मोदी सरकार भले ही एलपीजी की कमी नहीं होने का दावा कर रही है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में ही गैस की किल्लत ने टेक्सटाइल इंडस्ट्री के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। एलपीजी सिलेंडर नहीं तो मज़दूरों के सामने भोजन की चुनौती और मज़दूर नहीं तो फिर टेक्सटाइल यूनिट्स चलेंगी कैसे? यानी मजदूरों की कमी के कारण टेक्सटाइल प्रोसेसिंग यूनिट्स ने फ़ैसला किया है कि वे हफ्ते में दो दिन बंद रहेंगी। इससे उत्पादन को नियंत्रित किया जाएगा और लागत बढ़ने से रोका जाएगा। यह फ़ैसला साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन यानी एसजीटीपीए ने लिया है।
सूरत में क़रीब 400 डाइंग और प्रिंटिंग मिल्स हैं और लाखों पावरलूम यूनिट्स हैं। इनमें 8 लाख से ज़्यादा प्रवासी मज़दूर काम करते हैं। हर डाइंग-प्रिंटिंग मिल में 350-400 मज़दूर होते हैं। सामान्य दिनों में मज़दूरों को हफ्ते में एक दिन छुट्टी मिलती है, लेकिन मांग ज्यादा होने पर वह भी रद्द हो जाती है। अब दो दिन बंदी से उत्पादन कम होगा और लागत नियंत्रित रहेगी। एसजीटीपीए के बयान में कहा गया है कि इस क़दम का मक़सद उत्पादन लागत कम करना, मांग और सप्लाई में संतुलन बनाना और लंबे समय तक उद्योग को स्थिर रखना है।
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मज़दूरों का पलायन

हाल में सोशल मीडिया पर कई ऐसी तस्वीरें आई हैं जिसमें कहा गया है कि गैस की किल्लत की वजह से मज़दूर शहरों से पलायन कर रहे हैं और इस वजह से ट्रेनों में भीड़ है। सूरत के उधना जंक्शन रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ की रिपोर्टें लगातार आ रही हैं, जहां हजारों मजदूर बोरिया-बिस्तर लेकर यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसी जगहों की ट्रेनों में घर लौटने के लिए कतारें लगा रहे हैं। यह कोविड जैसा पलायन लग रहा है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, नोएडा आदि में भी छोटे ढाबे-होटल बंद होने से मजदूर पलायन कर रहे हैं, जिससे स्थानीय स्टेशनों पर भीड़ बढ़ी है। कुछ जगहों से ऐसी तस्वीरें भी आईं जहाँ मज़दूर खुले में लकड़ी की आग पर खाना पका रहे हैं।
ऐसी स्थिति तब आई है जब सरकार ने घरेलू एलपीजी को बचाने के लिए कमर्शियल-औद्योगिक सप्लाई काट दी है। शहरों में रहने वाले अधिकतर मज़दूरों के पास स्थायी पता नहीं होने से गैस कनेक्शन नहीं होता है और इसलिए उन्हें कमर्शियल गैस पर निर्भर रहना पड़ता है। इस वजह से कई क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हैं-
  • सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री: कई मिलें हफ़्ते में 2 दिन बंद, मजदूरों की कमी से उत्पादन प्रभावित; फैक्टरियां वर्करों को रोकने के लिए कम्युनिटी किचन-लकड़ी दे रही हैं।
  • ऑटो कंपोनेंट्स: वर्कर माइग्रेशन से प्रोडक्शन प्रभावित होने का ख़तरा।
  • मोरबी का सिरेमिक-टाइल्स: 450 से ज़्यादा यूनिट बंद या रखरखाव पर हैं।
  • होटल-रेस्तरां: कई जगहों पर 30-35% होटल रेस्तरां बंद, मेन्यू सीमित, कुछ दिन बाद और बंद होने का खतरा।
  • छोटे ढाबे, स्ट्रीट फूड, बेकरी, लॉन्ड्री, अस्पताल किचन, क्रिमेटोरियम।

