक जंतर-मंतर एक वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल के रूप में उभर चुका था। अब जंतर-मंतर को सूची से हटाए जाने के बाद विरोध प्रदर्शनों के स्थान में एक बार फिर बदलाव हुआ है। यह दिल्ली में सार्वजनिक विरोध के स्थानों को लेकर चल रहे लंबे प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद का नया अध्याय है।

सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका है प्रदर्शन के अधिकार पर फैसला

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को लेकर पहले भी विवाद हो चुका है। स्थानीय निवासियों ने शोर, कचरे, अस्थायी ढांचों और लंबे समय तक प्रदर्शनकारियों के डटे रहने जैसी समस्याओं की शिकायत की थी। 5 अक्टूबर 2017 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाते हुए प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जुलाई 2018 में Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसे दिशानिर्देश तैयार करने पर जोर दिया, जिनसे नागरिकों के विरोध के अधिकार और स्थानीय निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाया जा सके।
अदालत ने प्रदर्शनकारियों की संख्या सीमित करने, निर्धारित क्षेत्रों में प्रदर्शन कराने, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को नियंत्रित करने और लंबे समय तक स्थायी जमावड़े रोकने जैसे उपायों का उल्लेख किया था। इसके बाद जंतर-मंतर पर प्रतिबंधों के साथ प्रदर्शन की अनुमति दी जाती रही। लेकिन दिल्ली पुलिस के ताजा आदेश ने अब इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है और तीन वैकल्पिक स्थानों को नामित किया है।

क्या यह प्रदर्शन नियंत्रित करने की रणनीति हैः दिल्ली पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर पर बार-बार होने वाले प्रदर्शनों से मध्य दिल्ली का यातायात प्रभावित होता है और व्यापारियों तथा कारोबार पर भी असर पड़ता है। प्रशासनिक दृष्टि से प्रदर्शन स्थलों का निर्धारण सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का एक तरीका हो सकता है। लेकिन विपक्ष का सवाल है कि क्या सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर ऐसे विकल्प तय किए जा रहे हैं, जो प्रदर्शन आयोजित करना महंगा, मुश्किल या कम प्रभावी बना दें?

रामलीला मैदान का किराया और सीमित उपलब्धता, सीबीडी ग्राउंड के आसपास यातायात की समस्या और बुराड़ी मैदान की दूरी इस बहस के महत्वपूर्ण पहलू हैं। इन परिस्थितियों में नए स्थल निर्धारित कर देना और लोगों को प्रभावी ढंग से विरोध करने का अवसर उपलब्ध कराना दो अलग-अलग बातें हैं।
जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने का फैसला दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की व्यवस्था को बदलता है। इसके पीछे प्रशासनिक कारण बताए गए हैं, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार तभी प्रभावी होता है, जब लोगों को अपनी बात रखने के लिए ऐसा स्थान उपलब्ध हो जहां वे आसानी से पहुंच सकें, अपनी मांगें सार्वजनिक कर सकें और सत्ता तथा समाज का ध्यान आकर्षित कर सकें। अब बहस इस बात पर है कि क्या रामलीला मैदान, सीबीडी ग्राउंड और बुराड़ी मैदान नागरिकों को ऐसा ही अवसर दे पाएंगे, या जंतर-मंतर को हटाने से दिल्ली में विरोध की आवाज को सत्ता के केंद्र से दूर कर दिया जाएगा।