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अयोध्या पर कोई फ़ार्मूला मंज़ूर नहीं, सुन्नी बोर्ड का प्रस्ताव मुसलिमों ने किया ख़ारिज 

पिछले कुछ दिनों से यह ख़बर हवा में तैर रही थी कि अयोध्या मामले में मुसलिम पक्ष अपना दावा छोड़ने को तैयार है। यह दावा किया गया कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कुछ शर्तों के साथ मध्यस्थता पैनल के साथ एक प्रस्ताव पर सहमति दे दी है। शुक्रवार को इस विवाद पर पर्दा डालने का काम मुसलिम दावेदारों की तरफ़ से किया गया। 
सत्य हिंदी से बातचीत में वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि अब किसी प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवायी पूरी हो गयी है और अब फ़ैसले का इंतज़ार है। जिलानी 1986 से मुसलिम पक्षकारों के वकील हैं और इस मामले में कई उतार-चढ़ाव देख चुके हैं।
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उन्ही की तरह दूसरे मुसलिम पक्षकार एम सिद्दिक़ी के वकील एजाज़ मक़बूल ने भी सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने एनडीटीवी से कहा है कि सुप्रीम कोर्ट गठित मध्यस्थता समिति को दिए गए वक़्फ़ बोर्ड के प्रस्ताव को बोर्ड के अलावा सभी मुसलिम दावेदार खारिज करते हैं। जमिअत-ए-उलेमा-ए-हिंद के मदनी घटक ने भी बोर्ड के दावे पर नाराज़गी जताई है। 
दरअसल, खबर यह आयी थी यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ज़ुफ़र अहमद फ़ारुक़ी ने सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पैनल को अयोध्या मामले पर बने एक फ़ार्मूले को स्वीकार कर लिया है। इस फ़ार्मूले के हिसाब से मुसलिम पक्ष बाबरी मसजिद से जुड़ी विवादास्पद ज़मीन पर अपना दावा छोड देंगे। इसके बदले में कही और मसजिद बनाने के लिये ज़मीन दी जायेगी। इसके साथ ही अयोध्या  स्थित 22 दूसरी मसजिदों को सुरक्षा दी जायेगी। और 1991 के अधिग्रहण कानून के हिसाब से राम मंदिर के लिये ज़मीन का अधिग्रहण किया जायेगा। फ़ारुक़ी ने माना है कि ऐसा एक प्रस्ताव पैनल के पास है। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील शाहिद रिज़वी ने एनडीटीवी से कहा था : 

हमने मध्यस्थता पैनल के सामने अपनी बातें रखी हैं। पर हम उस समझौता योजना का खुलासा नहीं कर सकते, जो हमने कोर्ट के सामने रखा है। यह सकारात्मक है और इससे हिन्दू और मुसलमान दोनों ही खुश होंगे।


शाहिद रिज़वी, वकील, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड

एजाज़ मक़बूल ने कहा कि शाहिद रिज़वी के हवाले से आई मीडिया रिपोर्ट से मुसलिम पक्षकार चौंक गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मध्यस्थता समिति या निर्वाणी अखाड़ा या किसी और ने यह रिपोर्ट जानबूझ कर लीक की है। मक़बूल ने कहा, 'इस पर  विश्वास करना मुश्किल है कि किसी तरह की मध्यस्थता हुई होगी। यह बात ऐसे समय कही जा रही है जब हिन्दू पक्षों ने कहा है कि वे किसी भी तरह के समझौते के हक़ में नहीं हैं और मुसलमानों ने भी कहा है कि वे कोई समझौता नहीं करेंगे।'
अब मुसलिम पक्षों की तरफ़ से सफ़ाई आने के बाद साफ़ है कि मध्यस्थता के फ़ार्मूले की बात या तो कोरी गप्प थी या फिर इसके पीछे कोई सोची समझी रणनीति। सूत्रों के मुताबिक़, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन पर काफी दिनों से दबाव डाला जा रहा था कि वह अदालत के फ़ैसले के पहले ही किसी फ़ार्मूले पर हामी भर दें।
सूत्रों ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि दबाव कहाँ से आया था। यूपी सरकार ने हाल ही में फ़ारुक़ी के ख़िलाफ़ बोर्ड की ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त को लेकर एफ़आईआर दर्ज की है और सीबीआई जाँच से भी इनकार नहीं किया गया है। सूत्र दोनों घटनाक्रमों को जोड़ कर देखते हैं। सत्य हिंदी को यह भी बताया गया कि मुसलिम पक्ष पर दबाव की राजनीति किसी काम नही आयेगी, क्योंकि इसे पूरे समाज की कमज़ोरी माना जायेगा। अब उसे अदालत के फ़ैसले का इंतज़ार है। नतीजा चाहे जो हो, उसे मंज़ूर होगा।

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