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'लिन्चिंग' विदेशी शब्द, भारत को बदनाम करने की कोशिश, संघ प्रमुख ने कहा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा है कि लिन्चिंग विदेशी शब्द है जो भारत को बदनाम करने के लिए है। उन्होंने इसके साथ यह भी कहा कि 'क़ानून का पालन कड़ाई से करना चाहिए' और 'कोई सीमा न लाँघे।' 
आरएसएस प्रमुख ने संघ के स्थापना दिवस पर नागपुर स्थित मुख्यालय में अस्त्र पूजा के बाद सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा :  

कुछ लोग 'लिन्चिंग' शब्द का इस्तेमाल कर देश को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, इस शब्द की उत्पत्ति भारत के बाहर हुई है। भारत में 'लिन्चिंग' कभी नहीं हुई है।


मोहन भागवत, सरसंघचालक, आरएसएस

ईसा मसीह का उदाहरण

संघ प्रमुख ने ईसाइयों के धर्म ग्रंथ 'बाइबल' का उदाहरण देते हुए कहा कि जब भीड़ एक महिला को मारने के लिए जमा हो गई, ईसा मसीह ने उन लोगों से पूछा कि क्या उन्होंने कभी कोई पाप नहीं किया? भागवत ने इसके आगे कहा, 'हर आदमी को यह अवश्य पता होना चाहिए कि क़ानून और संविधान का पालन सख़्ती से होगा। सीमा का उल्लंघन कोई न करे। किसी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए। यदि मौजूदा क़ाूनन पर्याप्त न हो, इसके लिए अलग से क़ानून बने।' 
बुद्धिजीवियों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखे जाने की सीधे चर्चा किए बग़ैर भागवत ने इस ओर संकेत किया। उन्होंने कहा, 'कुछ लोग देश को बदनाम करने के लिए लिन्चिंग शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। वे कहते हैं कि एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों को मार डाला है, जबकि ऐसा दोनों ओर हो रहा है। वे इस तरह की बातें तब भी करते हैं जब ऐसा कुछ होता ही नहीं है। सौ में ऐसी सिर्फ़ 2-3 वारदात होती है। वह भी नहीं होनी चाहिए।' 

ऐसी ताक़तें हैं, जो लिन्चिंग के मामलों को दूसरे तरीके से पेश करती हैं। वे आरएसएस का नाम लेती हैं जबकि सबको पता है कि आरएसएस ऐसा नहीं करता है। यह साजिश है।


मोहन भागवत, सरसंघचालक, आरएसएस

समाज को बाँटने की कोशिश

संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि जो लोग समाज को बाँटने की कोशिश करते हैं और लोगों को हिंसा के लिए उकसाते हैं, उन्हें बिल्कुल ही नहीं बचाया जाना चाहिए। उन्होंने इसके आगे जोड़ा कि यदि कोई मतभेद है तो बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए, यदि उसके बाद भी मतभेद ख़त्म नहीं होते हैं तो अदालत हैं, जिनका फ़ैसला सबको मान लेना चाहिए। 

'देश में लिन्चिंग कभी हुई ही नहीं'

 दिलचस्प बात यह है कि पहले आरएसएस सरसंघचालक पीट-पीट कर मार डालने यानी मॉब लिन्चिंग की बात से साफ़ इनकार करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं है, पर अगले ही क्षण कहते हैं कि ऐसा दोनों तरफ से हो रहा है, इसके तुरन्त बाद वे कहते हैं कि 100 में से 2-3 वारदात हो जाती हैं। इसी तरह वह 'लिन्चिंग' शब्द को विदेशी बताते हुए इसे भारत को बदनाम करने की कोशिश कहते हैं, यह सच है कि यह शब्द अंग्रेज़ी भाषा का है। लेकिन पीट पीट कर मार डालने की मौजूदा घटनाओं से पहले का है। 
इसी तरह भागवत यह तो कहते हैं कि अदालत का फ़ैसला सबको मान लेना चाहिए, पर यही भागवत अयोध्या विवाद पर कह चुके हैं कि लोगों की भावनाएँ दुनिया की किसी भी अदालत से ऊपर हैं और अदालत को ऐसे फ़ैसले देने ही नहीं चाहिए, जिन्हें लागू करना मुमकिन न हो। आरआसएस ने कई बार कहा है कि वह अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को तभी मानेगा जब वह उसके पक्ष में होगा। 

मंदी से इनकार

मोहन भागवत ने अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर भी सरकार का जम कर बचाव किया। उन्होंने कहा कि 'किसी भी अर्थव्यवस्था में मंदी बीच-बीच में आती रहती है। मंदी तब होती है, जब अर्थव्यवस्था वृद्धि की दर शून्य से कम हो। लेकिन अभी तो वृद्धि दर 5 प्रतिशत है। यदि हम ज़्यादा बोलेंगे तो यह और नीचे चली जाएगी।' संघ प्रमुख ने एक तरह से मंदी से इनकार कर दिया। लेकिन वह यह भूल गए कि सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, देश के 8 कोर सेक्टरों में से 5 की वृद्धि दर शून्य से नीचे है। 
उन्होंने अनुच्छेद 370 में बदलाव कर कश्मीर के विशेष दर्जा को ख़त्म करने के सरकार के फ़ैसले को भी उचित ठहराया। उन्होंने इसके लिए मोदी सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि बहुत ही सूझबूझ के साथ लोकसभा के अलावा राज्यसभा से भी इससे जुड़े प्रस्ताव को पारित करवा लिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि जनसंघ ने स्थापना के बाद पहला बड़ा आंदोलन इस मुद्दे पर ही किया था। 
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अनुच्छेद 370 और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर भागवत का बयान बिल्कुल संघ की पहले की लाइन के ही अनरूप है, इस पर किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए। मॉब लिन्चिंग के मुद्दे पर भी उन्होंने जो कुछ कहा, वह संघ और बीजेपी के नेता कई बार कह चुके हैं। संघ प्रमुख ने इस पर अलग से क़ानून बनाने की बात भी कह ही दी। भागवत ने पिछले विजयदशमी के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की काफी आलोचना की थी। इस बार वह खुल कर उनके साथ थे और सरकार की पीठ थपथपाई। 
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