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राजद्रोह के मामले में सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा, इसकी सीमा तय करो

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब समय आ गया है कि राजद्रोह की सीमा तय की जाए। आंध्र प्रदेश के दो टीवी चैनलों पर राजद्रोह का मामला लगाए जाने के बाद इससे जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने आदेश जारी कर कहा कि इन चैनलों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा, 'इन दो टेलीविज़न चैनलों पर राजद्रोह का मामला लगाया जाना उनकी आवाज को दबाना है, इसके साथ ही हमें राजद्रोह की सीमा तय करनी चाहिए।'

सुप्रीम कोर्ट के कहने का मतलब यह है कि बात बात में राजद्रोह का मामला लगाना गलत है। राजद्रोह उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जो वाकई सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए हिंसात्मक तरीके से की गई कोशिश हो। 

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राजद्रोह क़ानून का दुरुपयोग

सुप्रीम कोर्ट ने यह बात ऐसे समय कही है जब राजद्रोह के प्रावधानों का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है और कई बार तो विरोधियों का मुँह बंद कराने या आलोचकों को डराने के लिए किया जाता है। इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। 

एक नज़र हाल के राजद्रोह मामलों पर

  • पिछले साल अयोध्या स्थित के. एस. डिग्री कॉलेज के छात्रों द्वारा 'हम लेके रहेंगे आज़ादी' का नारा लगाने की वजह से छह छात्रों पर राजद्रोह का मामला दर्ज कर दिया गया था। इतना ही नहीं, इन छात्रों पर एनएसए भी लगा दिया गया था।
  • हाथरस बलात्कार व हत्याकांड मामले में भी पत्रकार समेत 4 लोगों पर राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज कर दिया गया था। इन लोगों पर आतंकवाद-विरोधी धाराएं और यूएपीए भी लगा दिया गया था। इन 4 लोगों में पत्रकार सिद्दिक़ कप्पन के अलावा अतीक-उर-रहमान, मसूद अहमद और आलम शामिल थे। पुलिस ने इन लोगों को हाथरस जाते वक़्त मथुरा के पास से हिरासत में लिया था। 
  • 22 साल की  पर्यावरण कार्यकर्ता और किसानों के आंदोलन की समर्थक दिशा रवि पर भी दिल्ली पुलिस ने राजद्रोह का मामला दर्ज कर दिया था।। दिशा पर आरोप है कि उसने इस टूलकिट को ग्रेटा को भेजा था और उसने इस में एडिटिंग की थी। उस पर यह भी आरोप लगाया गया था कि वह खालिस्तान समर्थक मो धोलीवाल के संपर्क में थी। दिल्ली पुलिस ने दिशा पर राजद्रोह की धारा के तहत भी केस दर्ज किया था। 
  • जेएनयू छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार और सदस्यों ने 2018 में परिसर में जब 'हम लेके रहेंगे आज़ादी' के नारे लगाए थे, तो उनके ख़िलाफ भी राजद्रोह का मामला लगाया गया था। बीजेपी, उसके छात्र संग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और उससे जुड़े लोगों ने कहा था कि आज़ादी की माँग करना देशद्रोह है क्योंकि देश तो आज़ाद है। 
  • जनवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ धरना प्रदर्शन करने वाले 3000 लोगों पर राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया। 
  • जमीन के कानूनों को लेकर प्रदर्शन करने वाले करीब 3300 किसानों पर भी राजद्रोह के तहत मुकदमे दर्ज किए गये। 
  • इस लिस्ट में पत्रकार विनोद दुआ और 14 साल की एक लड़की भी शामिल है जिस पर बेंगलुरू में पाकिस्तान जिंदाबाद कहने पर राजद्रोह का आरोप लगा। 
  • कांग्रेस के जमाने में 2012 में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को संविधान से जुड़ी भद्दी और गंदी तसवीरें पोस्‍ट करने की वजह से गिरफ्तार किया गया था और यही धारा लगाई गई थी। 
  • योगी सरकार के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठा रहे आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह पर राजद्रोह की धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया। संजय सिंह पर जाति आधारित सर्वे करा कर प्रदेश का माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाते हुए कई संगीन धाराओं में मुक़दमा दर्ज कर दिया गया था।
लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि साल 2016 से अब तक केवल 4 लोगों पर ही पुलिस राजद्रोह का आरोप अदालत के सामने सिद्ध कर पाई है। 

क्या कहा था पूर्व जज ने?

कई अहम मसलों पर न्यायपालिका को भी कटघरे में खड़े करने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी. लोकुर ने कहा है कि लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है। पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के कारण हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया गया है। 
जस्टिस लोकुर ने कहा कि लोगों द्वारा अपनी आवाज़ को उठाने पर राज्य सरकारें उन पर राजद्रोह का मुक़दमा लगा देती हैं। उन्होंने कहा, 

राजद्रोह का इस्तेमाल लोगों की आवाज़ को सख़्ती से कुचलने के लिए किया जा रहा है। राजद्रोह देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों पर लगाया जाता था।


जस्टिस मदन बी. लोकुर, रिटायर्ड जज, सुप्रीम कोर्ट

जम्मू एवं कश्मीर हाई कोर्ट ने भी राजद्रोह के नाम पर दर्ज केस को लेकर अहम टिप्पणी की थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि केवल अपमानजनक टिप्पणी करना ही राजद्रोह का केस लगाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। 

जे एंड के हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उस वक्त आयी थी जब देश की सबसे बड़ी अदालत में सोशल मीडिया पर रोक लगाने को लेकर बहस जारी है। एक मामले में सुनवाई के दौरान खुद केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में कह चुकी है कि सोशल मीडिया पर लगाम लगनी चाहिए। 

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