अमेज़न और गूगल के बड़े तकनीकी डेटा सेंटरों को लेकर महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में स्थानीय लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। क्योंकि वहां के लोगों ने गर्मी, पानी और बिजली की समस्या को लेकर चिंता जताई है। यह साधारण खबर नहीं है। आने वाले वक्त के लिए चेतावनी है।
- महाराष्ट्र के ठाणे में स्थानीय लोगों ने बाल्कुम स्थित अमेज़न के 47,000 करोड़ रुपये के डेटा सेंटर के खिलाफ गर्मी, शोर और बिजली कटौती की आशंका जताते हुए विरोध प्रदर्शन किया।
- हाल ही में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम शहर में स्थानीय लोगों और बच्चों ने "हम डेटा नहीं पी सकते" लिखे बैनर लेकर प्रदर्शन किया और गूगल के लोगो पर हथकड़ियां बना दीं। वजह यहां अडानी गूगल का बड़ा डेटा सेंटर बन रहा है।
ये महज़ दो खबरें या दो सूचनाएं नहीं हैं। भारत में आने वाली तबाही के संकेत या चेतावनी मात्र हैं। भारत में लगभग 141 डेटा सेंटर शुरू हो चुके हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में 104 डेटा सेंटर आने वाले हैं। दुनिया की बड़ी कंपनियां क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए इस विस्तार को गति दे रही हैं। लेकिन सवाल है कि आखिर भारत में ही अंधाधुंध डेटा सेंटर क्यों बनाए जा रहे हैं। अमेरिका में वहां के लोगों के भारी विरोध के बाद उन कंपनियों का रुख भारत की ओर हो गया है।
अमेज़न (AWS) या गूगल के एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर में सीधे तौर पर लगभग 150 से 200 लोगों को पक्की नौकरी मिलती है। लेकिन इसके मुकाबले डेटा सेंटर वाले इलाके के लोगों को इसकी जो कीमत चुकानी पड़ती है, वो इन नौकरियों से बड़ी है। इस पूरे मामले को समझने के लिए पूरी रिपोर्ट अंत तक पढ़ना होगी।
महाराष्ट्र के ठाणे में "वेक अप ठाणेकर" (WUT) नामक संगठन के बैनर तले आयोजित हो रहे विरोध प्रदर्शन में स्थानीय निवासी अमेज़न डेटा सर्विसेज इंडिया द्वारा 53 एकड़ भूखंड पर विकसित की जा रही इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। लगभग 47,000 करोड़ रुपये के निवेश वाली यह परियोजना मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) के सबसे बड़े डेटा सेंटरों में से एक होने की उम्मीद है। ऐसे कई डेटा सेंटर मुंबई महानगर के इलाकों में प्रस्तावित हैं। ठाणे भी उसका हिस्सा है।
यह डेटा सेंटर शहर के बीचों-बीच आवासीय क्षेत्र में बन रहा है। इसके आसपास ऊंची इमारतें और तीन गांव स्थित हैं, साथ ही स्कूल, अस्पताल और मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन सुविधाएं भी हैं। वेकप ठाणेकर (WUT) ने जुलाई से लेकर अब तक कई प्रदर्शन किये हैं और अमेज़न के अधिकारियों के साथ बैठक भी की। निवासियों ने बताया कि बैठक से पहले उन्होंने कई विशेषज्ञों से सलाह ली थी। बैठक में अमेज़न के अधिकारी उनके तकनीकी और पर्यावरणीय सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
ठाणे के निवासियों ने विशेष रूप से इन मुद्दों को उठाया:
डेटा सेंटर बनने के बाद वहां होने वाली अत्यधिक गर्मी
लगभग 190 डीजल जनरेटर सेटों से होने वाला शोर
उनका कॉर्बन उत्सर्जन (एग्जॉस्ट एमिशन)
घनी आबादी वाले इलाके में इतने बड़े हाइपरस्केल डेटा सेंटर के संचालन से पड़ने वाला समग्र पर्यावरणीय प्रभाव
- ठाणे के निवासियों के एक एक मुद्दे में आने वाले समय की त्रासदी और चेतावनी है। आगे अभी पढ़िए। जवाब मिलेगा।
ठाणे के लोगों ने इस मामले में विशेषज्ञों से सलाह ली। उन लोगों ने वहां के निवासियों को बताया कि डेटा सेंटर की मशीनों को ठंडा रखने के लिए करीब 80,000 एयर कंडीशनरों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे बालकुम, ढोकाली और माजीवाड़ा क्षेत्रों में "हीट आइलैंड" बनने का खतरा है। उन्होंने यह भी कहा कि हर साल गर्मियों में यहां का तापमान पहले से ही नए रिकॉर्ड बना रहा है।
परियोजना की भारी बिजली जरूरत भी निवासियों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। निवासियों को डर है कि लगातार और भारी बिजली आपूर्ति की जरूरत वाली यह सुविधा क्षेत्र के बिजली ढांचे पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। यह डेटा सेंटर एक बिजली ग्रिड के पास बनाया जा रहा है और एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर को लगातार 420 मेगावाट बिजली की जरूरत होती है, जबकि इलाके में पिछले कुछ महीनों में पहले ही बिजली कटौती देखी जा चुकी है।
