लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उन्हें जेल भेजे जाने के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है। राहुल गांधी ने बुधवार को कहा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है। इसके लिए युवाओं को जेल भेजना कायरता है। उन्होंने ऐलान किया कि जंतर-मंतर भारत की जनता का है और इसे वापस लिया जाएगा। लेकिन इस बयान से भी बड़ी राजनीतिक खबर यह है कि कांग्रेस और CJP के रिश्तों में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। 
राहुल गांधी का CJP के समर्थन में सामने आना कांग्रेस के अब तक के रुख में एक बड़ा बदलाव है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पहले इस संगठन से दूरी बनाए हुए थे। यहां तक कि 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP के प्रदर्शन में कांग्रेस शामिल नहीं हुई थी। अब राहुल गांधी ने न केवल CJP के कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की निंदा की है, बल्कि छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन के आंदोलनों को एक साझा संवैधानिक संघर्ष का हिस्सा बताया है।

राहुल गांधी का बयान: अलग-अलग झंडे, लेकिन लड़ाई एक

राहुल गांधी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तिरंगा लहराना अपराध नहीं है। ऐसा करने वाले युवाओं को जेल भेजना कायरतापूर्ण कार्रवाई है। उन्होंने छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन का उल्लेख करते हुए कहा कि भले ही इन आंदोलनों के बैनर अलग-अलग हों, लेकिन इनका उद्देश्य एक है। सभी आंदोलन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की मांग से जुड़े हुए हैं। राहुल गांधी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार वापस हासिल किया जाएगा। उनके इस बयान का राजनीतिक महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
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कांग्रेस ने CJP को लेकर क्यों बदला अपना रुख?

राहुल गांधी का ताजा बयान कांग्रेस की CJP के प्रति रणनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। CJP मई में सोशल मीडिया पर शुरू हुए एक ट्रेंड के बाद चर्चा में आई थी। शुरुआत में कांग्रेस के भीतर इस नए संगठन को लेकर संदेह था। पार्टी के नेता CJP की गतिविधियों और उसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर सतर्क थे। जुलाई में जब CJP ने पेपर लीक के मुद्दे पर जंतर-मंतर पर 17 दिनों तक प्रदर्शन किया, तब भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस संगठन से सार्वजनिक रूप से दूरी बनाए रखी।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कांग्रेस नेताओं का मानना था कि पार्टी पहले से ही पेपर लीक और मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आंदोलन चला रही है। कांग्रेस की ओर से यह भी रेखांकित किया जा रहा था कि उसके 'छात्रों की गूंज' और 'वोट चोरी' अभियानों ने CJP से पहले इन मुद्दों को उठाया था। यही वजह थी कि CJP के चर्चा में आने के बावजूद कांग्रेस के बड़े नेताओं ने उसके बारे में रणनीतिक चुप्पी बनाए रखी।

10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन से दूर रही थी कांग्रेस

10 अक्टूबर को CJP ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े विवादों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस उस प्रदर्शन में शामिल नहीं हुई। यह दूरी इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि उस समय कांग्रेस और उसके सहयोगी दल लगातार सड़क पर उतरकर चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इसके बावजूद CJP के आयोजन में कांग्रेस की अनुपस्थिति राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी। लेकिन चार दिन बाद राहुल गांधी ने CJP कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए उनके आंदोलन को संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई से जोड़ दिया।हालांकि राहुल गांधी के समर्थन को अभी कांग्रेस और CJP के बीच किसी औपचारिक राजनीतिक गठबंधन की घोषणा नहीं माना जा सकता।

कांग्रेस के रुख में बदलाव के कम से कम तीन राजनीतिक मायने

  • पहला, कांग्रेस अब CJP जैसे नए नागरिक और युवा आंदोलनों के प्रति पहले की तुलना में अधिक खुला रुख अपना सकती है।
  • दूसरा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों में विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों के बीच मुद्दा-आधारित एकजुटता की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
  • तीसरा, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में फिर से बहाल करने की मांग आने वाले दिनों में एक बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप ले सकती है।
फिलहाल ये संभावित राजनीतिक परिणाम हैं। दोनों रिपोर्टों में कांग्रेस और CJP के बीच किसी औपचारिक संयुक्त आंदोलन, साझा मंच या संगठनात्मक समझौते की पुष्टि नहीं की गई है।

क्या जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन की लड़ाई नया विपक्षी मुद्दा बनेगी?

