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चुनाव आयोग पर क्यों हमला बोल रहे हैं मोदी? 

चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों का उल्लंघन करने वाले नरेंद्र मोदी ने अब आयोग पर खुल कर हमला बोल दिया है। उन्होंने ऐसी बात तो कही ही है जो चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा के ख़िलाफ है, उन्होंने इस स्वतंत्र निकाय को एक तरह से चुनौती दे डाली है। इसके साथ ही उसका मज़ाक भी उड़ाया है।

मोदी ने चुनाव रैली में भाषण करते हुए कहा, ‘कश्मीर में हमारी सेना ने आतंकवादियों को मार गिराया, विपक्षी दल पूछ रहे हैं कि जब चुनाव चल रहा है, मोदी ने आतंकवादियों को क्यों मारा? आतंकवादी जब बम-बंदूक लेकर खड़ा हो, क्या हमारा जवान चुनाव आयोग से जा कर पूछेगा कि वह गोली चलाए या नहीं?’

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इस एक बात में चुनाव आयोग से जुड़ी दो बातें हैं और प्रधानमंत्री की मानसिकता को दिखाती हैं। एक तो उन्होंने चुनाव आयोग की दिशा निर्देशों का उल्लंघन किया, दूसरे उस पर सवाल खड़ा कर दिया।

आयोग का दिशा निर्देश

चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि वे चुनाव प्रचार में सेना का प्रयोग किसी रूप में न करे। इसने 8 मार्च को जारी एक अधिसूचना में दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा,

सेना प्रमुख या किसी दूसरे सैनिक के फोटोग्राफ़, सेना की किसी कार्रवाई या कार्यक्रम का किसी भी तरह राजनीतिक या चुनावी प्रयोग न करें, प्रचार या प्रचार सामग्री में उनका किसी भी तरह इस्तेमाल न करें।


चुनाव आयोग, 8 मार्च की अधिसूचना

इसके पहले पूर्व नौसेना प्रमुख रिटायर्ड एडमिरल एल. रामदास ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर इस पर अफ़सोस जताया था कि ‘कुछ राजनीतिक दल सेना, सैनिक, सैनिकों की वर्दी, सेना की कार्रवाइयों का प्रयोग अपने प्रचार में करते हैं।’ उन्होंने यह भी कहा था कि सेना के प्रतीकों और इन चीजों के राजनीतिक इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए। इसके बाद ही आयोग ने दिशा निर्देश जारी कर दिए थे। 
मोदी ने रविवार को कुशीनगर की रैली में जो कुछ कहा, वह इस दिशा निर्देश का पूरी तरह उल्लंघन है, क्योंकि उन्होंने इसमें सेना के द्वारा आंतकवादियों को मारे जाने की बात की।

चुनाव आयोग का मज़ाक उड़ाया

लेकिन प्रधानमंत्री यहीं नही रुके। उन्होंने इसके बाद चुनाव आयोग का मज़ाक उड़ाया और उसके दिशा निर्देशों का भी उपहास किया। उन्होंने  सवाल किया कि जब आतंकवादी बम-बंदूक लेकर सामने खड़ा हो तो क्या सैनिक जाकर चुनाव आयोग से पूछेंगे कि वे हमला करें या नहीं?

यह चुनाव आयोग और उसके दिशा निर्देशों का मज़ाक उड़ाना है। चुनाव आयोग ने कभी सेना को कुछ करने से नहीं रोका। सेना की कार्रवाई पर रोक लगाने की बात कभी आयोग ने नहीं कही। आयोग ने यह कहा है कि सेना की कार्रवाइयों का राजनीतिक इस्तेमाल न हो। पर मोदी ने चुनाव आयोग पर तंज करते हुए सवाल किया कि सेना कार्रवाई करने के पहले क्या आयोग से अनुमति लेने जाएगा।

सवाल यह है कि आख़िर मोदी ने आयोग के बारे में इस तरह की बातें क्यों की? इसका मुख्य कारण यह है कि चुनाव आयोग ने जानबूझ कर अपने दिशा निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाने दी और कभी मोदी के ख़िलाफ़ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

चुनाव आयोग ने पुलवामा आतंकवादी हमले और बालाकोट हवाई हमले का उल्लेख करते हुए पहली बार वोट डालने वालों से इस मुद्दे पर मतदान करने की अपील करने के मामले में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी।

बालाकोट के इस्तेमाल पर क्लीन चिट

महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी और उस्मानाबाद के ज़िला निर्वाचन अधिकारी ने प्रधानमंत्री के भाषण को आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुकूल नहीं माना था। पर, चुनाव आयोग ने इन दोनों अफ़सरों की रिपोर्टों को दरकिनार करते हुए मोदी को दोषमुक्त क़रार दिया।

पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट

प्रधानमंत्री मोदी ने महाराष्ट्र के लातूर में शहीदों के नाम पर लोगों से सीधे वोट नहीं माँगा था। मोदी ने अपने भाषण में कहा था, 'मैं फ़र्स्ट टाइम वोटर्स से कहना चाहता हूँ, क्या आपका पहला वोट पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने वाले वीर जवानों के नाम समर्पित हो सकता है क्या? आपका पहला वोट पुलवामा में जो वीर शहीद हुए उन वीर शहीदों के नाम आपका वोट समर्पित हो सकता है क्या? ग़रीब को पक्का घर मिले उसके लिए आपका वोट समर्पित हो सकता है क्या?'पुलवामा के शहीदों के परिवार तो चुनाव लड़ नहीं रहे हैं लेकिन यह आसानी से समझा जा सकता है कि शहीदों के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसके लिए वोट माँग रहे हैं।

मोदी निर्दोष क़रार

अंग्रेज़ी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी ख़बर में कहा है कि इस शिकायत पर चुनाव आयोग में चर्चा तो हुई, पर तकनीकी आधार पर मोदी को निर्दोष क़रार दिया गया। यह कहा गया कि मोदी ने अपने लिए या अपनी पार्टी के लिए सीधे वोट नहीं माँगे थे। यह भी कहा गया कि महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी और उस्मानाबाद के ज़िला चुनाव अधिकारी की रपटें मोदी के भाषण की कुछ पंक्तियों के आधार पर ही तैयार की गई थीं, पूरे भाषण पर विचार नहीं किया गया था।

भ्रष्टाचारी नंबर वन पर क्लीन चिट

इसी तरह चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन और मामलों में क्लीन चिट दे दी थी। मामला मोदी की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को 'भ्रष्टाचारी नंबर 1' कहने का था। राजीव को 'भ्रष्टाचारी नंबर 1' कहने पर कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया। लेकिन चुनाव आयोग ने मोदी को इस मामले में क्लीन चिट दे दी। कांग्रेस सांसद सुष्‍मिता देव ने सुप्रीम कोर्ट में मोदी की इस टिप्पणी के ख़िलाफ़ अपील दायर की थी। 
इससे पहले 'मिशन शक्ति’ पर प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन को लेकर भी कई विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे लेकिन तब भी चुनाव आयोग को इसमें कुछ ‘ग़लत’ नहीं लगा था और आयोग ने प्रधानमंत्री को क्लीन चिट दे दी थी।

किताब पर क्यों लगाई रोक?

इसी तरह एक अन्य मामले में चुनाव आयोग ने रफ़ाल डील से जुड़ी एक किताब को रिलीज़ किये जाने पर रोक लगा दी थी। किताब को प्रकाशित करने वाले भारती प्रकाशन के संपादक पीके राजन ने इस पर ख़ासी नाराज़गी जताते हुए चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाया था। इस किताब का विमोचन वरिष्ठ पत्रकार और ‘द हिंदू’ अख़बार समूह के प्रमुख एन. राम के द्वारा किया जाना था लेकिन उससे पहले ही चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगा दी थी। बता दें कि एन. राम ख़ुद इस सौदे पर कई रिपोर्ट लिख चुके हैं। मंगलवार 2 अप्रैल को जब किताब रिलीज़ होने वाली थी तो चुनाव आयोग ने पुलिस बल के साथ जाकर किताब की प्रतियों को जब्त कर लिया था। क्या आयोग की इस कार्रवाई से उसके निष्पक्ष होने के दावे पर सवाल नहीं खड़े होते हैं?

मोदी की सुविधा से समय बदला

लेकिन चुनाव आयोग ने नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुकाव लोकसभा के पहले ही दिखाना शुरू कर दिया था। इसके पहले पाँच विधानसभा चुनावों के लिए जब तारीखों की घोषणा की गई, तो मोदी की सुविधा के हिसाब से उसका समय बदला गया, हाँलाकि चुनाव आयोग ने इससे इनकार किया था। कांग्रेस का आरोप है कि ऐसा नरेन्द्र मोदी की अजमेर रैली के कारण किया गया। 

चुनाव आयोग ने 6 अक्तूबर की सुबह पहले यह घोषणा की थी कि चुनाव कार्यक्रम घोषित करने के लिए आयोग दिन में साढ़े बारह बजे संवाददाता सम्मेलन करेगा। लेकिन घंटे भर बाद ही आयोग ने संवाददाता सम्मेलन का समय तीन बजे कर दिया।
आयोग का कहना है कि यह परिवर्तन मीडियाकर्मियों की सुविधा को देखते हुए किया गया, ताकि उन्हें अपनी कवरेज के इन्तज़ाम करने और ज़रूरी साधन जुटाने के लिए समय मिल सके।

अब सवाल यह उठता है कि जब चुनाव आयोग ख़ुद शुरू से ही नरेंद्र मोदी की इच्छा के अनुरूप काम करता आया है और उनके हिसाब से चीजें बदलता आया है, उसके पक्ष में फ़ैसले देता आया है तो ऐसे मे मोदी आयोग की परवाह क्यों करे। मोदी का आयोग पर तंज इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
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