सरकार ने यदि हर नए स्मार्टफोन में पहले से ही आधार ऐप डाल दे जिसे मोबाइल से हटाया नहीं जा सकता तो क्या कोई परेशानी है? किस बात का डर है? क्या ये डर है कि सरकार जिसको चाहे उसपर कहीं ज़्यादा और गहन निगरानी कर सकती है? ये आशंकाएँ चाहे जितनी भी सही या ग़लत क्यों न हो, लेकिन कंपनियों ने तो कम से कम सुरक्षा और प्राइवेसी का हवाला देते हुए विरोध कर दिया है। ऐसी ख़बर मीडिया रिपोर्टों में आई है।
यह रिपोर्ट रायटर्स ने दी है। इसके अनुसार जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने फोन बनाने वाली कंपनियों से निजी तौर पर यह बात की थी। सरकार ने नए स्मार्टफोन पर आधार ऐप पहले से ही इंस्टॉल करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन ऐपल, सैमसंग और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां इसका विरोध कर रही हैं।

क्या है पूरा मामला?

आधार भारत का बायोमेट्रिक पहचान कार्यक्रम है, जिसमें 1.34 अरब से ज़्यादा लोग रजिस्टर्ड हैं। यूआईडीएआई यानी यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने जनवरी में नया आधार ऐप लॉन्च किया था। इस ऐप से यूजर्स अपने डिटेल्स अपडेट कर सकते हैं, फैमिली प्रोफाइल मैनेज कर सकते हैं और बायोमेट्रिक डेटा लॉक कर सकते हैं ताकि दुरुपयोग न हो।
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रिपोर्ट के अनुसार सरकार का कहना है कि अगर ऐप नए फोन में पहले से लगा हो तो लोगों को इसे अलग से डाउनलोड करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे बैंकिंग, टेलीकॉम और एयरपोर्ट में आईडी वेरिफिकेशन जैसी आधार की सुविधाएं आसानी से मिलेंगी। यूआईडीएआई ने आईटी मिनिस्ट्री से कहा कि ऐपल, सैमसंग, गूगल जैसी कंपनियों से बात करें और नए फोन में आधार ऐप प्री-इंस्टॉल करने पर विचार करें। यह ऐसा ही होगा जैसे फोन में क्लॉक, कैलकुलेटर या गैलरी ऐप पहले से होता है।

कंपनियों का विरोध क्यों?

मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी यानी एमएआईटी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। एमएआईटी में ऐपल, सैमसंग, गूगल जैसी कंपनियां शामिल हैं। ऐपल और सैमसंग ने सुरक्षा और प्राइवेसी की चिंता जताई है। 

कंपनियों ने कहा है कि सरकारी ऐप प्री-इंस्टॉल करने से सुरक्षा जोखिम बढ़ सकता है। आधार में बायोमेट्रिक डेटा होता है, जो बहुत संवेदनशील है। पहले भी आधार डेटा लीक के मामले आए हैं।

कंपनियों को उत्पादन में भी दिक्कत आएगी। भारत के लिए अलग प्रोडक्शन लाइन बनानी पड़ेगी, क्योंकि एक्सपोर्ट किए जाने वाले फोन में यह ऐप नहीं चाहिए। इससे लागत बढ़ेगी और लॉजिस्टिक्स मुश्किल हो जाएगी। एमएआईटी ने 13 जनवरी 2026 को एक इंटरनल ईमेल में कहा कि यह प्रस्ताव 'जनता के ज्यादा फायदे के लिए नहीं है'। इसने कहा कि रूस के अलावा किसी देश में सरकारी ऐप को फोन में जबरदस्ती प्री-इंस्टॉल नहीं किया जाता।

संचार साथी ऐप जैसा मामला?

कुछ हफ्ते पहले ही सरकार ने संचार साथी ऐप को नए फोन में प्री-इंस्टॉल करने का आदेश वापस ले लिया था। संचार साथी ऐप टेलीकॉम फ्रॉड रोकने और चोरी हुए फोन ब्लॉक करने के लिए था। उस समय भी कंपनियों ने विरोध किया था।
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आधार के मामले में यह सिर्फ प्रस्ताव था, कोई सख्त आदेश नहीं। संचार साथी में पुराने फोन पर सॉफ्टवेयर अपडेट से ऐप लगाने की बात थी, जिसे यूजर बंद नहीं कर पाते। आधार में ऐसी कोई बात नहीं हुई।

और भी ऐप्स का प्रस्ताव?

रिपोर्ट के अनुसार, आधार ऐप के अलावा सरकार ने 6 सरकारी ऐप्स को प्री-इंस्टॉल करने का प्रस्ताव दिया था। इनमें से एक सचेत ऐप है, जो आपदा अलर्ट सर्विस है। एमएआईटी ने 10 मार्च को आईटी मिनिस्ट्री के अधिकारी रविंदर कुमार मीना को पत्र लिखकर इसका विरोध किया है। एमएआईटी ने हर बार यही कहा है कि ऐसे प्रस्तावों से उद्योग को नुक़सान होता है और यूज़र चॉइस प्रभावित होती है।
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अन्य देशों में क्या?

अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन जैसे लोकतांत्रिक देशों में सरकारें फोन में सरकारी ऐप जबरदस्ती नहीं लगवातीं। वे रेगुलेशन और वॉलंटरी सिक्योरिटी पर फोकस करती हैं।
बहरहाल, भारत में यह मामला यूजर प्राइवेसी, सरकारी पहुंच और टेक कंपनियों की आजादी के बीच टकराव को दिखाता है। अभी यह सिर्फ प्रस्ताव है, लेकिन अगर आदेश बनता है तो बड़ा विवाद हो सकता है।