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कृषि विधेयक किसानों को कैसे प्रभावित करेंगे?

विपक्ष के ज़ोरदार विरोध और सरकार के मंत्री के इस्तीफ़े के बीच किसानों से जुड़े दो विधेयक लोकसभा के बाद रविवार को राज्यसभा में भी पारित हो गए। इनका क़ानून बनना लगभग तय है। पर सवाल यह उठता है कि आख़िर किसान इन बिलों का इस तरह विरोध क्यों कर रहे हैं। इसके साथ ही यह भी सवाल है कि ये दोनों विधेयक क़ानून बन जाने के बाद किस तरह काम करेंगे, ये किस तरह किसानों को प्रभावित करेंगे।

रोज़गार, निवेश

सरकार का दावा है कि इससे कृषि क्षेत्र में कार्यकुशलता की कमी की समस्या का निदान हो सकेगा, पूँजी निवेश होगा और कृषि व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। सरकार का यह भी मानना है कि इससे बड़ी कंपनियां कृषि क्षेत्र से जुड़ेंगी और किसानों को फ़ायदा होगा, रोज़गार के मौके बढ़ेंगे।
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इनमें से जो दो विधेयक पारित हो गए, वे हैं-  कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020 और कृषक (सक्तिशकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020।

गेम चेंजर

कृषक (सक्तिशकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 वह विधेयक है जिससे ठेके पर खेती की रूपरेखा तय होगी। यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और यह गेम चेंजर साबित हो सकता है।
इससे राष्ट्रीय स्तर पर खेती के क़रार किए जा सकेंगे। इसमें कहा गया है कि इससे किसानों को कृषि-आधारित व्यापार से जुड़ने में सहूलियत होगी। इससे थोक विक्रेताओं, निर्यातकों और बड़े खुदरा विक्रेताओं को कृषि किसानों से खरीदने में सुविधा होगी।
इसके बल पर किसानों के साथ ये लोग सीज़न के पहले ही क़रार कर सकेंगे और उस हिसाब से उन्हें भुगतान कर सकेंगे।

ठेके पर खेती

भारत में ठेके पर खेती छिटपुट पहले भी होती रही है, यह देश के लिए बिल्कुल नया नयी चीज नहीं है, पर यह कामयाब नहीं रही है। आलू चिप्स, वेफ़र्स और दूसरे स्नैक्स बनाने वाली कंपनियां किसानों से आलू वगैरह खरदीने के लिए क़रार करती रही हैं।
फिलहाल यह व्यवस्था है कि चिप्स वगैरह बनाने वाली कंपनियाँ किसानों के साथ क़रार करती हैं और उनके बीच कृषि उत्पाद विपणन समिति होती है। किसी तरह का विवाद होने पर यह समिति बीच में आती है। इसमें बाज़ार की फ़ीस और लेवी भी इन समितियों को देना होता है।
नए नियम में कंपनी और किसानों के बीच क़रार के लिए इस विपणन समिति की ज़रूरत नहीं होगी। कृषि उत्पाद से जुड़ी कंपनियों को कई बार लगता है कि यदि किसानों ने क़रार का पालन नहीं किया तो वे घाटे में रहेंगी क्योंकि स्थानीय राजनेता ऐसे में किसानों का साथ देंगे क्योंकि राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।

राजनीतिक दबाव

बीते साल गुजरात में पेप्सीको ने राज्य के कुछ किसानों पर एक करोड़ रुपए का मुक़दमा कर दिया। उसका कहना था कि इन किसानों ने पेप्सी के विकसित किए हुए किस्म के आलू की खेती की और बाज़ार में किसी और को बेच दिया। राज्य सरकार के हस्तक्षेप करने पर पेप्सीको को यह मुक़दमा वापस लेना पड़ा।
किसान विधेयकों का कहना है कि इन क़ानून की वजह से ठेके पर खेती समय के साथ मुख्य धारा की खेती बन सकता है। ऐसे में क़षि व्यापार से जुड़ी कंपनियाँ इन किसानों को एकत्रित कर उनके ज़रिए पैसे का निवेश कर सकती हैं। उन्हें प्रद्योगिकी दे सकती हैं।

दलवाली समिति

ठेके पर खेती के अध्ययन पर बनी दलवाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इससे छोटे किसान बड़े सप्लाइ चेन से जुड़ सकेंगे। दलवाली समिति ने यह भी दावा किया था कि पोल्ट्री फार्म ठेके पर होने वाले काम के कामयाब होने का सबूत है। देश में लगभग 66 प्रतिशत पोल्ट्री फार्म ठेके पर ही चलते हैं।
ठेके पर खेती के नियम का मुख्य अंश यह प्रावधान है कि किसान कंपनी के साथ यह क़रार करते हैं कि वे एक निश्चित कीमत पर निश्चित समय पर निश्चित मात्रा में कृषि उत्पाद कंपनी को बेचेंगे। यह क़रार एक से पाँच साल तक का हो सकता है। इस क़रार में अधिकतम और न्यूनतम कीमत रहनी ही चाहिए।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस पद्धति का बुरा पक्ष यह है कि अब कंपनियाँ ही खेती का स्वरूप और उत्पाद का पैटर्न तय करेंगी। किस उत्पाद की खेती कितनी कीमत पर कब तक होगी, ये कंपनियों की इच्छा पर निर्भर होगा। कुछ समय बाद वे अपनी इच्छा से कीमत भी नियत्रित करने लगेंगी और उसके बाद किसानों को नुक़सान होगा।   

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