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सरकार के जाते-जाते अब मोदी जी ला रहे हैं लोकपाल

सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त जस्टिस पी. सी. घोष भारत के पहले लोकपाल हो सकते हैं। यह ख़बर ऐसे समय में आ रही है जब सरकार के पास गिने-चुने दिन बचे हैं और सुप्रीम कोर्ट कई बार इसके लिए सरकार को सख्ती से निर्देश दे चुका है। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि शुक्रवार को लोकपाल चयन समिति ने लोकपाल का नाम तय कर लिया है और इसकी जल्द ही घोषणा की जाएगी। इसक सदस्यों में एक महिला जज सहित चार न्यायिक जजों और चार ग़ैर-न्यायिक अफ़सरों की भी नियुक्ति की गयी है। चयन समिति की बैठक में लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल नहीं हुए। बता दें कि लोकपाल की नियुक्ति के लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में आंदोलन शुरू हुआ था। इस आंदोलन के आगे मनमोहन सरकार को झुकना बड़ा था। इसके बावजूद लोकपाल की नियुक्ति में क़रीब आठ साल लग गये। नियुक्ति की ख़बर भी तब आयी है जब सुप्रीम कोर्ट इसके लिए कई बार सरकार को निर्देश दे चुकी है।

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इसी को लेकर कांग्रेस नेता खड़गे ने कहा था, 'बैठक में विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर मेरे शामिल नहीं होने का बहाना बनाकर सरकार ने पिछले पाँच वर्षों में लोकपाल की नियुक्ति नहीं की। इस संदर्भ में थोड़ी-बहुत जो भी प्रगति हुई वह उच्चतम न्यायालय के दबाव के कारण हुई।' 
हालाँकि लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट को 2014 की शुरुआत में ही अधिसूचित कर दिया गया था, लेकिन अब तक इसकी नियुक्ति नहीं हो पायी थी। लेकिन अब यह नियुक्ति की ख़बर ऐसे समय में आयी है जब इस सरकार का कार्यकाल क़रीब दो महीने में ख़त्म हो जाएगा।
सूत्रों के हवाले से न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस ने ख़बर दी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की चयन समिति की बैठक शुक्रवार को हुई थी। हालाँकि बैठक में प्रधानमंत्री के अलावा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी शामिल हुए। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इसमें शामिल नहीं हुए।

बैठक में क्यों नहीं शामिल हुये खड़गे?

मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकपाल चयन समिति की बैठक में शामिल होने की सरकार की पेशकश लगातार सात बार ख़ारिज़ कर चुके हैं। खड़गे का तर्क है कि 'विशेष आमंत्रित सदस्य' के लोकपाल चयन समिति की हिस्सा होने या इसकी बैठक में शामिल होने का कोई प्रावधान नहीं है। फ़रवरी, 2018 के बाद से यह लगातार सातवीं बार है जब खड़गे ने बैठक का बहिष्कार किया। 

मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में आरोप लगाया था कि 2014 में सत्तासीन होने के बाद से इस सरकार ने लोकपाल क़ानून में ऐसा संशोधन करने का कोई प्रयास नहीं किया जिससे विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का नेता चयन समिति के सदस्य के तौर पर बैठक में शामिल हो सके।
खड़गे ने पत्र में आरोप लगाया कि सरकार इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया से विपक्ष को अलग रखना चाहती थी। पिछली कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में लोकपाल की नियुक्ति के गठन पर सहमति बनी थी। लोकपाल के लिए नागरिक संगठनों ने 2011 में लंबा आंदोलन किया था।

अन्ना ने तैयार की थी ज़मीन

लोकपाल के लिए यह आंदोलन इंडिया अगेंस्ट करप्शन नामक ग़ैर-सरकारी सामाजिक संगठन के मसौदा तैयार करने के बाद शुरू हुआ था। भारत के विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनता के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद लोकपाल विधेयक तैयार किया गया था। इसे लागू कराने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में अनशन शुरू किया गया। बाद में इस अनशन ने आंदोलन का रूप ले लिया। इस आंदोलन को मिले व्यापक जन समर्थन के बाद मनमोहन सरकार को संसद में पेश सरकारी लोकपाल बिल के बदले एक सशक्त लोकपाल के गठन के लिए सहमत होना पड़ा था। 
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क्या है लोकपाल?

लोकपाल भारत में नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने का एक औजार है। लोकपाल चुनाव आयुक्त की तरह एक स्वतंत्र संस्था है। जन लोकपाल के पास भ्रष्ट राजनेताओं एवं नौकरशाहों पर बिना किसी से अनुमति लिये ही अभियोग चलाने की ताक़त है। 

कौन हैं जस्टिस पी. सी. घोष?

जस्टिस घोष ने अपने सुप्रीम कोर्ट कार्यकाल के दौरान कई अहम फ़ैसले दिये। उन्होंने ही भ्रष्टाचार के मामले में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की साथी शशिकला को सजा सुनायी थी। 1952 में जन्मे जस्टिस पी.सी. घोष, जस्टिस शंभू चंद्र घोष के बेटे हैैं। 1997 में वह कलकत्ता हाईकोर्ट में जज बने। दिसंबर 2012 में वह आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 8 मार्च, 2013 में वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। 27 मई, 2017 को वह सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हो गये।

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