बजट में ओडिशा, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में प्रस्तावित रेयर अर्थ कॉरिडोर की घोषणा कर क्या इरादा जताया गया है? चीन पर निर्भरता कम करना है, लेकिन क्या काफ़ी है?
बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम रेयर अर्थ एलिमेंट्स के खनन, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए है। सरकारी भाषा में यह आत्मनिर्भर भारत और चीन पर निर्भरता कम करने का बड़ा क़दम बताया जा रहा है। लेकिन क्या यह वाक़ई इतना सरल और फायदेमंद है?
फायदा और नुक़सान समझने से पहले इसकी घोषणा और रेयर अर्थ खनिज को समझ लें। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को संसद में बजट पेश करते हुए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे तटीय राज्यों में डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का बड़ा ऐलान किया। वित्त मंत्री ने कहा, 'हम अब ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों को सपोर्ट करेंगे ताकि वे रेयर अर्थ कॉरिडोर बना सकें। इससे खनन, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।'
रेयर अर्थ एलिमेंट्स 17 खास तरह के खनिज हैं जो आज की हाई-टेक दुनिया में बेहद ज़रूरी हैं। इनसे बने रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स यानी आरईपीएम इलेक्ट्रिक वाहनों यानी ईवी, विंड टर्बाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस के उपकरणों में इस्तेमाल होते हैं। ये मैग्नेट बहुत मज़बूत होते हैं और बिना इनके आधुनिक तकनीक मुश्किल है।
लेकिन समस्या यह है कि दुनिया में इन मैग्नेट्स का ज़्यादातर उत्पादन और प्रोसेसिंग चीन के हाथ में है। चीन 90% से ज्यादा कंट्रोल करता है। भारत को इनकी बहुत ज़रूरत है, लेकिन हम ज़्यादातर आयात करते हैं। पिछले वित्त वर्ष मार्च 2025 तक भारत ने 53000 मीट्रिक टन से ज्यादा रेयर अर्थ मैग्नेट्स आयात किए। 2030 तक इसकी मांग दोगुनी हो सकती है।
भारत में रेयर अर्थ कहाँ से आते हैं?
भारत में रेयर अर्थ का मुख्य स्रोत बीच सैंड मिनरल्स यानी बीएसएम है, जो समुद्र तट की रेत में पाया जाता है। इसमें मोनाजाइट नाम का खनिज होता है, जिसमें रेयर अर्थ के साथ यूरेनियम और थोरियम भी होते हैं।
देश में ये खनिज केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटों पर बहुत ज्यादा मात्रा में मिलते हैं। कहा जा रहा है कि इसीलिए इन्हीं राज्यों को चुना गया है।
सरकार का क्या प्लान है?
यह घोषणा नवंबर 2025 में शुरू की गई सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स बनाने की स्कीम पर आधारित है। इस स्कीम में 7280 करोड़ रुपये का बजट है। सरकार 6000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बनाना चाहती है। प्रतियोगी बोली से 5 कंपनियों को चुना जाएगा, हर एक को ज्यादा से ज्यादा 1200 एमटीपीए तक मिल सकता है।
चुनी गई कंपनियों को 5 साल में 6450 करोड़ रुपये की सेल्स-लिंक्ड इंसेंटिव और 750 करोड़ रुपये की कैपिटल सब्सिडी मिलेगी।
अब नए कॉरिडोर से इन राज्यों में पूरा चेन बनेगा– खनन से लेकर प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैग्नेट बनाने तक। इससे भारत आयात पर निर्भरता कम करेगा और आत्मनिर्भर बनेगा।
इसके फायदे क्या होंगे?
