इसे मात्र संयोग मानना चाहिए कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की नई शृंखला जारी होते ही क़ीमतें बढ़ने का और सकल घरेलू उत्पादन- जीडीपी की गणना की नई शृंखला जारी होते ही वैश्विक स्तर पर काफी उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया है और जाहिर तौर पर हमारी अर्थव्यवस्था उससे भी प्रभावित होगी ही। प्रधानमंत्री समेत सरकार के कई कर्ताधर्ताओं को आज आत्मनिर्भरता की नीति याद भले आती हो लेकिन मौजूदा सारी नीतियाँ दरवाजे खोलने वाली ही हैं। इन सबके बीच यह कहने में हर्ज नहीं है कि 12 साल बाद आई नई शृंखला का स्वागत होना चाहिए क्योंकि यह काम हर दस साल में हो जाना चाहिए।
दूसरी बड़ी बात इस शृंखला में किए गए बदलावों की है, जो निश्चित रूप से हमारी आर्थिक गणना को पहले से ज़्यादा व्यापक आधार देते हैं और इसलिए वास्तविकता के ज़्यादा क़रीब पहुंचाएंगे। 2011-12 के आधार वर्ष वाली पिछली शृंखला भी मोदी राज में ही जारी हुई थी और उसमें किए गए कुछ बदलावों की पूरे समय आलोचना होती रही है क्योंकि उनसे जीडीपी विकास की दर कुछ ज्यादा ही तेज दिखने का आरोप था। और दूसरों की कौन कहे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सूचकांकों के मामले में उसे सी-ग्रेड दिया था जिस पर अच्छा खासा बवाल मचा। सांख्यिकी से जुड़े हमारे जानकार भी उसमें गंभीर कमियों पर शोर मचाते रहे लेकिन काम बढ़ता गया।
अब इस बार क्या-क्या बदलाव हुए हैं उसकी पूरी जानकारी तो 26 फ़रवरी के सरकारी रिलीज में बहुत विस्तार से बताई गई है लेकिन इतना बताना ज़रूरी है कि इसमें चालू अनुभवों के आधार पर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के भारांक में बदलाव किया गया है, जीएसटी, ई-वाहन डाटा और प्राविडेंट फंड जैसे नए ठिकानों पर स्वाभाविक क्रम और नई तकनीक के चलते जुटने वाले आँकड़ों को ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और जीडीपी-ऋण अनुपात तथा राजकोषीय प्रबंधन संबंधी गणना को और सुधारने का प्रयास किया गया है।
इसका एक मतलब अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक गणना में स्थान देने के साथ महत्व देना है और इससे गणना सुधरेगी। एक कोशिश पुरानी शृंखला की जाहिर कमजोरियों से हल्का होने का है और संभव है कि इससे कुछ हिसाब बदलेंगे जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के सपने का कुछ और दूर हो जाना भी हो सकता है। लेकिन इन सबके ऊपर विकास दर के तेज होने की उम्मीद भी जाहिर की गई।
नई शृंखला में चालाकी
अब इसे चालाकी मानें या भूल सुधार लेकिन नई शृंखला बनाने में भी कम चालाकियाँ नहीं दिखतीं। सबसे बड़ी चालाकी तो जीडीपी के मूल आधार की गिनती की ही है जिसे 2025-26 में 357 लाख करोड़ की जगह 345 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया। जब गणना चालू कीमत के आधार पर होनी है तो इतना बड़ा फर्क कैसे आ सकता है। पर यह ज़रूर होगा कि आधार/बेस सिकुड़ेगा तो जीडीपी विकास दर का हिसाब ऊपर जाएगा। यह भी गड़बड़ लगता है कि आप नई शृंखला में सेवा क्षेत्र के भारांक को कम करें और कृषि तथा करखनिया उत्पादन का भारांक बढ़ा दें। खेती का योगदान हमारे जीवन में ही नहीं, अर्थव्यवस्था में कम होता गया है भले ही भोजन में उसके योगदान को कोई भी अर्थव्यवस्था नहीं भूल सकती। पर यहां खपत वाला पक्ष हिसाब के लगभग बाहर है।
महंगाई और खपत-उत्पादन के परस्पर रिश्ते को समझना और उसे सूचकांकों तथा नमूना सर्वेक्षणों के अलावा दूसरी सूचनाओं के आधार पर ले जाने का फ़ैसला भी बहुत साफ़-सुथरा नहीं है। सर्वेक्षणों और आँकड़ों के प्रवाह से इस सरकार को कैसी परेशानी रही है, यह पिछले दसेक वर्षों में बार-बार दिखा है।
पर एक छल रचने का प्रयास इसमें दिखता है जिसकी तरफ़ यह लेखक सिर्फ़ इशारा कर सकता है। ज़्यादा विस्तार से इसकी जाँच और सत्यापन का काम सांख्यिकी और अर्थशास्त्र के अधिक जानकार लोग कर सकते हैं। इस बार राजकोषीय और वित्तीय प्रबंधन के घोषित मानकों के अनुसार अपना नंबर सुधारना भी एक लक्ष्य लगता है। अगर गणना तेज जीडीपी विकास बताती है तो अर्थव्यवस्था का बढ़ा आकार आपके ऋण की स्थिति को नहीं उसकी गणना को सुधार देता है, उसमें बड़े आराम से चार पाँच फीसदी की कमी दिखा सकता है। यह सांख्यिकी का सच नहीं छल है।
यही बात हम जीएसटी की वसूली और पीएफ के आँकड़ों के मामले में अभी देख रहे हैं। असल में यह सारा हिसाब अर्थव्यवस्था में बदलाव की जगह गणना में बदलाव का है या गणना सुधारने का है- इन-फॉर्मल सेक्टर के फॉर्मल में आने भर का है। रोजगार, उपभोग, उत्पादन, क़ीमतों में उतना फर्क नहीं आ रहा जितना आँकड़े बताने लग रहे हैं। और इसका लाभ सरकार अपनी उन्हीं नीतियों को जारी रखने में ले रही है जो गरीबों और कमजोरों के लिए, दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास के लिए और समानता के घोषित लक्ष्य के लिए नुकसानदेह साबित हो रही हैं।
जीडीपी मापने का पैमाना सही ज़रूरी क्यों?
जीडीपी सिर्फ हेडलाइन की चीज नहीं है तो उसे मापने का पैमाना भी शुद्ध होना चाहिए। इसी पैमाने से मिले आँकड़े और संकेत बताते हैं कि अर्थव्ययस्था किस दिशा में जा रही है, नीतियों में बदलाव के ज़रिए उसमें कैसा बदलाव लाया जाए, उसमें आने वाली गिरावट को कैसे संभाला जाए। लेकिन इससे सबसे बड़ा प्रभाव यह होता है कि अर्थव्यवस्था का अंग आम लोगों तथा निवेशकों-उत्पादकों को संकेत जाता है और उनका उत्साह या निराशा अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकता है या रफ्तार को और पस्त करता है। इसी से मिले संकेतों के आधार सरकारी पर राजकोषीय नीतियों में बदलाव होता है। इसलिए इसे राजनीति और चुनावी खेल से ज्यादा से ज्यादा दूर रखना चाहिए। लगता नहीं है कि ऐसा हुआ है।