निवासियों ने इस परियोजना को मिली सरकारी मंजूरियों और नीतिगत ढांचे पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि आसपास के आवासीय इलाकों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का आकलन और बारीकी से किये बिना मंजूरी दी गई। अगर सरकार ने मंजूरी देने से पहले कोई स्टडी कराई हो तो उसे सार्वजनिक करे। यह जमीन एक डेवलपर द्वारा अमेज़न को बेची गई। उसके बाद महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार की ITES नीति आई, जो आवासीय क्षेत्रों में ऐसे डेटा सेंटरों को लेकर पूरी तरह खामोश है।
डेटा सेंटर एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा हैं। लेकिन इस पर जवाबदेही किसी की नहीं है। यही बड़ा सवाल है। लेकिन यह रिपोर्ट अभी पूरी नहीं हुई है। आगे और भी बहुत कुछ है।
अडानी गूगल के $15 Billion डेटा सेंटर प्रोजेक्ट पर विवाद
गूगल (Google) और अडानी ग्रुप (Adani Group) आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में 15 अरब डॉलर (₹1.5 Billion) का डेटा सेंटर बना रहे हैं। हालांकि, दैनिक 480 मिलियन लीटर मांग के मुकाबले पहले से जल संकट झेल रहे इस शहर में भारी विरोध शुरू हो गया है। स्थानीय निवासियों और कार्यकर्ताओं ने "We cannot drink DATA" के बैनर लेकर प्रदर्शन किया है और मामले को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट व NGT में चुनौती दी है।
विवाद की बड़ी वजह पर्यावरण सुरक्षा है। यह प्रोजेक्ट कंबलाकोंडा वन्यजीव अभयारण्य (Kambalakonda Wildlife Sanctuary) से मात्र 860 मीटर की दूरी पर स्थित है। पर्यावरणविदों का आरोप है कि निर्माण के भारी शोर, डीजल जनरेटरों के इस्तेमाल और भारी मशीनों की आवाजाही से अभयारण्य में मौजूद तेंदुए और पैंगोलिन जैसे संरक्षित वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होगा।
कार्यकर्ता समूह 'जल बिरादरी' (Jal Biradari) ने जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें कहा गया है कि यह प्रोजेक्ट पास के मुख्य जलाशय पर दबाव डालेगा और स्थानीय जल स्तर को खत्म कर देगा। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस पर जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 24 अगस्त को तय की है। इसी तरह 'ह्यूमन राइट्स फोरम' (Human Rights Forum) ने एनजीटी में 3 अलग-अलग मामले दर्ज कराए हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण पेयजल योजना से डेटा सेंटर को पानी देने के प्रभाव का सही आकलन किए बिना ही राज्य सरकार ने जल्दबाजी में मंजूरी दे दी।
एनजीओ 'ग्रीन विशाखा' (Green Visakha) के संस्थापक राजा राम मोहन राय ने सवाल उठाया कि जब शहर पहले से ही जल संकट झेल रहा है, तो सरकार इस प्रोजेक्ट को 20 साल तक पानी की गारंटी (Guaranteed Water Supply) कैसे दे सकती है।
पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार के लिए डेटा सेंटरों की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके लिए भारी मात्रा में बिजली और कूलिंग वाटर की जरूरत होती है। विशाखापट्टनम में गूगल और अडानी का यह प्रोजेक्ट इस बात की दलील बन गया है कि किस तरह एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और स्थानीय जल-पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना टेक कंपनियों और सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। लेकिन फिलहाल एआई इन्फ्रा के अंधाधुंध विकास की जवाबदेही से टेक कंपनियां और सरकार दोनों ही बच रही है।
डेटा सेंटर को कितना पानी चाहिए?
इसका कोई एक निश्चित जवाब नहीं है। पानी की खपत मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि डेटा सेंटर में किस तरह की कूलिंग तकनीक इस्तेमाल हो रही है।
पानी आधारित कूलिंग
- कई डेटा सेंटरों में कूलिंग टावर और evaporative cooling इस्तेमाल होते हैं। इसमें पानी गर्मी को बाहर निकालने के दौरान वाष्पित होता है और उसकी भरपाई के लिए लगातार नया पानी देना पड़ता है।
- कुछ अध्ययनों में डेटा सेंटरों के लिए लगभग 7 घन मीटर पानी प्रति MWh बिजली का अनुमान दिया गया है। यानी करीब 7,000 लीटर पानी प्रति MWh।
अगर 100 MW का डेटा सेंटर 24 घंटे चलता है:
- 100 MW × 24 घंटे = 2,400 MWh प्रतिदिन
और यदि 7,000 लीटर/MWh की दर मानें:
- 2,400 × 7,000 = 1.68 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन।
लेकिन यह आंकड़ा हर डेटा सेंटर पर लागू नहीं किया जा सकता। उनके साइज़ और तकनीक के हिसाब से इसमें बदलाव मुमकिन है।
अमेज़न का ठाणे डेटा सेंटर के बारे में कहना है कि 2.88 लाख लीटर पानी प्रतिदिन इस्तेमाल होगा। उसका कहना है कि वो कूलिंग की अत्याधुनिक तकनीक इस्तेमाल करेगा।
फिर पानी को लेकर विवाद क्यों है?