- इलेक्ट्रिक वाहनों और रिन्यूएबल एनर्जी के लक्ष्य पूरे होंगे।
- डिफेंस और एयरोस्पेस मजबूत होंगे।
- इन राज्यों में रोजगार बढ़ेगा।
- चीन पर निर्भरता कम होगी, जो भविष्य में सप्लाई चेन की समस्या से बचाएगा।
यह कदम भारत को क्रिटिकल मिनरल्स में मज़बूत बनाने की दिशा में बहुत बड़ा है। आने वाले सालों में ईवी और ग्रीन एनर्जी बढ़ेगी, तो रेयर अर्थ की ज़रूरत और ज़्यादा होगी। सरकार का यह प्लान आम लोगों को सस्ते ईवी और क्लीन एनर्जी के लिए मददगार साबित होगा। लेकिन कई बड़े सवाल भी उठ रहे हैं।
असली सवाल: पर्यावरण का बड़ा ख़तरा
बीच सैंड मिनरल्स खनन से समुद्र तटों का कटाव होता है, समुद्री जीवन बर्बाद होता है, रेडियोएक्टिव थोरियम और यूरेनियम निकलते हैं जो कैंसर जैसी बीमारियाँ फैला सकते हैं। केरल और तमिलनाडु में पहले से ही इलाकों में लोगों ने इसका विरोध किया है। ओडिशा में भी पर्यावरणविद् चेतावनी देते रहे हैं। सरकार कहती है कि सख्त नियम होंगे, लेकिन पहले खनन कंपनियाँ नियम तोड़ती रही हैं। क्या वाकई पर्यावरण को बचाने के लिए मजबूत मॉनिटरिंग होगी, या यह सिर्फ कागजों पर रह जाएगा?
स्थानीय लोगों का नुक़सान
इन कॉरिडोर में बड़े-बड़े प्लांट लगेंगे, जिससे मछुआरों, किसानों और स्थानीय समुदायों की जमीन और आजीविका छिन सकती है। पिछले कई सालों में भारत में खनन प्रोजेक्ट्स से विस्थापन और पुनर्वास की समस्या रही है। क्या सरकार स्थानीय लोगों को रोजगार और फायदा सुनिश्चित करेगी, या सिर्फ बड़ी कंपनियां मुनाफा कमाएंगी?
क्या यह सिर्फ राजनीतिक खेल है?
तमिलनाडु और केरल में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों को शामिल करके सरकार वहां वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ओडिशा और आंध्र में भी राजनीतिक फायदा हो सकता है। असल में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने की घोषणा अच्छी है, लेकिन अगर चुनावी फायदे के लिए जल्दबाजी में लागू किया गया तो लंबे समय में नुकसान होगा।तकनीकी और आर्थिक चुनौती
रेयर अर्थ प्रोसेसिंग बहुत जटिल और महंगी है। भारत में अभी तकनीक कम है, ज्यादातर चीन पर निर्भर हैं। 7280 करोड़ की स्कीम अच्छी है, लेकिन क्या यह काफी है? क्या प्राइवेट कंपनियां आगे आएंगी? अगर सिर्फ सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहा तो लंबे समय में टिकाऊ नहीं होगा। साथ ही, वैश्विक बाजार में चीन कीमतें गिरा सकता है, जिससे भारतीय उत्पाद महंगे पड़ सकते हैं।
बहरहाल, यह प्रस्ताव रणनीतिक रूप से ज़रूरी है क्योंकि रेयर अर्थ के बिना ईवी, रिन्यूएबल एनर्जी, डिफेंस जैसे क्षेत्रों में भविष्य की टेक्नोलॉजी में भारत पिछड़ जाएगा। लेकिन इसे सिर्फ 'चीन से आजादी' का नारा बनाकर नहीं चलाया जा सकता। पर्यावरण सुरक्षा, स्थानीय लोगों के हित, पारदर्शिता और लंबी अवधि की प्लानिंग के बिना यह प्रोजेक्ट पर्यावरण और समाज के लिए नया संकट बन सकता है। सरकार को साबित करना होगा कि यह सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से लागू होने वाला प्लान है। वरना अच्छे इरादे भी अच्छे नतीजे नहीं देंगे।