सूरत की टेक्सटाइल यूनिट ज़्यादा प्रभावित

साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन यानी एसजीटीपीए के अध्यक्ष जीतू वखारिया ने द इंडियन एक्सप्रेस से बताया कि हर साल होली के आसपास मार्च में मज़दूरों की कमी हो जाती है। ज़्यादातर मज़दूर उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा से आते हैं और वे अपने घर चले जाते हैं। लेकिन इस साल स्थिति बेहद ख़राब है क्योंकि ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से एलपीजी गैस सिलेंडर की सप्लाई रुक गई है। 

एलपीजी की कमी और कीमतें बहुत बढ़ जाने से मजदूरों को खाना बनाना मुश्किल हो गया है। कई मजदूर परिवारों के साथ रहते हैं और घर पर गैस नहीं मिलने से वे वापस गांव लौट रहे हैं।

वखारिया ने अंग्रेज़ी अख़बार से कहा, 'इस साल एलपीजी संकट ने मज़दूरों की कमी को और बढ़ा दिया है। क़रीब 30 प्रतिशत मजदूर घर लौट चुके हैं। एसोसिएशन ने सभी टेक्सटाइल क्लस्टर के साथ बैठक की और फ़ैसला लिया कि यूनिट्स हफ्ते में दो दिन बंद रहेंगी। यह साप्ताहिक छुट्टी के साथ मिलाकर होगा। यह बंदी तब तक चलेगी जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती।'
सचिन वीविंग एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र रामोलिया के पास 160 से ज्यादा रैपियर लूम मशीनें हैं। उन्होंने अख़बार को बताया कि सचिन जीआईडीसी में क़रीब 2200 टेक्सटाइल फैक्टरियां हैं। मज़दूरों की कमी से उत्पादन 50 प्रतिशत तक कम हो गया है। आने वाले दिनों में स्थिति और ख़राब हो सकती है।
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पांडेसरा में डाइंग-प्रिंटिंग मिल के मालिक कमल तुलस्यान ने कहा, 'हर साल होली के बाद 25 प्रतिशत मजदूरों की कमी हो जाती है, लेकिन इस साल युद्ध के कारण एलपीजी संकट ने पैनिक पैदा कर दिया है। एक्सपोर्ट के माल बंदरगाहों पर या समुद्र में फंसे हैं। घरेलू बाजार में भी मांग कम है। एलपीजी संकट ने 10 प्रतिशत अतिरिक्त कमी पैदा की है। मज़दूर दो महीने या उससे ज़्यादा समय बाद लौटते हैं, इसलिए फैक्टरियाँ चलाना मुश्किल है।'
टेक्सटाइल कारोबारी संजय सरोगी ने बताया कि वे मजदूरों को रोकने के लिए फ्री खाना दे रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हम उनके परिवारों को भी घर पर खाना देते हैं। लेकिन घर पर खाना बनाने के लिए गैस चाहिए, जो ब्लैक मार्केट से महंगी मिल रही है। मिलों में 40 प्रतिशत तक मजदूरों की कमी है। रोज मजदूर ट्रेन या लग्जरी बस से घर जा रहे हैं।'
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यह संकट ईरान युद्ध से जुड़ा है, जहां होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है। भारत में एलपीजी की क़ीमतें बढ़ी हैं और छोटे सिलेंडर महंगे हो गए हैं। कई फैक्टरियां रात की शिफ्ट बंद कर चुकी हैं और दिन में सीमित मज़दूरों से काम चला रही हैं।
उद्योग जगत को उम्मीद है कि जल्द ही गैस सप्लाई सामान्य होगी, लेकिन फिलहाल उत्पादन कम होने से टेक्सटाइल सेक्टर को नुकसान हो रहा है। यह सूरत की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल रहा है, क्योंकि टेक्सटाइल यहां का मुख्य उद्योग है।