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भारत को मिला पहला रफ़ाल, कहाँ गुम हो गए विवादित सौदे से जुड़े सवाल?

फ्रांस ने पहला रफ़ाल लड़ाकू विमान भारत को सौंप दिया। फ्रांस के दौरे पर गए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह विमान ग्रहण कर लिया, इसे भारतीय वायु सेना को सौंप दिया जाएगा। 
राजनाथ सिंह ने इसे भारत-फ्रांस रक्षा सौदे में मील का पत्थर क़रार देते हुए कहा कि इससे दोनों के बीच रक्षा सहयोग नई ऊँचाइयों को छुएगा। उन्होंने कहा, 'मुझे खुशी है कि विमान तय समय पर दे दिया गया। मुझे पूरा भरोसा है कि इससे भारत की वायु सेना और सशक्त होगी। मैं कामना करता हूँ कि दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच सहयोग हर क्षेत्र में हो।' 
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रफ़ाल सौदा इसलिए सुर्खियों में रहा कि इसमें कई स्तरों पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा और फ़ैसला अभी नहीं आया है। सरकार की ओर से लगातार यह तर्क दिया जाता रहा है कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं हुई है।

विवाद अपनी जगह है लेकिन रफ़ाल की कुछ ऐसी ख़ासियतें हैं जिससे वायु सेना में इसके शामिल होने पर इसकी ताक़त काफ़ी बढ़ जाएगी। वायु सेना ने भी इस विमान की जमकर तारीफ़ की है।

पाकिस्तान और चीन के साथ अक्सर तनाव की स्थिति बनने के मद्देनज़र रफ़ाल विमान भारत के लिए काफ़ी अहम है। रफ़ाल लड़ाकू विमान आधुनिक मिसाइल और हथियारों से लैस है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह दो इंजन वाला लड़ाकू विमान है, जो भारतीय वायुसेना की पहली पसंद है। इसे हर तरह के मिशन के लिए भेजा जा सकता है। 

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2,130 किमी प्रति घंटा की स्पीड

रफ़ाल की अधिकतम स्पीड 2,130 किलोमीटर प्रति घंटा है। 3700 किलोमीटर तक इसकी मारक क्षमता है। यह विमान 1 मिनट में 60,000 फ़ुट की ऊँचाई तक पहुँच सकता है। यह 24,500 किलोग्राम के हथियार उठाकर ले जाने में सक्षम है। इसमें मेटेअर मिसाइल, 150 किलोमीटर की बियोंड विज़ुअल रेंज मिसाइल, हवा से ज़मीन पर मार करने वाली स्कैल्प मिसाइलें भी शामिल होंगी। यह परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। 

रफ़ाल की ज़रूरत क्यों?

रफ़ाल में भारतीय वायुसेना के हिसाब से फेरबदल किए गए हैं। इस विमान की ज़रूरत इसलिए भी है कि वायु सेना के बेड़े में लड़ाकू विमानों की माँग लंबे समय से होती रही है। पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन के साथ अक्सर तनाव की स्थिति बन जाती है। ऐसे दो पड़ोसी देशों के सामने देश की अपनी सीमा को सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती है। इस लिहाज़ से ऐसे उन्नत तकनीक वाले विमान की सख़्त ज़रूरत थी।

रफ़ाल सौदे से लेकर इसको भारत को सौंपे जाने तक का सफ़र सामान्य नहीं रहा है और इस पर काफ़ी विवाद हुआ है। हाल के दिनों में यह मामला ठंडा ज़रूर पड़ा है, लेकिन इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान इस सौदे पर विवाद अपने चरम पर था। यह विवाद इसलिए है कि इसमें कई चीज़ें स्पष्ट नहीं हैं।

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रफ़ाल सौदे पर विवाद

रफ़ाल सौदे पर यह साफ़ है कि एनडीए सरकार ने 36 रफ़ाल लड़ाकू विमान का सौदा किया, लेकिन इसके बाद की तसवीर धुँधली है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का आरोप है कि इस सौदे में गड़बड़ी हुई है। मीडिया में भी कई ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि सौदे में नियमों का पालन नहीं किया गया। मशहूर वकील प्रशांत भूषण, बीजेपी के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा व अरुण शौरी और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भी ऐसे आरोप लगाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर की हैं। लेकिन सरकार कहती रही है कि इस सौदे में सबकुछ पारदर्शी तरीक़े से हुआ है।

रफ़ाल विमान सौदों की लीक हुई फ़ाइलों के आधार पर अंग्रेज़ी के दो बड़े अख़बारों 'द हिंदू' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं। इनमें कई गंभीर आरोप लगाये गये। इन रिपोर्टों में सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय पर सबसे गंभीर आरोप यह लगा कि रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञों की कमेटी को नज़रअंदाज़ करके सीधे रफ़ाल विमानों का सौदा किया गया। आरोप यह भी लगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के कारण रफ़ाल विमानों की क़ीमत बढ़ गयी और भारत में इन विमानों को बनाने का ठेका यानी ऑफ़सेट कॉन्ट्रैक्ट उद्योगपति अनिल अंबानी को मिल गया। सरकार ने इन रिपोर्टों को ख़ारिज़ कर दिया था। अभी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला नहीं आया है।

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क्या हैं आरोप?

पेच यह है कि सौदे के बारे में आधिकारिक आँकड़े नहीं के बराबर जारी किए गए हैं। यहीं पर विवाद शुरू होता है। कांग्रेस का आरोप है कि यूपीए 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये दे रही थी, जबकि मोदी सरकार सिर्फ़ 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ दे रही है। एनडीए सरकार ने दावा किया कि यह सौदा उसने यूपीए से ज़्यादा बेहतर क़ीमत में किया है और क़रीब 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं। 

कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल को समझौते में शामिल करने की बात थी, लेकिन अनिल अंबानी की निजी कंपनी रिलायंस को शामिल कर लिया गया।
उसने कहा कि इससे एचएएल को 25000 करोड़ रुपये का घाटा होगा। मोदी सरकार का कहना है कि एचएएल की जगह रिलायंस का चुनाव भारत ने नहीं, बल्कि रफ़ाल बनाने वाली फ़्रान्सीसी कंपनी दसॉ ने किया है।
सवाल यह है कि रफ़ाल सौदे से जुड़े सवाल कहाँ गायब हो गए? चुनाव में यह एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया था। लेकिन अब इसकी कोई चर्चा तक नहीं करता है। इसे बड़ा मुद्दा बनाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गाँधी चुप हैं, मीडिया में कोई चर्चा नहीं हो रही है, सरकार कुछ नहीं कह रही है। क्या कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर निराश हो चुकी है? बोफोर्स मामला राजीव गाँधी की सरकार गिराने के कई कारणों में महत्वपूर्ण कारण था। उस समय विपक्ष में रहे बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाया था और आरोप कांग्रेस पर थे। आज मामला उलटा है। आरोप बीजेपी पर हैं और आरोप लगाने वाली कांग्रेस है। लेकिन सारी बातें कहाँ गुम हो गई, किसी के पास इसका जवाब नहीं है। 
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