क्योंकि डेटा सेंटर का पानी का इस्तेमाल सिर्फ उस परिसर के अंदर होने वाली खपत तक सीमित नहीं है। यहां दो तरह की पानी की खपत को समझना जरूरी है।
डेटा सेंटर के अंदर इस्तेमाल होने वाला पानी—जैसे cooling towers आदि में।
डेटा सेंटर को भारी मात्रा में बिजली देने वाले पावर प्लांटों में इस्तेमाल होने वाला पानी।
अगर डेटा सेंटर की बिजली ऐसे थर्मल पावर प्लांटों से आती है, जिनमें बड़ी मात्रा में पानी इस्तेमाल होता है, तो डेटा सेंटर का वास्तविक water footprint उसके परिसर में इस्तेमाल होने वाले पानी से कहीं अधिक हो सकता है। इसलिए जब कोई कंपनी कहती है कि "हम डेटा सेंटर को ठंडा करने के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं करते", तो यह संभव है कि वह बात सही हो। लेकिन इसके बाद एक और सवाल पूछा जा सकता है: उस डेटा सेंटर को बिजली पैदा करने में कितना पानी इस्तेमाल हो रहा है?
- यही डेटा सेंटर के पर्यावरणीय प्रभाव का एक ज्यादा व्यापक सवाल है।
अमेरिका में भी डेटा सेंटरों का हो रहा है विरोध
अमेरिका में Amazon के डेटा सेंटरों को लेकर कई जगह स्थानीय लोगों और पर्यावरण समूहों ने विरोध किया है। कैलिफोर्निया के गिलरॉय में Amazon करीब 2 अरब डॉलर की लागत से 56 एकड़ में डेटा सेंटर बना रहा है। स्थानीय लोगों ने पानी की खपत, बिजली, पर्यावरण, जमीन के इस्तेमाल और पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श न होने पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि परियोजना की जानकारी उन्हें निर्माण शुरू होने के बाद मिली। Amazon ने बाद में स्थानीय समुदाय से बातचीत और बुनियादी ढांचे में निवेश का आश्वासन दिया।
वर्जीनिया के वॉरेंटन और फॉक्वियर काउंटी में भी Amazon समेत बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्टों का विरोध हुआ है। यहां जमीन के इस्तेमाल, ज़ोनिंग नियमों में बदलाव, बिजली की बढ़ती मांग, पानी और पर्यावरण पर दबाव को लेकर चिंता है। वर्जीनिया में विरोध अब सिर्फ Amazon तक सीमित नहीं है, बल्कि Google, Microsoft और Meta जैसी कंपनियों के डेटा सेंटर भी निशाने पर हैं। प्रिंस विलियम काउंटी में करीब 1,700 एकड़ में प्रस्तावित एक बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट को विरोध के बाद छोड़ दिया गया।
फ्लोरिडा के हर्नांडो काउंटी में भी डेटा सेंटरों के खिलाफ विरोध तेज हुआ है। यहां लोग भूजल और पर्यावरण पर असर, बिजली की खपत, शोर, जमीन के इस्तेमाल और सीमित स्थानीय रोजगार को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि डेटा सेंटरों का विरोध राजनीतिक दलों की सीमाओं से भी आगे बढ़ रहा है- कंजर्वेटिव मतदाताओं से लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक कई समूह इसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
कुल मिलाकर अमेरिका में बहस अब सिर्फ इस बात पर नहीं है कि डेटा सेंटर कितना पानी या बिजली इस्तेमाल करता है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि AI और डेटा सेंटरों के लिए स्थानीय समुदायों को कितनी पर्यावरणीय और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
अमेरिका के डेटा सेंटरों से प्रभावित लोगों का तर्क है कि अगर किसी समुदाय में विशाल डेटा सेंटर बनाया जाता है तो उसे बिजली, पानी, सड़क, जमीन और पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव की कीमत क्यों चुकानी चाहिए- जबकि इस डेटा सेंटर से मिलने वाली डिजिटल सेवाओं और AI का इस्तेमाल दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी होगा? यही सवाल अमेरिका के कैलिफोर्निया और वर्जीनिया से लेकर महाराष्ट्र के ठाणे और विशाखापट्टनम तक डेटा सेंटरों को लेकर उभरती बहस को जोड़ता है। यानी सवाल सिर्फ Amazon या अडानी गूगल का डेटा सेंटर बनाने या न बनाने का नहीं है। सवाल यह है कि AI की तेज होती दौड़ में पानी, बिजली और पर्यावरण की कीमत आखिर कौन चुकाएगा? किसकी जवाबदेही है।