राहुल गांधी के बयान के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या जंतर-मंतर को फिर से प्रदर्शन स्थल बनाने की मांग विपक्षी राजनीति का नया केंद्र बन सकती है। अब तक चुनाव आयोग, SIR और मतदाता सूची की कथित गड़बड़ियों को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। लेकिन CJP कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन संबंधी पाबंदियों के बाद बहस का दायरा बढ़कर नागरिक स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार तक पहुंच गया है।
राहुल गांधी ने छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन का एक साथ उल्लेख करके इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ को सामने रखा है। यह भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने केवल CJP कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का विरोध नहीं किया, बल्कि जंतर-मंतर को जनता के लिए वापस हासिल करने की बात कही। उनका यह बयान आने वाले दिनों में विपक्ष की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी का यह बयान CJP को लेकर कांग्रेस की पुरानी दूरी समाप्त होने की शुरुआत है, या यह केवल प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों के समर्थन तक सीमित रहेगा?

CJP के नेता तिहाड़ जेल भेजे गये

इस बीच CJP के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को बुधवार को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। दोनों को तिहाड़ जेल में रखा गया है। तीसरे कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे को जमानत पर छोड़ दिया गया। तीनों नेताओं को बुधवार सुबह कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था। मंगलवार, 13 अक्टूबर को तीनों CJP नेताओं को जंतर-मंतर पर बैरिकेड पार करके प्रवेश करने के बाद हिरासत में लिया गया था। वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर नारे लगा रहे थे। पुलिस सूत्रों के अनुसार, उनके खिलाफ अनधिकृत प्रवेश, निषेधाज्ञा के उल्लंघन, शांति बनाए रखने के लिए भरे गए बॉन्ड की शर्तें तोड़ने और सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए।
पुलिस का कहना है कि सौरव दास और आशुतोष रांका ने शनिवार को एक प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद एक साल तक शांति बनाए रखने के बॉन्ड पर हस्ताक्षर किए थे। पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर पर दोबारा प्रवेश करके उन्होंने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया। इस तरह पुलिस कार्रवाई का आधार केवल तिरंगा लहराना नहीं, बल्कि कथित रूप से प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करना और पहले से लागू शर्तों का उल्लंघन करना भी बताया गया है। दूसरी ओर, CJP और विपक्षी नेता इस कार्रवाई को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर हमला बता रहे हैं।

अरविंद केजरीवाल भी CJP के समर्थन में आए

CJP नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की आलोचना आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी की है। केजरीवाल ने एक्स पर सवाल उठाया कि क्या अपने ही देश में अपना राष्ट्रीय ध्वज लहराना अपराध है? उन्होंने इस कार्रवाई को बेतुका बताया। राहुल गांधी और केजरीवाल के बयानों से संकेत मिलता है कि CJP के खिलाफ पुलिस कार्रवाई अब केवल एक संगठन और दिल्ली पुलिस के बीच का विवाद नहीं रह गई है। इस मामले में विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराया है।

अभिजीत दिपके का प्रधानमंत्री मोदी पर हमला

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अपने दो सहयोगियों को जेल भेजे जाने पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना की।
दिपके ने आरोप लगाया कि सरकार असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है, जबकि उन्होंने जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराया था। दिपके ने प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि सरकार विरोध की आवाज को कुचलने के लिए इतनी प्रतिबद्ध है तो उसे छिपकर कार्रवाई करने के बजाय औपचारिक रूप से आपातकाल घोषित करने का साहस दिखाना चाहिए। उनका यह बयान CJP की ओर से पुलिस कार्रवाई के विरोध में अपनाए गए आक्रामक रुख को दर्शाता है। हालांकि आपातकाल जैसी स्थिति होने का दावा दीपके का राजनीतिक आरोप है, कोई स्थापित कानूनी निष्कर्ष नहीं।